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    आयतुल्लाह सैयद मुहम्मद हुसैनी बहिश्ती-२

    आयतुल्लाह सैयद मुहम्मद हुसैनी बहिश्ती-२
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    अच्छे भविष्य के निर्माण के लिए समय और परिस्थितियों की पहचान बुद्धिजीवियों की विशेषता होती है। आयतुल्लाह मुहम्मद हुसैनी बहिश्ती भी उन बुद्धिजीवियों में से थे जिन्होंने अपनी दूरदर्शिता से वर्तमान और भविष्य को एक दूसरे से जोड़ दिया। यह महान बुद्धिजीवी, ईरानी व इस्लामी मान्यताओं के समर्थक थे और इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उन्होंने क्रांति से पूर्व ही इसकी भूमिका तैयार की। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई शहीद बहिश्ती की गतिविधियों के बारे में कहते हैं कि इमाम खुमैनी द्वारा आरंभ किये गये संघर्ष और आंदोलन के कर्ता धर्ता इमाम खुमैनी के बाद शहीद बहिश्ती ही थे। वे अपनी दूरदर्शिता से सही समस्याओं का निवारण कर देते और उनकी देख रेख में बहुत से गुप्त संगठन शाही सरकार के विरुद्ध सक्रिय थे। शाही खुफिया एजेन्सी सावाक का यह मानना था कि यदि श्री बहिश्ती को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया तो ईरान में दूसरे खुमैनी का उदय हो जाएगा और उन्हें इससे भय रहता था क्योंकि शहीद बहिश्ती वास्तव में एसे ही थे।

    शहीद बहिश्ती वर्ष १९६२ में इमाम खुमैनी के नेतृत्व में आंदोलन आरंभ होने के साथ ही इस आंदोलन से जुड़ गये। वे संघर्ष व आंदोलन में सक्रिय मुख्य धर्मगुरुओं में से एक थे। शाही सरकार की खुफिया एजेन्सी सावाक सदैव उन पर गहरी नज़र रखती थी और उन्हें कई बार जेल में भी बंद किया। वर्ष १९६४ में जर्मनी के हम्बर्गनगर में रहने वाले मुसलमानों ने, आयतुल्लाहिल उज़मा बुरुजर्दी की आर्थिक सहायता से बनायी जाने वाली मस्जिद के लिए एक धर्मगुरु की मांग की। ईरान में शाही सरकार की ओर से चूंकि शहीद बहिश्ती के लिए खतरा बढ़ता जा रहा था इस लिए उनके मित्र धर्मगुरुओं ने सलाह दी कि वे जर्मनी चले जाएं। शहीद बहिश्ती वर्ष १९६५ में जर्मनी के नगर हम्बर्ग गये और पांच वर्षों तक वहां रहे। इस दौरान उन्होंने जर्मन भाषा भी सीख ली और जर्मनी में व्यापक स्तर पर अपनी गतिविधियां आरंभ की। उन्होंने फार्सी भाषी छात्रों के इस्लामी संगठन की हम्बर्ग में आधारशिला रखी। इस संदर्भ में वे स्वंय कहते हैं कि मैं हम्बर्ग में रह रहा था किंतु मेरी गतिविधियों का दायरा पूरा जर्मनी, आस्ट्रिया और स्विट्ज़रलैंड तथा ब्रिटेन के कुछ भागों तक फैला हुआ था। इसी प्रकार स्वीडन, हालैंड, बेल्जियम, अमरीका, इटली और फ्रांस से भी पत्रों द्वारा संपर्क था। मैंने इस्लामी छात्र संगठनों की बधार शिला रखी , उनके साथ सहयोग किया और उन्हे सलाह दी और उनके सम्मेलनों में भाषण दिया। मस्जिद से जो पैसा मिलता था उसे में इन्हीं संगठनों पर खर्च करता। हमने हम्बर्ग की मस्जिद में रात दिन सक्रिय रहने वाला एक इस्लामी छात्र संगठन बनाया था।

    डाक्टर बहिश्ती ने इस केन्द्र का नाम ईरानियों की मस्जिद से बदल कर हम्बर्ग इस्लामी केन्द्र रखा जिसके कारण गैर ईरानी मुसलमान भी इस मस्जिद में जाने लगे। वे जब तक जर्मनी में रहे विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में व्यस्त रहे। इस दौरान उन्होंने मनुष्य के जीवन में आस्था, कौन सा धर्म, इस्लाम, संघर्ष का धर्म और युरोप में इस्लाम की वाणी  जैसी पुस्तकें भी लिखीं। इसी प्रकार वे युरोप के बुद्धिजीवियों के साथ बैठकें आयोजित करते और इस्लाम पर पश्चिम की आपत्तियों व शंकाओं का उत्तर देते और उनका निवारण करते।

    वर्ष १९६६ में वे जर्मनी से हज करने गये और इसी अवसर पर उन्होंने तुर्की, सीरिया और लेबनान की भी यात्रा की तथा अन्य देशों के संघर्षकर्ताओं से वार्ता की। वर्ष १९६९ में इराक़ के नजफ नगर में वे इमाम खुमैनी की सेवा में गये और जर्मनी में ज़ायोनी शासन के विरुद्ध बयान जारी किया। अन्ततः वर्ष १९७० में असीम अनुभवों के साथ वे ईरान लौट आए। जर्मनी से ईरान वापसी के बाद फिर कभी भी सावाक ने उन्हें ईरान से बाहर नहीं जाने दिया। उन्होंने तेहरान में अपनी गतिविधियां पुनः आरंभ कीं। कुरआन की समीक्षा की क्लास रखी और युवाओं से वार्ता हेतु बैठकों का आयोजन किया। डाक्टर बहिश्ती अपने भाषण में इस्लामी जगत विशेषकर फिलिस्तीन से संबंधित विषयों को बहुत अधिक महत्व देते थे और कहते थे कि जब तक इस्लामी सरकारों में एकता नहीं होगी उन्हें सफलता प्राप्त नहीं होगी।

    वर्ष १९७८ में जब ईरानी जनता और शाही सरकार  के विरुद्ध टकराव अपनी चरम सीमा पर पहुंचने लगा तो वह समय इस्लामी क्रांति के लिए अत्यन्त संवेदनशील काल रहा है। शहीद बहिश्ती, शाह के विरूद्ध लोगों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। यही कारण है कि सावाक ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा कि ईरान में इमाम खुमैनी की गतिविधियों को आगे बढ़ाने वाले मुख्य व्यक्ति बहिश्ती हैं। इमाम खुमैनी ने अक्तूबर वर्ष १९७८ में पेरिस पलायन के बाद क्रांति परिषद की रचना की ताकि अंतरिम सरकार बना कर कानूनी रूप से सरकार के गठन तक देश का संचालय कर किया जा सके। जिन लोगों को आरंभ में ही इस परिषद का सदस्य बनाया उनमें डाक्टर बहिश्ती भी थे।

    अन्ततः दसियों हज़ार शहीदों का खून रंग लाया और फरवरी वर्ष १९७९ में ईरान में इस्लामी क्रांति सफल हो गयी। क्रांति की सफलता के बाद की संवेदनशील परिस्थितियों में और विभिन्न भ्रष्ट दलों और धड़ों की उपस्थिति में किसी एसे संगठन की बहुत अधिक आवश्यकता थी जो इमाम खुमैनी के विचारों के आधार पर आगे बढ़ता हो इसी लिए शहीद बहिश्ती ने मार्च १९७९ में वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई तथा अन्य साथियों के सहयोग से जुम्हूरी इस्लामी पार्टी की आधार शिला रखी। यह दल, क्रांति के श्रद्धा रखने वालों का संगठन था और जनता में इसे अत्याधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। आयतुल्लाह बहिश्ती शहीद होने तक इस पार्टी के महासचिव रहे।

    उन्होंने इसी प्रकार विशेषज्ञ संसद के लिए होने वाले चुनाव में भाग लिया और संविधान की रचना के लिए विशेषज्ञ परिषद के सदस्य बने। उन्होंने इस्लमी गणतंत्र ईरान के संविधान की रचना में सक्रिय भूमिका निभाई और उनका एक महत्वपूर्ण काम, ईरान के संविधान में वरिष्ठ धार्मिक नेतृत्व के स्थान को मज़बूत करना रहा है। यह संविधान इमाम खुमैनी की पुष्टि के बाद संसद में पारित हो गया। इस्लामी गणतंत्र ईरान के संविधान के पारित होने के बाद इमाम खुमैनी ने शहीद बहिश्ती की विशेषताओं व दक्षताओं के दृष्टिगत उन्हें न्यायपालिका का प्रमुख बनाया।

    इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद अमरीका और क्रांति के शत्रुओं ने डाक्टर बहिश्ती को बदनाम करने का भरसक प्रयास किया क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि वे क्रांति के एक स्तंभ हैं और जनता में उन्हें अत्याधिक लोकप्रियता प्राप्त है। इन परिस्थितियों में भी शहीद बहिश्ती अत्यन्त धैर्य व संयम के साथ अन्य लोगों से सम्मान के साथ व्यवहार करते थे। उनका पवित्र मन उन्हें कभी भी क्रोध की अनुमति नहीं देता और न ही वे अपने विरोधियों के प्रति आक्रामक शैली अपनाते । वे सदैव तर्क व पारदर्शिता में विश्वास रखते थे। इसी लिए जनता में भी उनका विशेष सम्मान था। इसी लिए जब क्रांति के विरोधी, हर प्रकार से विफल हो गये तो उन्होंने उनकी हत्या का षडयंत्र रचा और २८ जून वर्ष १९८१ में जुम्हूरी इस्लामी दल में  आतंकवादी संगठन एमकेओ के एक एजेन्ट ने बम विस्फोट कर दिया जिसमें डाक्टर बहिश्ती और क्रांति की ७२ महत्वपूर्ण हस्तियां शहीद हो गयीं। इमाम खुमैनी ने डाक्टर बहिश्ती के शहीद हो जाने पर कहा कि बहिश्ती ने संघर्ष में जीवन बिताया और संघर्ष करते हुए मौत को गले लगाया वे शत्रुओं की आंखों का कांटा थे। इमाम खुमैनी ने इसी प्रकार शहीद बहिश्ती को एक राष्ट्र कहा और उनके व्यक्तित्व के बारे में इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग कियाः मैं बीस वर्षों से अधिक समय से उन्हें जानता था और इन अत्याचारियों ने कुछ फैला रखा था उसके विपरीत मैं उन्हें एक प्रतिबद्ध, संघर्षकर्ता, संचालक, राष्ट्रप्रेमी, इसलामी प्रेमी तथा अपने समाज के लिए लाभदायक समझता था।

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