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    आयतुल्लाह सैय्यद मुजतबा मूसवी लारी – 1

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    ऐसे विशिष्ट विद्वान कि जिन्होंने अपना जीवन आत्मा की शुद्धि एवं धर्म की सेवा में बिताया है, सर्वश्रेष्ठ मनुष्य माने जाते हैं। इसलिए कि उन्होंने जीवन को दुनिया का सुख प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि मनुष्यों की सेवा एवं मानवीय विचारों के विकास के लिए गुज़ारा है और मानवीय समाज की उल्लेखनीय सेवा की है।

    ऐसे ही विशिष्ट विद्वानों में से एक आयतुल्लाह सैय्यद मुजतबा मूसवी लारी थे। उन्हें वर्तमान समय के ऐसे इस्लाम के प्रचारकों एवं प्रसारकों में माना जाता है कि जिन्होंने दृढ़ विश्वास और भरसक प्रयत्न से बुद्धिजीवियों एवं सत्य की खोज करने वाले युवाओं के प्रश्नों के उत्तर दिए हैं। अब तक बड़ी संख्या में लोग उनकी किताबें पढ़कर मुसलमान हो चुके हैं।

    सैय्यद मुजतबा मूसवी लारी ऐसे विनम्र एवं विशिष्ट बुद्धिजीवी थे कि जिन्होंने शोर शराबे एवं घटिया प्रचार से दूर एक छोटे से घर में रह कर उच्च विचारों एवं पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों के प्रेम से परिपूर्ण हृदय के साथ विश्व भर में आध्यात्मिक सहायता पहुंचायी और लोगों को मुक्ति का मार्ग दिखाया तथा उन्हें मुक्ति दाता धर्म इस्लाम की ओर आकर्षित किया। इस कार्यक्रम में हम इस सशक्त बुद्धिजीवी के जीवन एवं आकर्षक व्यक्तित्व से अधिक परिचित होंगे।

    1935 में दक्षिणी ईरान के फ़ार्स प्रांत में स्थित लार शहर में इमाम मूसा काज़िम (अ) के एक पौत्र का जन्म हुआ कि जिसका नाम मुजतबा रखा गया। उस बच्चे का पालन पोषण धर्म में गहरी आस्था रखने वाली मां की गोद और विशिष्ट विद्वान पिता के हाथों में हुआ। सैय्यद मुजतबा ने प्रारम्भिक इस्लामी शिक्षा लार में प्राप्त की और अपने महान पिता आयतुल्लाह सैय्यद असग़र लारी के ज्ञान से काफ़ी लाभ उठाया। उसके बाद 18 वर्ष की आयु में 1953 में उच्च धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए क़ुम गए। वहां उन्होंने धार्मिक शिक्षा केन्द्र के विद्वानों एवं वरिष्ठ गुरुओं से उच्च शिक्षा प्राप्त की और लाभ उठाया तथा अपने ज्ञान एवं आध्यात्म में वृद्धि की, उन्होंने क़ुम में उच्च स्तर तक धार्मिक शिक्षा प्राप्त की।

    सैय्यद मुजतबा को युवा अवस्था में आमाशय का रोग हो गया, लेकिन रोग की पीड़ा कभी भी उनकी पढ़ाई में रुकावट नहीं बनी। लिखने में उनकी विशेष कुशलता तथा आकर्षक एवं सुन्दर लिखने के कारण और धार्मिक शिक्षा केन्द्र के गुरुओं के प्रोत्साहन से उन्होंने धार्मिक पत्रिकाओं के लिए लिखना शुरु किया। उनके लेख इतने आकर्षक थे कि मकतबे इस्लाम नामक पत्रिका में छपते थे। इस पत्रिका में धार्मिक शिक्षा केन्द्र के गुरुओं के लेख प्रकाशित होते थे, लेकिन सैय्यद मुजतबा एक छात्र होने के बावजूद इस पत्रिका के लिए नैतिक विषयों से संबंधित लेख लिखते थे। अंततः यह लेख नैतिक एवं मानसिक समस्याएं शीर्षक एक किताब के रूप में प्रकाशित हुए।

    आयतुल्लाह मूसवी लारी शिक्षा प्राप्ति और लिखने में व्यस्त रहने के बावजूद सामाजिक एवं राजनीतिक मामलों से अनभिज्ञ नहीं थे बल्कि इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।

    रोग के कारण, 1963 में आयतुल्लाह मूसवी लारी ने जर्मनी की यात्रा की। उपचार के लिए जर्मनी की यात्रा ने उनके लिए एक दूसरा द्वार खोल दिया और उन्हें पश्चिमी सभ्यता को निकट से देखने का अवसर प्राप्त हुआ, लेकिन दूसरे लोगों के विपरीत वे उसके बाहरी रूप से प्रभावित नहीं हुए। इसके बाद ही आयतुल्लाह मूसवी लारी ने इस्लाम व सीमाए तमद्दुने ग़र्ब अर्थात इस्लाम और पश्चिमी सभ्यता शीर्षक आश्चर्यचकित किताब लिखी। उन्होंने इस किताब में पश्चिमी एवं इस्लामी सभ्यता के आयामों की समीक्षा की और व्यापक एवं ठोस प्रमाणों के आधार पर तुलना करके पश्चिमी सभ्यता पर इस्लामी सभ्यता की वरीयता को सिद्ध किया।

    ईरान में इस्लाम व सीमाए तमद्दुने ग़र्ब के पहली बार प्रकाशन के बाद, ब्रिटेन के पूरब मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ैसर गोल्डिन ने स्वेच्छा से उसका अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद करने की इच्छा प्रकट की। यह किताब ब्रिटेन में प्रकाशित हुई और संचार माध्यमों में इसकी चर्चा हुई तथा इस संबंध में लेख प्रकाशित हुए।

    ब्रितानी रेडियो ने अनुवादक से साक्षात्कार लिया और अनुवाद के कारणों एवं किताब के बारे में चर्चा की। प्रोफ़ैसर गोल्डिन ने आयतुल्लाह मूसवी लारी की ख़ुदा शनासी अर्थात ईश्वर की पहचान शीर्षक एक पुस्तिका का अनुवाद भी किया कि जिसका अब तक आठ भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद के बाद जर्मन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ैसर डा. रोल्फ़ सिंगलर ने इस्लाम व तमद्दुने ग़र्ब का जर्मन भाषा में अनुवाद किया, इस अनुवाद ने भी जर्मनी में गहरा प्रभाव छोड़ा। यहां तक कि जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के एक नेता ने अनुवादक को पत्र लिख कर कहा कि इस किताब ने मुझे अधिक प्रभावित किया है और इसने इस्लाम के प्रति मेरा दृष्टिकोण परिवर्तित कर दिया तथा मैं अपने मित्रों से इस किताब को पढ़ने की सिफ़ारिश करूंगा।

    अंग्रेज़ी में अनुवाद होने के साथ ही भारत के एक विद्वान मौलाना रोशन अली ने उसका उर्दू भाषा में अनुवाद किया जो भारत और पाकिस्तान में प्रकाशित हुआ और अब तक कई बार पुनः प्रकाशित हो चुका है। अमरीका में भी इसका प्रकाशन हुआ, पहले होस्टन और फिर न्यूयॉर्क में यह किताब प्रकाशित हुई। इस्लाम व तमद्दुने ग़र्ब का अब तक अंग्रेज़ी, जर्मन, उर्दू, फ़्रैंच, जापानी, अरबी, स्पैनिश, थाईलैंडी, रूसी, मलायु, कुर्दी, बोस्नियाई, ताजिकी, आज़री, तुर्की, इतालवी इत्यादि भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

    इस्लामी क्रांति की सफ़लता से पहले सैय्यद मुजतबा मूसवी लारी ने बहुत ही समझदारी से इस्लामी एवं ईश्वरीय मूल्यों की रक्षा के लिए अपनी राजनीतिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां जारी रखीं। वे धार्मिक प्रचारकों को आमंत्रित करते थे कि लार आयें और युवाओं को इस्लामी संस्कृति से अवगत करें। उदाहरणस्वरूप उन्होंने हुजत्तुल इस्लाम मोहसिन क़राती से कहा कि वे लड़कियों और लड़कों के स्कूलों में जाकर हिजाब अर्थात पर्दा करने के विषय पर चर्चा करें। उनकी इस गतिविधि पर शाही शासन की ख़ुफ़िया एजेंसी ने प्रतिक्रिया जताई, लेकिन आयतुल्लाह मूसवी लारी ने अपनी सांस्कृतिक गतिविधियां जारी रखीं।

    उन्होंने वर्ष 1343 हिजरी शम्सी में लार में एक कल्याणकारी संस्था की स्थापना की तथा इस्लामी प्रचार और ग़रीबों की सेवा का कार्य शुरू किया और 1347 तक यह काम जारी रहा। यह संस्था गांवों में इस्लामी शिक्षाओं के प्रचार के लिए धार्मिक छात्रों को भेजती थी तथा धार्मिक कक्षाओं की स्थापना करती थी और हज़ारों ज़रूरतमंद छात्रों को कपड़े और पढ़ने लिखने की सामग्री उपलब्ध कराती थी। इस संस्था की बुनियादी सेवाओं में गांवों में मस्जिदें, इमामबाड़े और चिकित्सालयों का निर्माण था तथा यह संस्था अन्य दूसरी सेवाएं भी उपलब्ध कराती थी।

    सैय्यद मुजतबा मूसवी लारी ने लार शहर में एक अनैतिक पत्रिका के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। यह पत्रिका पश्चिमी जीवन शैली एवं संस्कृति का प्रचार करती थी और उसमें अनैतिक बातें छपती थीं। इसी प्रकार उन्होंने लार शहर में अश्लील गार्डेन पार्टी के आयोजन की अनुमति नहीं दी। उनके अटल एवं स्पष्ट निर्णय से शाह की सुरक्षा एजेंसियों में खलबली मच गई और उन्होंने तुरंत उसके रद्द करने का आदेश दिया।

    उन्होंने मकतबे इस्लाम पत्रिका में इस्लामी एवं नैतिक लेखों का प्रकाशन जारी रखा तथा 1353 हिजरी शम्सी में यह लेख रिसालते अख़लाक़ दर तकामुले इंसान अर्थात मनुष्य की प्रवीणता में नैतिकता की भूमिका नामक किताब के रूप में प्रकाशित हुए। आयतुल्लाह मूसवी लारी ने क्रांति की सफलता से पूर्व अमरीका की एक इस्लामी संस्था के निमंत्रण एवं उपचार के उद्देश्य से अमरीका की यात्रा भी की। उन्होंने वहां मुसलमान विशेषज्ञों के साथ विदेशी भाषाओं में इस्लामी शिक्षाओं के प्रचार व प्रसार के संबंध में विचार विमर्श किया और उसके बाद ब्रिटेन और फ़्रांस गए और वापस लौटने के बाद इस्लामी आइडियालॉजी के बारे में अनेक लेख लिखे। यह लेख कि जो इस्लामी विश्वासों के बारे में थे इस्लाम के मूल विश्वास शीर्षक चार खंडो में प्रकाशित हुए और विभिन्न भाषाओं में इनका अनुवाद हुआ।

    उन्होंने 1976 में क़ुम में विदेशों में इस्लामी संस्कृति के विस्तार के नाम से एक संस्था की स्थापना की, बाद में जिसका नाम बदल कर विश्व में इस्लामी शिक्षाओं के प्रसार के केन्द्र हो गया। यह केन्द्र आज भी इस्लामी पुस्तकों और विशेषकर उनकी रचनाओं के अनुवादों को प्रकाशित करता है तथा उसका उद्देश्य विश्व भर में क़ुरान व इस्लामी शिक्षाओं का प्रचार व प्रसार करना है। इस केन्द्र से प्रकाशित होने वाली पुस्तकों को विश्व भर से इस्लामी शिक्षाओं की प्राप्ति के इच्छुक लोगों एवं संस्थाओं को निशुल्क भेजी जाती हैं। अब तक इस केन्द्र को विश्व भर एवं विभिन्न राष्ट्रों से हज़ारों पत्र प्राप्त हुए हैं कि जिनमें इस्लाम के प्रति लगाव का उल्लेख किया गया है। अभी भी इस केन्द्र में हज़ारों पत्र सुरक्षित रखे हैं और इसी प्रकार यह संस्था विश्व भर में इस्लामी प्रचार जारी रखे हुए है।

    इसी प्रकार इस संस्था ने अंग्रेज़ी, फ़्रैंच, स्पैनिश और रूसी भाषा में क़ुराने मजीद का अनुवाद प्रकाशित किया है कि जो आवेदकों को उपहार स्वरूप भेजे जाते हैं। वर्ष 1993 में आज़रबाईजान में आयतुल्लाह मुजतबा मूसवी लारी की किताबों के प्रभाव के दृष्टिगत बाकू स्थित आज़रबाईजान गणराज्य एकेडमी की ओर से मानद डॉक्टरेट की डिगरी प्रदान की गई और एक समारोह का आयोजन किया गया।

    आयतुल्लाह मूसवी लारी एक निष्ठावान व्यक्ति थे कि जो अपनी सफलताओं को ईश्वर एवं पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों की कृपा मानते थे। वे क़ुम स्थित धार्मिक शिक्षा केन्द्र में शिक्षक थे, लेकिन बीमारी के कारण उन्होंने अपना अधिक समय लार में विश्व भर से आने वाले पत्रों का उत्तर देने में बिताया। इसी प्रकार विश्व भर से लोग उनसे मिलने आते थे। बीमार रहने के बावजूद वे महमानों का स्वयं स्वागत करते थे। हर व्यक्ति उनके पास पहुंचकर शांति का आभास करता था और उनकी बातों से सीख लेता था। उनका घर बहुत ही सादा था। आयतुल्लाह मूसवी लारी के तीन बेटे और तीन बेटियां हैं, वे भी धार्मिक शिक्षा केन्द्रों एवं विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं।

     

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