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    इब्ने तेमिया की नाकामी की दलीलें

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    जैसा कि आलिम हज़रात जानते हैं वहाबी मज़हब का पैशवा और रेहबर जैसा कि उसने ख़ुद इस बात को क़बूल किया है “इब्ने तेमिया” के साथ ही उठता बैठता था इब्ने तेमिया भी शिर्क, तौहीद, शिफ़ाअत और इस जैसी तमाम बातों में यही नज़रया रखता था लेकिन क्या हुआ वोह दमिश्क़ में जो कि उन के काम का ठिकाना था अपनी इस फ़िक्र को आम लोगों में नहीं फैला सका और शामियों से यह ख़तरा दूर रहा लेकिन इसका शागिर्द “मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब” कामयाब हो गया आख़िर क्यों?

    मुनासिब है कि सब से पहले इब्ने तेमिया की ज़िन्दगी की तारीख़ की तरफ़ हलका सा इशारा करता चलूँ।
    अहमद बिन अब्दुल हकीम बिन तेमिया हम्बली (पैदाइश सन 661 हिज्री और वफ़ात सन 728 हिज्री में हुई) शहरे हरान (शाम के एक शहर) में पैदा हुआ और तातारीयों के ज़ुल्म और सितम की वजह से अपने घर वालों के साथ “हरान” से दमिश्क़ चला आया।
    क्यों कि वोह हम्बली मसलक से था इस लिये हम्बली मसलक की तबलीग़ में लग गया और हम्बलियों की तरह वोह भी इल्मे कलाम को इन्कार करता था और मुतकल्लेमीन को अहले बिदअत समझता था, अल्लाह की सीफ़ात के मसअले में हम्बलियों की तरह अल्लाह की सीफ़ात बयान करने के लिये जो अलफ़ाज़ हदीस में आये हैं बग़ैर तफ़सीर और सबूद के क़बूल कर लिया और पूरी तरह से हर तरह की अक़ली दलील का सिरे से इन्कार कर दिया उसने अहले हदीस के अक़ीदे और उन के तरीक़े की हिमायत के अलावा ख़ुद भी नऐ अक़ीदों का इज़ाफ़ा किया जोकि इस से पहले बिल्कुल मौजूद नहीं थे।
    मिसाल के तौर पर उस ने पैग़म्बरे अकरम (स.) की क़ब्र की ज़ियारत के सफ़र करना आँहज़रत की क़ब्र से बरकत लेना और अहले बैत अलैहिमुस्सलाम को वसीला बनाना उसकी नज़र में शिर्क था, अहले बैत (अ.) की फ़ज़ीलतों का जो कि अहले सुन्नत की किताब सहाहे सित्ता यहाँ तक कि मसनद में और इमाम अहमज बिन हम्बल के ज़रीये ज़िक्र है और उस में मौजूद थे इन्कार कर दिया वोह कोशिश करता था कि बनी उमय्या की तरह इमाम अली अलैहिस्सलाम और आप के बैटों की शान व अज़मत को घटा दे।
    लेकिन इब्ने तेमिया की फ़िक्र और दावत को अहले सुन्नत के उलेमा ने क़बूल नहीं किया सिवाये इब्ने क़ीम जैसे कुछ शागिर्दों के दूसरे बुज़ुर्ग अहले सुन्नत उलेमा ने उसकी सब के सामने मुख़ालेफ़त की और उसके नज़रियों व बिदअतों के ख़िलाफ़ कई तरह की किताबें भी लिखीं, जैसे उसके ज़माने के एक आलिम ज़हबी ने एक ख़त लिखा और उसे अपनी मुख़ालेफ़ का निशाना बनाया और सही हदीसों को क़बूल करने के लिये कहा।
    “ज़हबी” उसको मुख़ातब कर के लिखा “अब जब कि अपनी उम्र के सत्तर साल गुज़ार चुके हो और इस दुनिया स जाने का वक़्त करीब है क्या अब वोह वक़्त नहीं आया अपनी हरकतों से तौबा व इस्तग़फ़ार कर लो?”
    मिस्र में भी अहले सुन्नत के चार फ़िर्क़ों के क़ाज़ी अलक़ज़ात ने भी इब्ने तेमिया के अक़ीदों को ग़लत और बिदअत बताया लेकिन बारवीं सदी हिज्री में मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने सर उठाया और इब्ने तेमिया की हिमायत शुरु कर दी और स से ज़्यादा उसके नऐ अक़ीदों की पढ़ चढ़ कर ताकीद (हिमायत) की।
    ज़िक्र किये गये अक़ीदों के अलावा, इब्ने तेमिया दूसरे ख़ास अक़ीदों को भी मानता था वोह सन 698 हिज्री में हस्सास ऐतेक़ादी बहसों में ख़ुद को दाखिल कर के अपने मुख़ालिफ़ों से मुनाज़रा करने लगता इस के तमाम अक़ीदों और अमल के तरीक़ों के सिलसिले में नीचे दी गईं बातों की तरफ़ इशारा किया जा सकता है।
    1-    शरई हदें ख़ुद जारी करता था।
    2-    बच्चों के सर के बाल मुंडवाया करता था।
    3-    जो उसके अक़ीदों के ख़िलाफ़ थे उन से लड़ने के लिये तैयार रहता था।
    4-    लोगों को नेक कामों में चन्दा देने से रोकता था।
    5-    ख़ुदा वन्दे आलम को मेहसूस कर के उसको देखने का अक़ीदा रखता था।
    6-    ख़्वारिज के बारे में यह अक़ीदा था कि …الخوارج مع مروقهم من الّدین أصدق الناس  इस के बा वजूद कि ख़्वारिज दीन से पलट गऐ थे फिर भी वोह बहुस सच्चे लोगों में से थे।
    उस के मुसबत कामों में एक यह था कि उसने सन 702 हिज्री में मुग़लों के ख़िलाफ़ मुसबत क़दम उठाये थे। अल्लामा अमीनी ने इब्ने तेमिया के कलाम “पैग़म्बरे इस्लाम की पहली दावत पर मब्नी हदीसः—व अनज़िर अशीरताकल अक़राबीन” की मुख़ालेफ़त के बाद नक़्ल करते हुऐ कि वोह हदीस की सनद को सही नहीं जानता था फ़रमाते हैं “उस से इस बात का अंजाम पाना कोई अजीब बात नहीं क्यों कि वोह एक ऐसा ताअस्सुब पसन्द शख़्स था जो ज़रूरियात को इन्कार, मुसलमानों की तकफ़ीन ख़ास तौर से आइम्मा अहले बैत अलैहिमुस्साल की तमाम फ़ज़ीलतों का इन्कार करता था।” (अलग़दीर, जिल्द 2, पेज 280)
    इब्ने तेमिया के सब से ज़्यादा हिमयतों में किताबुल बिगायह वल निहायह के लिखने वाले इब्ने कसीर मुतवफ़्फ़ा सन 744 हिज्री का नाम लिया जा सकता है जिन्हों ने अपनी पूरी किताब में हर मौक़े पर इब्ने तेमिया की तारीफ़ की और उसका बचाओ किया है।
    इब्ने तेमिया के ज़माने के उलेमा में से जिस ने इन का बचाओ किया है और जिस की वजह से समाज में अपने लिये लोगों की नफ़रत ख़रीद ली मशहूर मोहद्दिस “तेहज़िबुल कमाल” हैं जिन्हों ने सन 742 हिज्री में वफ़ात पाई।
    इब्ने तेमिया के दूसरे शागिर्दों में “अहमद बिन मुहम्मद बिन मरी लैला हनबली” हैं जो इब्ने हज्र के कहने के मुताबिक़ पहले वोह इब्ने तेमिया के मुख़ालिफ़ थे लेकिन जब उन से मुलाक़ात हुई तो उन के दोस्त और शागिर्दों में हो गये उसकी तारीफ़े लिखी और उनकी तरफ़ारी में बहुत ज़्यादा काम किया और ज़ियारत के सफ़र वाले मसअले की पलट में उसकी तरफ़ से बचाओ किया कि उसके नतीजे में “अख़नाई” “क़ाज़ी मलकी” ने उसको बुलाया और उसको इतना मारा कि उसका जिस्म खून से लाल हो गया और फिर हुक्म दिया कि सर मुंडवा कर कधे पर सवार कर के शहर में फिराया जाये ताकि ज़लील हो।
    बेशक इब्ने तेमिया का सबसे बड़ा शागिर्द और बहुत सख़्त हिमायती “इब्नुल क़ीमुल जूज़ीयह” था जिस ने उसकी तमाम बातों और अक़ीदों में बिना सवाल किये उसकी पैरवी की। और इब्ने तेमिया की ज़िन्दगी के दौरान और मौत के बाद उसके अक़ीदों को फैलाने को अपनी ज़िम्मेदारी समझा, दसियों बार क़ैद में गया और इसी जुर्म में ताज़ीयाने भी खाऐ, ऊँट पर बैठा कर शहर में फेराया गया और इब्ने तेमिया के साथ क़िलआ दमिश्क़ में क़ैद भी किया गया।
    अब आईये अस्ली मौज़ू की तरफ़ देखें कि आख़िर क्यों इब्ने तेमिया शाम में सुलफ़ी दस्तरख़्वान फैलाने में कामयाब नहीं हुआ लेकिन मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने इसको नजुद की ज़मीन में फैला दिया और हलके हलके पूरे अरब में फैल गया और उन अक़ीदों को आईने वहाबियत के नाम से तारीख़ में दर्ज करा दिया?
    इस बात की दो वजह थीं :-
    पहली यह कि उस ज़माने में दमिश्क़ और शाम उलूमे इंसानी का मरकज़ था जहाँ मशहूर व मारूफ़ उलेमा रहते थे और दीनी मदर्सों का मरकज़ था उन्हों ने इब्ने तेमिया की ख़ताओं का टूट कर मुक़ाबला किया, इस के बावजूद कि उसने अपने तरफ़दारों की काफ़ी तादाद बना ली थी उन लोगों ने अपनी दलीलों से उसके दाएरे को तौड़ दिया हालांकि नजुद की सर ज़मीन उस वक़्त इस ऐतेबार से बिलकुल हाथ खाली थी उन शुबहात का जैसा कि मुक़ाबला किया जाना चाहिये था किया नहीं गया जिस की वजह से यह नज़रियात फैलते चले गये, तारीख़ के दौर में जो इलाक़े उलेमा और दानिशवरों के साय में रहे इस तरह की मुसीबतों से मेहफ़ूज़ रहे।
    दूसरे यह कि उस वक़्त नजुद के क़बीलों में हुकूमत और मनसब को हासिल करने पर सख़्त इख़्तिलाफ़ और झगड़े थे, मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने जैसा कि तारीख़ों में मौजूद है इस मौक़े से फ़ाएदा उठाया और आले सऊद के साथ वादा किया कि अगर वोह इस के नज़रियात की हिमायत करेंगे तो वोह अपने हामियों के ज़रीये उनके हुकूमत बनाने और हुकूमत को फैलाने में मदद करेगा जबकि शाम और दमिश्क़ में न तो ऐसा माहौल था और न ही इब्ने तेमिया ने इस तरह का कोई मनसूबा बनाया था।