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    इमाम ख़ुमैनी के जीवन में पैग़म्बरे इस्लाम की विशेषताओं की झलक

    इमाम ख़ुमैनी के जीवन में पैग़म्बरे इस्लाम की विशेषताओं की झलक
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    चौदह खुरदाद वर्ष 1368 हिजरी शम्सी अर्थात चार जून वर्ष 1989 ईसवी को विश्व एक ऐसे महापुरूष से हाथ धो बैठा जिसने अपने चरित्र, व्यवहार,अदम्य साहस, समझबूझ और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास के साथ संसार के सभी साम्राज्यवादियों

    विशेषकर अत्याचारी व अपराधी अमरीकी सरकार का डटकर मुक़ाबला किया और इस्लामी प्रतिरोध की पताका पूरी धरती पर फहराई। इमाम खुमैनी का पवित्र और ईश्वरीय भय से ओतप्रोत जीवन ईश्वरीय प्रकाश को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है और वह पैगम्बरे इस्लाम (स) की जीवन शैली से प्रभावित रहा है। इमाम खुमैनी ने पैगम्बरे इस्लाम (स) के जीवन के सभी आयामों को अपने लिये आदर्श बनाते हुये पशिचमी एवं पूर्वी समाजों की संस्कृति की गलत व अभद्र बातों को रद्द करके आध्यात्म एंव ईश्वर पर विश्वास की भावना समाजों में फैला दी और यही वह वातावरण था जिसमें साहसी और ऐसे युवाओं का प्रशिक्षण हुआ जिन्होने इस्लाम का बोलबाला करने में अपने जीवन की बलि देने में भी हिचकिचाहट से काम नहीं लिया ।

    पैगम्बरे इस्लाम हजरत मोहम्मद (स) की पैगम्बरी की घोषणा अर्थात बेसत की वर्षगांठ की तिथि भी निकट है अतः हम इमाम खुमैनी के व्यक्तित्व पर इस आयाम से प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे कि उन्होने इस युग में किस प्रकार पैगम्बरे इस्लाम (स) के चरित्र और व्यवहार को व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत किया।

    पश्चिमी जगत में घरेलू कामकाज को महत्वहीन समझा जाता है। यही कारण है कि अनेक महिलायें अपने समय को घर के बाहर व्यतीत करने में अधिक रूचि रखती हैं। जबकि पैगम्बरे इस्लाम (स) के हवाले से बताया जाता है कि पैगम्बरे इस्लाम (स) ने एक दिन अपने पास मौजूद लोगों से पूछा कि वे कौन से क्षण हैं जब महिला ईश्वर से बहुत निकट होती है? किसी ने भी कोई उचित उत्तर नहीं दिया। जब हज़रत फ़ातिमा की बारी आई तो उन्होने कहा वह क्षण जब महिला अपने घर में रहकर अपने घरेलू कामों और सन्तान के प्रशिक्षण में व्यस्त होती है तो वह ईश्वर के अत्यन्त निकट होती है। स्वर्गीय इमाम खुमैनी भी पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पदचिन्हों पर चलते हुये घर के वातावरण में माता की भूमिका पर अत्यिधक बल देते थे।कभी-कभी लोग इमाम ख़ुमैनी से कहते थे कि महिला क्यों घर में रहे तो वे उत्तर देते थे कि घर के कामों को महत्वहीन न समझो, यदि कोई एक व्यक्ति का प्रशिक्षण कर सके तो उसने समाज के लिये बहुत बड़ा काम किया है। स्नेह व प्रेम स्त्री में बहुत अधिक होता है और परिवार का वातावरण और आधार प्रेम पर ही होता है।

    इमाम खुमैनी अपने कर्म और व्यवहार में अपनी पत्नी के बहुत अच्छे सहायक थे। इमाम खुमैनी की पत्नी कहती हैः चूंकि बच्चे रात को बहुत रोते थे और सवेरे तक जागते रहते थे, इस बात के दृष्टिगत इमाम खुमैनी ने रात के समय को बांट दिया था। इस प्रकार से कि दो घंटे वे बच्चों को संभालते और मैं सोती थी और फिर दो घंटे वे सोते थे और मैं बच्चों को संभालती थी। अच्छी व चरित्रवान सन्तान, सफल जीवन का प्रमाण होती है। माता पिता के लिये जो बात बहुत अधिक महत्व रखती है वह यह है कि उनका व्यवसाय और काम तथा जीवन की कठिनाइयां उनको इतना व्यस्त न कर दें कि वे अपनी सन्तान के लालन-पालन एवं प्रशिक्षण की अनदेखी करने लगें।

    पैगम्बरे इस्लाम (स) का कथन हैः अच्छी संतान, स्वर्ग के फूलों में से एक फूल है अतः आवश्यक है कि माता-पिता अपने बच्चों के विकास और सफलताओं के लिये प्रयासरत रहें।

    इमाम ख़ुमैनी बच्चों के प्रशिक्षण की ओर से बहुत अधिक सावधान रहते थे। उन्होने अपनी एक बेटी से,जिन्होंने अपने बच्चे की शैतानियों की शिकायत की थी कहा थाः उसकी शैतानियों को सहन करके तुमको जो पुण्य मिलता है उसको मैं अपनी समस्त उपासनाओं के सवाब से बदलने को तैयार हूं। इस प्रकार इमाम खुमैनी बताना चाहते थे कि बच्चों की शैतानियों पर क्रोधित न हों, और सन्तान के लालन-पालन में मातायें जो कठिनाइयां सहन करती हैं वे ईश्वर की दृष्टि में भी बहुत महत्वपूर्ण हैं और परिवार व समाज के लिये भी इनका महत्व बहुत अधिक है।

    स्वर्गीय इमाम खुमैनी के निकट संबंधियों में से एक का कहना है कि इमाम खुमैनी का मानना था कि बच्चों को स्वतंत्रता दी जाए। जब वह सात वर्ष का हो जाये तो उसके लिये सीमायें निर्धारित करो। वे इसी प्रकार कहते थे कि बच्चों से सदैव सच बोलें ताकि वे भी सच्चे बनें, बच्चों का आदर्श सदैव माता पिता होते हैं। यदि उनके साथ अच्छा व्यवहार करें तो वे अच्छे बनेंगे। आप बच्चे से जो बात करें उसे व्यवहारिक बनायें।

    हजरत मोहम्मद (स) बच्चों के प्रति बहुत कृपालु थे। उन्हें चूमते थे और दूसरों से भी ऐसा करने को कहते थे। बच्चों से प्रेम करने के संबंध में वे कहते थेः जो भी अपनी पुत्री को प्रसन्न करे तो उसका पुण्य ऐसा है जैसे हजरत इस्माईल पैगम्बर की सन्तान में से किसी दास को दास्ता से स्वतंत्र किया हो और वह व्यक्ति जो अपने पुत्र को प्रसन्न करे वह एसे व्यक्ति की भांति है जो ईश्वर के भय में रोता रहा हो और एसे व्यक्ति का पुरस्कार स्वर्ग है।

    पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही वसल्लम का जीवन बहुत ही साधारण, बल्कि साधारण से भी निम्न स्तर का था। हज़रत अली अलैहिस्सलाम उनके जीवन के बारे में बताते हैं कि पैग़म्बर (स) दासों के निमंत्रण को स्वीकार करके उनके साथ भोजन कर लेते थे। वे धरती पर बैठते और अपने हाथ से बकरी का दूध दूहते थे। जब कोई उनसे मिलने आता था तो वे टेक लगाकर नहीं बैठते थे। लोगों के सम्मान में वे कठिन कामों को भी स्वीकार कर लेते और उन्हें पूरा करते थे।

    स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी भी अपने जीवन के सभी चरणों में चाहे वह क़ुम के फ़ैज़िया नामक धार्मिक शिक्षा केन्द्र में उनकी पढ़ाई का काल रहा हो या इस्लामी गणतंत्र ईरान के नेतृत्व का समय उनका जीवन सदैव,अत्यधिक साधारण स्तर का रहा है। वे कभी इस बात को स्वीकार नहीं करते थे कि उनके जीवन का स्तर देश के साधारण लोगों के स्तर से ऊपर रहे।

    इमाम ख़ुमैनी के एक साथी का कहना है कि जब वे इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ में रह रहे थे तो उस समय उनका घर, किराये का घर था जो नया नहीं था। वह एसा घर था जिसमें साधारण छात्र रहते थे। इस प्रकार से कहा जा सकता है कि इमाम ख़ुमैनी का जीवन स्तर साधारण छात्रों ही नहीं बल्कि उनसे भी निम्न स्तर का था। ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के पश्चात शासन प्रणाली का नेतृत्व संभालने के बाद से अपने जीवन के अंत तक जमारान इमामबाड़े के पीछे एक छोटे से घर में रहे। उनके जीवन का आदर्श चूंकि पैग़म्बरे इस्लाम (स) थे अतः उन्होंने अपने घर के भीतर आराम देने वाला कोई छोटा सा परिवर्तन भी स्वीकार नहीं किया और इराक़ द्वारा थोपे गए आठ वर्षीय युद्ध में भी वे अपने उसी साधारण से पुराने घर में रहे और वहीं पर अपने छोटे से कमरे में विश्व के नेताओं से भेंट भी करते थे।

    पैग़म्बरे इस्लाम के आचरण, व्यवहार और शिष्टाचार के दृष्टिगत इमाम ख़ुमैनी ने इस्लामी क्रांति के नेतृत्व की कठिनाइयों को कभी व्यक्त नहीं किया और कभी भी स्वयं को दूसरों से आगे लाने का प्रयास भी नहीं किया। वे सदैव यही मानते और कहते रहे कि “मुझे यदि जनता का सेवक कहो तो यह इससे अच्छा है कि मुझे नेता कहो”

    इमाम ख़ुमैनी जब भी युद्ध के जियालों के बीच होते तो कहते थे कि मैं जेहाद और शहादत से पीछे रह गया हूं अतः आपके सामने लज्जित हूं। युद्ध में हुसैन फ़हमीदे नामक किशोर के शहीद होने के पश्चात उसके बारे में इमाम ख़ुमैनी का यह वक्तव्य बहुत प्रसिद्ध है कि हमारा नेता बारह वर्ष का वह किशोर है जिसने अपने नन्हे से हृदय के साथ, जिसका मूल्य हमारी सैकड़ों ज़बानों और क़लम से बढ़कर है हैंड ग्रेनेड के साथ स्वंय को शत्रु के टैंक के नीचे डाल दिया, उसे नष्ट कर दिया और स्वयं भी शहीद हो गया।

    लोगों के प्रेम का पात्र बनना और उनके हृदयों पर राज करना, विभिन्न कारणों से होता है और उनकी अलग-अलग सीमाएं होती हैं। कभी भौतिक कारण होते हैं और कभी व्यक्तिगत विशेषताएं होती हैं जो दूसरों को आकर्षित करती हैं और कभी यह कारण आध्यात्मिक एवं ईश्वरीय होते हैं और व्यक्ति की विशेषताएं ईश्वर और धर्म से जुड़ी होती हैं। ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन में वचन दिया है कि जो लोग ईश्वर पर ईमान लाए और भले कार्य करते हैं, कृपालु ईश्वर उनका प्रेम हृदयों में डाल देता है। इस ईश्वरीय वचन को पूरा होते हम सबसे अधिक हज़रत मुहम्मद (स) के व्यक्तित्व में देखते हैं कि जिनका प्रेम विश्व के डेढ अरब मुसलमानों के हृदय में बसा हुआ है।

    इमाम ख़ुमैनी भी पैग़म्बरे इस्लाम (स) के प्रेम में डूबे हुए हृदय के साथ इस काल के लोगों के हृदय में अनउदाहरणीय स्थान रखते हैं। इमाम ख़ुमैनी के बारे में उनके संपर्क में आने वाले ईरानियों ने तो उनके व्यक्तित्व एंव प्रवृत्ति के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा है ही विदेशियों ने भी माना है कि इमाम ख़ुमैनी समय और स्थान में सीमित नहीं थे। विश्व के विभिन्न नेताओं यहां तक कि अमरीकियों में भी जिसने इमाम ख़ुमैनी से भेंट की वह उनके व्यक्तित्व और बातों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका।इमाम ख़ुमैनी पूरे संतोष के साथ साधारण शब्दों में ठोस और सुदृढ़ बातें करते थे। उनके शांत मन और ठोस संकल्प को बड़ी से बड़ी घटनाएं और ख़तरे भी प्रभावित नहीं कर पाते थे। संसार को वे ईश्वर का दरबार मानते थे और ईश्वर की कृपा और सहायता पर पूर्ण विश्वास रखते थे तथा यह विषय, नेतृत्व संबन्धी उनके इरादों के बारे में बहुत प्रभावी था। इस बात को सिद्ध करने के लिए बस यह बताना काफ़ी होगा कि जब सद्दाम की सेना ने इस्लामी क्रांति की सफलता के तुरंत बाद ईरान पर अचानक आक्रमण किया तो इमाम ख़ुमैनी ने जनता से बड़े ही सादे शब्दों में कहा था कि “एक चोर आया, उसने एक पत्थर फेंका और भाग गया”। इमाम के यह सादे से शब्द, प्रकाश और शांति का स्रोत बनकर लोगों में शांति तथा साहस भरने लगे और चमत्कार दिखाने लगे। इमारी दुआ है कि उनकी आत्मा शांत और उनकी याद सदा जीवित रहे।