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    3. (3) इस्तिमना-

    (3) इस्तिमना-

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    (1597) अगर रोज़े दार इस्तिमना करे (इस्तिमना का अर्थ मसअला न0 1581 में बताया जा चुका है।) तो उस का रोज़ा बातिल हो जायेगा।

    (1598) अगर बेइख़्तियारी की हालत में किसी की मनी ख़ारिज़ हो जाये तो उस का रोज़ा बातिल नही है।

    (1599) अगरचे रोज़े दार को इल्म हो कि अगर दिन में सोयेगा तो उसे एहतिलाम(स्वप्न दोष) हो जायेगा यानी सोते में उस की मनी ख़रिज हो जायेगी तब भी उस के लिए सोना जायज़ है चाहे न सोने की वजह से उसे कोई तकलीफ़ भी न हो और अगर उसे एहतिलाम हो जाये तो उस का रोज़ा बातिल नही होता।

    (1600) अगर रोज़े दार मनी ख़रिज होते वक़्त नींद से बेदार हो जाये तो उस पर यह वाजिब नही कि मनी को निकलने से रोके।

    (1601) जिस रोज़े दार को एहतिलाम(स्वप्न दोष) हो गया हो तो वह पेशाब कर सकता है चाहे यह इल्म हो कि पेशाब करने से रुकी हुई बाक़ी मनी नली से बाहर आ जायेगी।

    (1602) जब रोज़े दार को एहतिलाम(स्वप्न दोष) हो जाये अगर उसे मालूम हो कि मनी नली में रह गयी है और अगर ग़ुस्ल से पहले पेशाब नही करेगा तो ग़ुस्ल के बाद मनी उस के जिस्म से ख़ारिज होगी तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि ग़ुस्ल से पहले पेशाब करे।

    (1603) जो शख़्स मनी निकालने के इरादे से छेड़-छाड़ करे तो चाहे मनी न भी निकले एहतियात कि बिना पर ज़रूरी है कि रोज़े को तमाम करे और उस की क़ज़ा भी बजा लाये।

    (1604) अगर रोज़े दार मनी निकालने के इरादे के बग़ैर मिसाल के तौर पर अपनी बीवी से छेड़छाड़ और हंसी मज़ाक़ करे और उसे इत्मिनान हो कि मनी ख़ारिज नही होगी तो अगरचे इत्तेफ़ाक़न मनी ख़ारिज भी हो जाये तो उस का रोज़ा सही है। अलबत्ता अगर उसे इत्मिनान न हो तो इस सूरत में अगर मनी ख़ारिज होगी तो उस का रोज़ा बातिल हो जायेगा।