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    इस्तेहाजा

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    औरतों को जो ख़ून आते हैं, उनमें से एक ख़ून इस्तेहाजः है। जिस वक़्त औरत को यह ख़ून आरहा होता है, उसे मुस्तेहाज़ः कहते हैं।

    398 इस्तेहाजः का ख़ून ज़्यादातर ज़र्द रंग का व ठंडा होता है और दबाव व जलन के बग़ैर निकलता है और आमतौर पर यह ख़ून गाढ़ा भी नही होता। लेकिन यह भी मुमकिन है कि कभी- कभी यह ख़ून सियाह, सुर्ख़, गर्म व गाढ़ा हो और जलन व दबाव के साथ आये।

    399  इस्तेहाजः तीन क़िस्म का होता हैः क़लीलः, मुतवस्सेतः और कसीरः

    इस्तेहाज़ -ए- क़लीलः यह है कि औरत अपनी शर्मगाह में जो रूई रखती है, ख़ून उसके सिर्फ़ ऊपरी हिस्से को आलूदा करे और उसके अन्दर सरायत न करे।

    इस्तेहाज़ -ए- मुतवस्सेतः यह है कि ख़ून रूई के अन्दर तक चला जाये अगरचे उसके एक कोने तक ही हो और रूई से उस कपड़े तक न पहुँचे जिसे औरतें आमतौर रूई के ऊपर ख़ून रोकने के लिए बाँधती हैं।

    इस्तेहाज़ -ए- कसीरः  यह है कि ख़ून रूई से निकलता हुआ, रूई के ऊपर बंधे कपड़े तक पहुँच जाये।

    इस्तेहाज़ः के अहकाम

    400 इस्तेहाज़ –ए- क़लीलः में हर नमाज़ के लिए अलग वुज़ू करना ज़रूरी है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि रूई को भी बदल या धो लिया जाये और अगर शर्मगाह के ज़ाहिरी हिस्से पर ख़ून लगा हो, तो उसे धोना भी ज़रूरी है।

    401  इस्तेहाज़ -ए- मुतवस्सेतः में, एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि औरत अपनी नमाज़ों के लिए रोज़ाना एक ग़ुस्ल करे और इससे पहले मसले में बयान किये गये इस्तेहाजः -ए- कलीलः के तमाम काम भी अंजाम दे। अगर सुबह की नमाज़ के दौरान औरत को इस्तेहाजः का ख़ून आये तो सुबह की नमाज़ के लिए ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। अगर जान बूझ कर या भूले से ग़ुस्ल न करे तो ज़ोह्र व अस्र की नमाज़ के लिए ग़ुस्ल करना ज़रूरी है और अगर ज़ोह्र व अस्र की नमाज़ के लिए ग़ुस्ल न करे तो मग़रिब व इशा की नमाज़ से पहले ग़ुस्ल करना ज़रूरी है, चाहे ख़ून आ रहा हो या बंद हो चुका हो।

    402 इस्तेहाज़ –ए- कसीरः में एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि औरत हर नमाज़ से पहले रूई व कपड़े का टुकड़ा बदले या उसे धोये। एक ग़ुस्ल सुबह की नमाज़ से पहले, एक ग़ुस्ल ज़ोह्र व अस्र की नमाज़ से पहले और एक ग़ुस्ल मग़रिब व इशा की नमाज़ से पहले करे। ज़ोह्र व अस्र और मग़रिब व इशा की नमाज़ के दरमियान फ़ासला न दे और अगर फ़ासला करे तो अस्र व इशा की नमाज़ से पहले दोबारा ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। यह अहकाम उस सूरत में हैं कि ख़ून बार बार रूई से पट्टी तक पहुँ रहा हो। अगर रूई से पट्टी तक ख़ून पहुँचने में इतना फ़ासिला हो जाये कि औरत उस फ़ासिले के अन्दर एक या एक से ज़्यादा नमाज़े पढ़ सकती हो, तो एहतियाते लाज़िम यह है कि जब ख़ून रूई से पट्टी तक पहुँच जाये, तो रूई व पट्टी को बदले या उन्हें धोये और ग़ुस्ल करे। इसी बिना पर अगर औरत ग़ुस्ल करे और मसलन ज़ोह्र की नमाज़ पढ़े लेकिन अस्र की नमाज़ से पहले या नमाज़ के दौरान ख़ून दोबारा रूई से पट्टी तक पहुँच जाये तो अस्र की नमाज़ के लिए भी ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। लेकिन अगर फ़ासिला इतना हो कि औरत उस दौरान दो या दो से ज़्यादा नमाज़े पढ़ सकती हो, तो ज़ाहिर यह है कि उन नमाज़ों के लिए दोबारा ग़ुस्ल करना ज़रूरी नही है। इन तमाम सूरतों में अज़हर यह है कि इस्तेहाज़ -ए- कसीरः में ग़ुस्ल करना वुज़ू के लिए भी काफ़ी है। यानी ग़ुस्ल के बाद वुज़ू की ज़रूरत नही है।

    403 अगर ख़ूने इस्तेहाजः नमाज़ के वक़्त से पहले आये और औरत ने उस ख़ून के लिए वुज़ू या ग़ुस्ल न किया हो तो नमाज़ के वक़्त वुज़ू व ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। चाहे वह नमाज़ के वक़्त मुस्तेहाज़ः न हो।

    404 मुस्तेहाज़ –ए- मुतवस्सेतः जिसके लिए वुज़ू व ग़ुस्ल दोनों ज़रूरी है एहतियाते लाज़िम की बिना पर पहले ग़ुस्ल और बाद में वुज़ू करना चाहिए। लेकिन इस्तेहाज़ –ए- कसीरः में अगर वुज़ू करना चाहे तो ज़रूरी है कि वुज़ू ग़ुस्ल से पहले करे।

    405 अगर औरत का इस्तेहाज़ –ए- क़लीलः सुबह की नमाज़ के बाद इस्तेहाज़ –ए- मुतवस्सेतः में बदल जाये तो ज़ोह्र व अस्र की नमाज़ के लिए ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। अगर ज़ोह्र व अस्र की नमाज़ के बाद मुतवस्सेतः में बदले तो मग़रिब व इशा की नमाज़ के लिए ग़ुस्ल करना ज़रूरी है।

    406 अगर औरत का इस्तेहाज –ए- क़लीलः या मुतवस्सेतः सुबह की नमाज़ के बाद कसीरः में बदल जाये और वह औरत उसी हालत पर बाक़ी रहे तो ज़ोह्र व अस्र और मग़रिब व इशा की नमाज़ पढ़ने के लिए मसला न. 402 में बयान किये गये अहकाम पर अमल करे।

    407  इस्तेहाज़ -ए- कसीरः में जिस सूरत में ज़रूरी है कि ग़ुस्ल व नमाज़ के दरमियान फ़ासिला न हो, जैसा कि मसला न. 402 में गुज़र चुका है। अगर नमाज़ का वक़्त दाख़िल होने से पहले ग़ुस्ल करने की वजह से ग़ुस्ल व नमाज़ के दरमियान फ़ासिला हो जाये तो उस ग़ुस्ल के साथ नमाज़ सही नही है। मुस्तेहाज़ः को चाहिए कि नमाज़ के लिए दोबारा ग़ुस्ल करे। इस्तेहाज़ –ए- मुतवस्सेतः में भी यही हुक्म है।

    408 मुस्तेहाज़ –ए- कलीलः व मुतवस्सेतः के लिए ज़रूरी है कि रोज़ाना की नमाज़ों के अलावा ( कि जिनका हुक्म ऊपर बयान हो चुका है)  हर नमाज़ के लिए चाहे वह वाजिब हो मुस्तहब वुज़ू करे। लेकिन अगर वह रोज़ाना की पढ़ी हुई नमाज़ों को एहतियातन दोबारा पढ़ना चाहे या तन्हा पढ़ी हुई नमाज़ों को जमाअत के साथ दोबारा पढ़ना चाहे तो ज़रूरी है कि उन तमाम कामों को अंजाम दे जिनका ज़िक्र इस्तेहाजः के बारे में किया जा चुका है। अलबत्ता अगर वह नमाज़े एहतियात, भूले हुए सजदे और तशह्हुद को नमाज़ के फ़ौरन बाद अदा करे या किसी भी सूरत में सजद –ए- सह्व करे तो उसके लिए इस्तेहाजः के कामों को अंजाम देना ज़रूरी नही है।

    409 मुस्तेहाज़ः औरत के लिए ख़ून बंद होने के बाद सिर्फ़ पहली नमाज़ के लिए इस्तेहाजः के काम अंजाम देना ज़रूरी है, बाद की नमाज़ों के लिए उनकी ज़रूरत नही है।

    410 अगर किसी औरत को यह मालूम न हो कि उसका इस्तेहाजः किस क़िस्म का है तो उसे चाहिए कि नमाज़ पढ़ने से पहले तहक़ीक़ के लिए थोड़ी सी रूई शर्मगाह में रखे और थोड़ी देर बाद निकाल कर देखे, ताकि पता चल सके कि उसका इस्तेहाजः तीनों क़िस्मों में से किस क़िस्म का है। फिर जिस क़िस्म का इस्तेहाजः हो उसी क़िस्म के अहकाम पर अमल करे। लेकिन अगर वह जानती हो कि नमाज़ पढ़ने के वक़्त तक उसका इस्तेहाजः तबदील नही होगा तो वह नमाज़ के वक़्त से पहले भी अपनी तहक़ीक़ कर सकती है।

    411 अगर मुस्तेहाज़ः अपने इस्तेहाजः की तहक़ीक़ करने से पहले नमाज़ में मशग़ूल हो जाये, तो अगर उसका क़ुरबत का क़स्द हो और उसने अपने वज़ीफ़े के मुताबिक़ अमल किया हो, मसलन उसका इस्तेहाजः क़लीलः हो और उसने इस्तेहाज़ –ए- क़लीलः के मुताबिक़ अमल किया हो तो उसकी नमाज़ सही है। लेकिन अगर उसका क़स्दे क़ुरबत न हो या उसका अमल उसके वज़ीफ़े के मुताबिक़ न हो मसलन उसका इस्तेहाजः मुतवस्सेतः हो और उसने इस्तेहाज़ –ए- क़लीलः के मुताबिक़ अमल किया हो तो उसकी नमाज़ बातिल है।

    412 अगर मुस्तेहाज़ः अपने बारे में तहक़ीक़ न कर सकती हो तो ज़रूरी है कि अपने यक़ीनी वज़ीफ़े के मुताबिक़ अमल करे मसलन अगर वह यह न जानती हो कि उसका इस्तेहाजः क़लीलः है या मुतवस्सेतः तो ज़रूरी है कि इस्तेहाजः ए क़लीलः के कामों को अंजाम दे और अगर यह न जानती हो कि उसका इस्तेहाजः मुतवस्सेतः है या कसीरः तो उसे मुतवस्सेतः के कामों को अंजाम देना चाहिए। लेकिन अगर वह जानती हो कि इससे पहले उसे तीनों क़िस्मों में से किस क़िस्म का इस्तेहाजः था, तो ज़रूरी है कि उसी क़िस्म के इस्तेहाज़ः के मुताबिक़ अपना वज़ीफ़ा अंजाम दे।

    413 अगर इस्तेहाज़ः का ख़ून अपने इब्तेदाई मरहले में जिस्म के अन्दर ही हो और बाहर न निकला हो तो वह औरत के ग़ुस्ल या वुज़ू बातिल नही करेगा , लेकिन अगर बाहर आजाये तो चाहे बहुत कम ही क्यों न हो ग़ुस्ल व वुज़ू दोनों को बातिल कर देता है।

    414 मुस्तेहाज़ः अगर नमाज़ के बाद अपने बारे में तहक़ीक़ करे और ख़ून न पाये तो अगरचे उसे इल्म हो कि दोबारा ख़ून आ जायेगा, तब भी वह उसी वुज़ू से नमाज़ पढ़ सकती है।

    415 मुस्तेहाजः औरत अगर यह जानती हो कि जिस वक़्त से वह वुज़ू व ग़ुस्ल में मशग़ूल हुई है उसके बदन से ख़ून बाहर नही आया है और न ही शर्मगाह के अन्दर है, तो जब तक उसे पाक रहने का यक़ीन हो नमाज़ में देर कर सकती है।

    416 अगर मुस्तेहाज़ः को यक़ीन हो कि नमाज़ का वक़्त गुज़रने से पहले वह पूरी तरह से पाक हो जायेगी या अन्दाज़न जितना वक़्त नमाज़ पढ़ने में लगता उसमें ख़ून आना बंद हो जायेगा तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि इन्तेज़ार करे और उस वक़्त नमाज़ पढ़े जब पाक हो।

    417 अगर वुज़ू व ग़ुस्ल के बाद बाज़ाहिर ख़ून आना बंद हो जाये और मुस्तेहाज़ः को मालूम हो कि अगर नमाज़ पढ़ने में देर की तो जितनी देर में वुज़ू, ग़ुस्ल और नमाज़ को अंजाम देगी बिल्कुल पाक हो जायेगी, तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि नमाज़ में देर करे और जब बिल्कुल पाक हो जाये तो दोबारा वुज़ू व ग़ुस्ल करके नमाज़ पढ़े। लेकिन अगर ख़ून के बज़ाहिर बंद होने के वक़्त नमाज़ का वक़्त कम हो तो दोबारा वुज़ू व ग़ुस्ल करना ज़रूरी नही है, बल्कि जो वुज़ू व ग़ुस्ल उसने किये हैं, उन्हीं से नमाज़ पढ़ सकती है।

    418 मुस्तेहाज़ –ए- कसीरः को जब ख़ून आना बिल्कुल बंद हो जाये तो अगर उसे मालूम हो कि उसने पिछली नमाज़ के लिए जब से ग़ुस्ल किया है उसे ख़ून नही आया है, तो दोबारा ग़ुस्ल करना ज़रूरी नही है। इसके अलावा दूसरी सूरतों में ग़ुस्ल करना लाज़िम है। अगरचे इस हुक्म का बतौरे कुल्ली होना एहतियात की बिना पर है। लेकिन मुस्तेहाज़ –ए- मुतवस्सेतः में ख़ून के बिल्कुल बंद होने के बाद ग़ुस्ल करना लाज़िम नही है।

    419 मुस्तेहाज़ –ए- क़लीलः को वुज़ू के बाद और मुस्तेहाज़ –ए- मुतवस्सेतः को ग़ुस्ल और वुज़ू के बाद और मुस्तेहाज़ –ए- कसीरः को ग़ुस्ल के बाद (उन दो सूरतों के अलावा जो मस्अला न. 403 और 415 में बयान हुई हैं) फ़ौरन नमाज़ में मशग़ूल होना ज़रूरी है। लेकिन नमाज़ से पहले अज़ान व इक़ामत कहने में कोई हरज नही है और वह नमाज़ के मुस्तहब काम भी कर सकती है जैसे क़ुनूत वग़ैरह का पढ़ना।

    420 अगर मुस्तेहाज़ः औरत का वज़ीफ़ा यह हो कि वुज़ू या ग़ुस्ल और नमाज़ के दरमियान फ़ासिला न रखे, अगर उसने अपने वज़ीफ़े पर अमल न किया हो तो उसे दोबारा ग़ुस्ल या वुज़ू करके, फ़ौरन नमाज़ में मशग़ूल हो जाना चाहिए।

    421 अगर औरत को इस्तेहाज़ः का ख़ून मुसलसल आये और बंद न होता हो तो अगर ख़ून का रोकना उसके लिए मुज़िर न हो तो ज़रूरी है कि ग़ुस्ल के फौरन बाद ख़ून को बाहर आने से रोके और अगर ऐसा करने में कोताही करे और ख़ून निकल जाये तो जो नमाज़ पढ़ली हो उसे दोबारा पढ़े, बल्कि एहतियाते मुस्तहब यह है कि दोबारा ग़ुस्ल करे।

    422 अगर ग़ुस्ल करते वक़्त ख़ून न रुके तो ग़ुस्ल सही है, लेकिन अगर ग़ुस्ल के दरमियान इस्तेहाज़ –ए- मुतवस्सेतः कसीरः में बदल जाये तो अज़ सरे नो ग़ुस्ल करना ज़रूरी है।

    423 अगर मुस्तेहाज़ः रोज़े से हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि जहाँ तक मुमकिन हो पूरे दिन ख़ून को निकलने से रोके।

    424 मशहूर क़ौल की बिना पर मुस्तेहाज़ –ए- कसीरः का रोज़ा उस सूरत में सही होगा कि जिस रात के बाद के दिन वह रोज़ा रखना चाहती हो उस रात की मग़रिब व इशा की नमाज़ का ग़ुस्ल करे। इसके अलावा दिन में वह ग़ुस्ल अंजाम दे जो दिन की नमाज़ों के लिए वाजिब हैं। लेकिन कुछ बईद नही कि उसके रोज़े की सेहत का इंहेसार ग़ुस्ल पर न हो। इसी तरह बिना बर अक़वा मुस्तेहाज़ –ए- मुतवस्सेतः में यह ग़ुस्ल शर्त नही है।

    425 अगर औरत अस्र की नमाज़ के बाद मुस्तेहाज़ः हो जाये और सूरज के छिपने तक ग़ुस्ल न करे तो उसका रोज़ा सही है।

    426 अगर किसी औरत का इस्तेहाजः ए क़लीलः नमाज़ से पहले मुतवस्सेतः या कसीरः में बदल जाये तो ज़रूरी है कि मुतवस्सेतः या कसीरः के आमाल अंजाम दे। और अगर इस्तेहाज़ –ए- मुतवस्सेतः कसीरः में बदल जाये तो उसे कसीरः के काम अंजाम देने चाहिए। लिहाज़ा अगर उसने इस्तेहाज़ –ए- मुतवस्सेतः के लिए ग़ुस्ल किया हो तो उसका कोई फ़ायदा नही है, उसे इस्तेहाज़ः –ए- कसीरः के लिए दोबारा ग़ुस्ल करना चाहिए।

    427 अगर नमाज़ पढ़ते हुए किसी औरत का इस्तेहाज़ –ए- मुतवस्सेतः,  कसीरः में बदल जाये तो उसे नमाज़ तोड़ देनी चाहिए और इस्तेहाज़ –ए- कसीरः के लिए ग़ुस्ल करके उसके आमाल अंजाम देते हुए उसी नमाज़ को दोबारा पढ़े और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर ग़ुस्ल से पहले वुज़ू भी करे। अगर उसके पास ग़ुस्ल के लिए वक़्त न हो तो ग़ुस्ल के लिए तयम्मुम करे और अगर तयम्मुम के लिए भी वक़्त न हो तो एहतियात की बिना पर नमाज़ न तोड़े और उसी हालत में नमाज़ को तमाम करे। लेकिन वक़्त ग़ुज़रने के बाद उसकी क़ज़ा ज़रूरी है। इसी तरह अगर नमाज़ पढ़ते वक़्त इस्तेहाज़ –ए- कलीलः, मुतवस्सेतः या कसीरः में बदल जाये तो नमाज़ को तोड़ देना चाहिए और इस्तेहाज़ –ए- मुतवस्सेतः या कसीरः के कामों को अंजाम देना चाहिए।

    428 अगर नमाज़ पढ़ते वक़्त ख़ून बंद हो जाये और मुस्तेहाज़ः को मालूम न हो कि बातिन (अन्दरूनी हिस्से) में भी ख़ून बंद हुआ है या नही, तो अगर उसे नमाज़ के बाद पता चले कि ख़ून पूरे तौर पर बंद हो गया था और उसके पास इतना वक़्त हो कि पाक होकर दोबारा नमाज़ पढ़ सके तो अगर ख़ून बंद होने से मायूस न हुई हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर अपने वज़ीफ़े के मुताबिक़ वुज़ू या ग़ुस्ल करे और दोबारा नमाज़ पढ़े।

    429 अगर किसी औरत का इस्तेहाज़ -ए- कसीरः, मुतवस्सेतः में बदल जाये तो ज़रूरी है कि पहली नमाज़ के लिए कसीरः का अमल और बाद की नमाज़ों के लिए मुतवस्सेतः का अमल अंजाम दे। मसलन अगर ज़ोह्र की नमाज़ से पहले इस्तेहाज़ -ए- कसीरः, मुतवस्सेतः में बदल जाये तो ज़रूरी है कि ज़ोह्र की नमाज़ के लिए ग़ुस्ल करे और अस्र व मग़रिब व इशा की नमाज़ों के लिए सिर्फ़ वुज़ू करे। लेकिन अगर नमाज़े ज़ोह्र के लिए ग़ुस्ल न करे और उसके पास सिर्फ़ नमाज़े अस्र के लिए वक़्त बाक़ी हो तो ज़रूरी है कि नमाज़े अस्र के लिए ग़ुस्ल करे और अगर नमाज़े अस्र के लिए भी ग़ुस्ल न करे तो ज़रूरी है कि नमाज़े मग़रिब के लिए ग़ुस्ल करे और अगर उसके लिए भी ग़ुस्ल न कर सके और उसके पास सिर्फ़ इशा की नमाज़ के लिए वक़्त हो तो नमाज़े इशा के लिए ग़ुस्ल करना ज़रूरी है।

    430 अगर हर नमाज़ से पहले मुस्तहाज़ -ए- कसीरः का ख़ून बंद हो जाये और दोबारा आजाये तो हर नमाज़ के लिए ग़ुस्ल करना ज़रूरी है।

    431 अगर इस्तेहाज़ –ए- कसीरः, क़लीलः में बदल जाये तो ज़रूरी है कि वह औरत पहली नमाज़ के लिए कसीरः वाले और बाद नमाज़ के लिए क़लीलः वाले आमल अंजाम दे। अगर इस्तेहाज़ –ए- मुतवस्सेतः, क़लीलः हो जाये तो पहली नमाज़ के लिए मुतवस्सेतः वाले और बाद की नमाज़ के लिए क़लीलः वाले आमाल अंजाम दे।

    432 मुस्तेहाजः के लिए जो काम वाजिब हैं, अगर वह उनमें से किसी एक को भी तर्क करदे तो उसकी नमाज़ बातिल है।

    433 मुस्तेहाज़ –ए- क़लीलः या मुतवस्सेतः अगर नमाज़ के अलावा और कोई ऐसा काम अंजाम देना चाहती हो जिसके लिए वुज़ू का होना शर्त हो, मसलन अपने बदन का कोई हिस्सा क़ुरआन के अलफ़ाज़ से मस करना चाहती हो, तो नमाज़ अदा करने के बाद दोबारा वुज़ू करना ज़रूरी है और वह वुज़ू जो उसने नमाज़ के लिए किया था काफ़ी नही है।

    434 जिस मुस्तेहाज़ः ने अपने वाजिब ग़ुस्ल कर लिये हों, उसका मस्जिद में जाना, वहाँ ठहरना, वाजिब सजदे वाली आयतों का पढ़ना और अपने शौहर के साथ हमबिस्तरी (संभोग) करना हलाल है। चाहे उसने वह काम अंजाम न दिये हों जिन्हें वह नमाज़ के लिए अंजाम देती थी (मसलन रूई और कपड़े के टुकड़ों को बदलना) और यह भी बईद नही है कि यह काम ग़ुस्ल किये बग़ैर भी जायज़ हों, जबकि एहतियात यह है कि इस हालत में उन्हें तर्क किया जाये।

    435 जो औरत इस्तेहाज़ –ए- कसीरः या मुतवस्सेतः में हो अगर वह नमाज़ के वक़्त से पहले वाजिब सजदे वाली आयतों को पढ़ना चाहे या मस्जिद में जाना चाहे तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर ज़रूरी है कि ग़ुस्ल करे। अगर उसका शौहर उसके साथ हमबिस्तर होना चाहे तो तब भी यही हुक्म है।

    436 मुस्तेहाज़ः औरत पर नमाज़े आयात का पढ़ना वाजिब है और नमाज़े आयात पढ़ने के लिए भी उन्हीं आमाल को अंजाम देना ज़रूरी है, जो रोज़ाना की वाजिब नमाज़ों को पढ़ने के लिए अंजाम दिये जाते हैं।

    437 अगर मुस्तेहाज़ः पर यौमियः (दिन रात की वाजिब नमाज़ें) नमाज़ के वक़्त में नमाज़े आयात भी वाजिब हो जाये और वह उन नमाज़ों के यके बाद दीगरे अदा करना चाहे तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर वह उन दोनों नमाज़ों को एक वुज़ू और ग़ुस्ल से नही पढ़ सकती ।

    438 अगर मुस्तेहाज़ः क़ज़ा नमाज़ पढ़ना चाहे तो ज़रूरी है कि उस नमाज़ के लिए वह उन तमाम कामों को अंजाम दे जो अदा नमाज़ों के लिए उस पर वाजिब हैं। एहतियात की बिना पर क़ज़ा नमाज़ के लिए वह उन कामों पर इक्तफ़ा नही कर सकती, जो उसने अदा नमाज़ के लिए अंजाम दिये हों।

    439 अगर कोई औरत यह जानती हो कि उसे जो ख़ून आरहा है वह ज़ख़्म का नही है। लेकिन उसके इस्तेहाजः, हैज़ या निफ़ास होने के बारे में शक करे और शरअन वह ख़ून हैज़ या निफ़ास का हुक्म भी न रखता हो तो ज़रूरी है कि इस्तेहाज़ः के अहकाम के मुताबिक़ अमल करे। बल्कि अगर उसे शक हो कि यह ख़ून इस्तेहाज़ः का है या कोई दूसरा ख़ून है और उसमें दूसरे ख़ून की कोई निशानी भी न हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर इस्तेहाज़ः के काम अंजाम देना ज़रूरी है।