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    इस्लामी चेतना, बड़े परिवर्तनों का स्रोत

    इस्लामी चेतना, बड़े परिवर्तनों का स्रोत
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    इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई ने कहा कि जब किसी देश में युवा सचेत हो जाते हैं तो उस देश में सार्वाजनिक चेतना की आशा बढ़ जाती है। आज पूरे इस्लामी जगत में हमारे युवा जाग गये हैं। इन युवाओं के सामने इतने जाल बिछाए गये किंतु स्वावलांबी, संकल्पित और मुस्लिम युवाओं ने स्वंय को इन जालों से बचा लिया है।

    इस्लाम प्रेम की मनमोहक सुगंध ने कुछ दिनों से बहुत से इस्लामी देशों को बदल कर रख दिया है। कुछ अरब देशों में तानाशाह और विदेशियों पर निर्भर सरकारें, क्रांतिकारी युवाओं के अल्लाहो व अकबर के नारों से औंधे मुंह गिर पड़ीं। मानो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम की वह मनमोहक आवाज़ कानों में रस घोल रही है जिसमें वह क़ुरआन की आयत पढ़ते हुए कह रहे हों और कह दो सत्य आगया और असत्य का अंत हो गया निश्चित रूप से असत्य सदैव ख़त्म हो जाने वाला होता है।

     

    वरिष्ठ नेता ने वर्तमान काल में तानाशाहों के पतन को अत्यन्त शुभ व महत्वपूर्ण परिवर्तन बताते हुए कहते हैं कि आज मानव इतिहास, विश्व इतिहास एक बड़े महत्वपूर्ण एतिहासिक मोड़ पर है। पूरे विश्व में नये युग का आरंभ हो रहा है। इस युग के बड़े व स्पष्ट चिन्ह, ईश्वर की ओर ध्यान, उसकी असीम शक्ति पर भरोसा तथा उसके संदेशों पर विश्वास है। आज इस्लामी राष्टों में सब से अधिक आकर्षण इस्लाम में पाया जा रहा है, ईश्वर ने वचन दिया है कि ईश्वरीय मत, ईश्वरीय संदेश और इस्लाम , मनुष्य को कल्याण तक पहुंचा सकता है।

     

    विश्व के ७३ देशों से चुने हुए क्रांतिकारी युवाओं ने हालिया दिनों में तेहरान की यात्रा की ताकि युवा और इस्लामी चेतना के पहले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग ले सकें। उन्होंने अपनी क्रांति को जारी रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ शैली प्राप्त करने के लिए इस सम्मेलन में कई दिनों तक आपस में विचार विमर्श किया किंतु तीस जनवरी इन उत्साही युवाओं के लिए भिन्न था क्योंकि इस दिन उन्होंने इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता से भेंट की थी। स्नेह व श्रद्धा से परिपूर्ण इस भेंट में अधिकांश युवा, वरिष्ठ नेता को देख कर अपने आंसू नहीं रोक पाए। कुछ लोगों ने भाषणों और कविताओं द्वारा ईरान के महान व अत्याचारविरोधी नेता के प्रति अपना प्रेम व श्रद्धा प्रकट की। लेबनान के हिज़्बुल्लाह आंदोलन के वरिष्ठ कमांडर शहीद एमाद मुग़निया की पुत्री ने इस अवसर पर वरिष्ठ नेता को संबोधित करते हुए कहा मैं आप की बेटी फ़ातेमा और शहीद एमाद मुग़निया की पुत्री हूं। उन्होंने कहा कि इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में ईरान की इस्लामी क्रांति इस्लामी चेतना और वर्तमान क्रांतियों का स्रोत और आरंभ बिन्दु है।

     

    वरिष्ठ नेता ने युवाओं से इस भेंट में अपने भाषण में क्रांतिकारी युवाओं को इस्लामी राष्ट्र के भविष्य के लिए शुभसंदेशों के ध्वजवाहक बताया । उन्होंने किसी भी समाज में युवाओं की चेतना को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि जब किसी भी देश में युवा सचेत हो जाते हैं तो उस देश में सार्वाजनिक चेतना की आशा बढ़ जाती है। आज पूरे इस्लामी जगत में हमारे युवा जाग गये हैं। इन युवाओं के सामने इतने जाल बिछाए गये किंतु स्वावलांबी, संकल्पित और मुस्लिम युवाओं ने स्वंय को इन जालों से बचा लिया है। आप देखते हें कि ट्यूनेशिया में, मिस्र में , लीबिया में , यमन में और बहरैन में किया हुआ अन्य इस्लामी देशों में कैसे कैसे आंदोलनों ने जनम लिया। यह सब शुभ संदेश हैं।

     

    तानाशाह और उनके पश्चिमी समर्थक कभी यह सोच भी नहीं सकते थे कि इस्लामी देशों के क्रांतिकारी युवा इन निर्भर शासनों के विरुद्ध उठ खड़े होंगे। दो सौ वर्षों से अधिक इस्लामी राष्ट्रों पर वर्चस्व रखने वाले साम्राज्यवादी अब अपनी अत्याचारपूर्ण नीतियों की विफलता का स्वाद चख रहे हैं। वरिष्ठ नेता का मानना है कि ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका ने इस्लामी देशों का अतिग्रहण किया और उनका अपमान किया। उन्होंने मध्य पूर्व के ह्रदय में ज़ायोनिज़्म को अस्तित्व देकर और हर प्रकार से बल देकर इस कैंसर के फोड़े द्वारा अपनी नीतियों को लागू करते हैं। वरिष्ठ नेता इस्लामी देशों पर साम्राज्यवादी देशों के वर्चस्व के अभिशप्त परिणामों को गिनाते हुए कहा कि , पश्चिमी संस्कृति ने इस्लामी देशों के लिए सब से बड़ी जो समस्या उत्पन्न की है वह दो गलत विचारधाराएं रहीं हैं। एक मुसलमानों को अक्षमता और असमर्थता का पाठ पढ़ाना था अर्थात उन्होंने मुसलमानों को यह विश्वास दिला दिया कि तुम लोगों से कुछ नहीं होने वाला , न राजनीति में , न अर्थ व्यवस्था में और न ही विज्ञान के क्षेत्र में, उन्होंने मुसलमानों से कहा कि तुम लोग कमज़ोर हो। हम इस्लामी देश दसियों वर्षों तक इस धारणा में फंसे रहे और पीछे रह गये। दूसरी बात जो इन वर्चस्ववादियों ने समझाई वह यह थी कि हमारे शत्रुओं की शक्ति असीम और अजेय है। इस प्रकार से दर्शाया कि अमरीका को पराजित करना संभव ही नहीं है, पश्चिम को कौन पीछे हटने पर विवश कर सकता है हमें सब कुछ सहन करना पड़ेगा। किंतु अचानक ही इस्लामी चेतना ने प्रचंड लहरों की भांति अत्याचारियों के खोखले महलों को उखाड़ फेंका और ईश्वरीय कृपा से ठोस इरादों और सुदृढ़ आस्थाओं ने साम्राज्यवादियों की नींदे उड़ा दीं।

     

    इन क्रांतियों का लोगों के मन व मस्तिष्क पर एक महत्वपूर्ण प्रभाव, साम्राज्य के आंतक का अंत भी रहा है। हुस्नी मुबारक और ज़ैनुल आबेदीन बिन अली जैसे अत्याचारी तानाशाह जिन्हें अमरीका और ज़ायोनी शासन का भरपूर समर्थन प्राप्त था, जन शक्ति और उनके इस्लामी नारों से बड़ी सरलता के साथ सत्ता से बेदखल कर दिये गये और इनके पतन को उनके पश्चिमी समर्थकों की पराजय के रूप में भी देखा गया। वरिष्ठ नेता इस्लामी चेतना को अतंरराष्ट्रीय तानाशाही के अंत का आरंभ बिन्दु कहते हैं । वे इस संदर्भ में कहते हैं कि आज इस्लामी देशों में विदेशियों पर निर्भर तानाशाहों के विरुद्ध आंदोलन हो रहे हैं जो अंतरराष्ट्रीय तानाशाहों के विरुद्ध आंदोलन की भूमिका है और यह अंतरराष्ट्रीय तानाशाह, भ्रष्ट व अभिशप्त ज़ायोनी तथा साम्राज्यवादी शक्तियों के संगठन हैं किंतु अमरीका तथा अन्य साम्राज्यवादी जिन्हें अपने पतन की आहट सुनाई दे रही है , इस बात का पूरा प्रयास कर रहे हैं कि यह क्रांतियां अपने दीर्घकालिक लक्ष्यों तक न पहुंच सकें। अंतरराष्ट्रीय तानाशाह, षडयन्त्र रच कर और अभिशप्त योजनाएं बना कर इस्लामी राष्ट्रों पर पुनः अपना वर्चस्व स्थापित करने के प्रयास में हैं। वरिष्ठ नेता क्रांतिकारी युवाओं को सचेत करते हुए कहते हैं कि इस बात पर ध्यान रखना चाहिए कि उनके जनान्दोलन को कहीं कोई चुरा न ले और उसे उसके मार्ग से विचलित न कर दे। इस लिए अन्य लोगों के अनुभवों से लाभ उठाया जाना चाहिए। शत्रु क्रांति को मार्ग से हटाने , आंदोलनों को प्रभाव हीन करने और बहाए गये रक्त को रंगहीन करने का भरसक प्रयास कर रहा है इस लिए सचेत रहना चाहिए। आप युवा इन आंदोलनों के शक्तिस्रोत हैं। सचेत रहें और ध्यान दें।

     

    वरिष्ठ नेता ने अपने भाषण में सब को ईश्वर की सहायता की ओर आकृष्ट किया। उन्होंने ईश्वर के प्रति भ्रांति से दूर रहने और उसके वचनों पर विश्वास को आवश्यक बताया और कहा कि ईश्वरीय वचन सच्चे हैं हमें उसके वचनों की सत्यता में कोई शंका नहीं है। हमें ईश्वर की ओर से कोई भ्रांति नहीं है। ईश्वर अपने बारे में भ्रांति में रहने वालों की आलोचना करता और कहता है कि और वह मिथ्याचारी पुरुषों व महिलाओं, अनेकेश्वरवादी पुरुषों व महिलाओं को कि जो ईश्वर के बारे में बुरा सोचते हैं दंडित करेगा और बुरी घटनाओं में वे स्वंय ग्रस्त होंगे ईश्वर का प्रकोप है उन पर और उसने उन्हें अपनी कृपा से दूर कर दिया है और उनके लिए नर्क को तैयार कर रखा है और यह कितना बुरा अंजाम है। वरिष्ठ नेता की दृष्टि में जब लोग ईश्वर की राह में और अत्याचारी के अंत के लिए आंदोलन आरंभ करते हैं और अपनी राह पर डटे रहते हैं ईश्वर उन्हें अपनी विशेष सहायताओं व कृपा द्वारा सफलता प्रदान करता है। वरिष्ठ नेता ने मध्य पूर्व और उत्तरी अफ़्रीक़ा में क्रांतिकारी युवाओं और जनता की सफलता को ईश्वरीय सहायता का प्रभाव बताया और कहा कि जब लोग आगे बढ़ते हैं और जब हम अपने पास मौजूद सब कुछ लेकर संघर्ष आरंभ करते हैं तो ईश्वर की सहायता निश्चित होती है। वे सफलता और आंदोलन के जारी रहने की कुंजी , ईश्वर पर भरोसे , ईश्वर के प्रति सदभावना , उस पर विश्वास तथा एकता को बनाए रखना बताते हैं।

     

    इस्लामी आंदोलन इस समय महत्वपूर्व एतिहासिक मोड़ से गुज़र रहा है। अत्याचारी व साम्राज्यवादियों के विरुद्ध संघर्ष जो वर्ष १९७९ में आजकल के दिनों में ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के साथ ही तेज़ हो गया अब इस्लामी जगत में विस्तृत हो रहा है। वरिष्ठ नेता इस परिवर्तन के संदर्भ में कहते हैं कि आज इस्लामी जगत में इस्लामी आंदोलन में शीआ व सुन्नी का कोई अंतर नहीं है, शाफ़ई, हनफ़ी, जाफ़री, मालेकी , हंबली और जै़दी में कोई अंतर नहीं है अरबों और फार्सों तथा अन्य जातियों में कोई अंतर नहीं है। इस विशाल रणक्षेत्र में सभी उपस्थित हैं। हमें प्रयास करना चाहिए कि शत्रु हम में फूट पैदा न करें। हमें एक दूसरे को अपना भाई समझना चाहिए , लक्ष्य को निर्धारित करना चाहिए। हमारा लक्ष्य इस्लाम है हमारा लक्ष्य कु़रानी और इस्लामी सत्ता है। वरिष्ठ नेता की दृष्टि में इस्लामी देशों में कुछ समानताएं और कुछ भिन्नताएं हैं। विभिन्न देशों की अलग अलग भौगोलिक , एतिहासिक व सामाजिक परिस्थितियां हैं किंतु संयुक्त सिद्धान्त पर ध्यान महत्वपूर्ण है। वे संयुक्त सिद्धान्त का वर्णन इस प्रकार से करते हैं ः हम सब साम्राज्य विरोधी हैं , हम सब पश्चिम के दुष्टतापूर्ण वर्चस्व व अधिपत्य के विरोधी हैं और हम सब इस्राईली नामक कैंसर के फोड़े के विरोधी हैं।

    वरिष्ठ नेता अपने भाषण के एक अन्य भाग में शत्रुओं के षडयन्त्रों को प्रभावहीन और वर्तमान समय में इस्लाम प्रेम की लहर को अदभुत बताया। उन्होंने कहा कि इस्लामी राष्ट्र आगे बढ़ सकते हैं , वे इस्लाम की उस प्रतिष्ठा व महानता को जो किसी समय में वैज्ञानिक व राजनीतिक व सामाजिक क्षेत्रों में विकास की चोटियों पर पहुंचने से प्राप्त हुई थी पुनः प्राप्त कर सकते हैं। वरिष्ठ नेता इस शताब्दी को इस्लाम और आध्यात्म की शताब्दी कहते हैं और उनका मानना है कि इस्लाम , तर्क , आध्यात्म तथा न्याय अन्य राष्ट्रों को उपहार स्वरूप देगा। वरिष्ठ नेता अंत में वर्तमान काल में इस्लाम प्रेम पर आधारित आंदोलनों को सफल आंदोलन की संज्ञा देते हैं और कहते हैं कि भविष्य अत्याधिक उज्जवल है वह दिन शीघ्र ही आएगा जब इस्लामी राष्ट्र ईश्वर की सहायता से शक्ति व स्वाधीनता की चोटियों पर पहुंचा होगा। (http://hindi.irib.ir)