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    इस्लामी चेतना-१

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    विभिन्न विषयों पर वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई के विचारों पर आधारित एक नयी श्रंखला मार्गदर्शन आपकी सेवा में प्रस्तुत है।

    प्रस्तुत है इस्लामी चेतना के विषय पर इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के विचार जो उनके विभिन्न भाषणों से लिए गए हैं।

    इस्लामी राष्ट्र की विशाल पूंजि, इस्लाम धर्म तथा मानवीय जीवन के लिए इस धर्म के व्यापक नियम, ठोस शिक्षाएं और स्पष्ट ज्ञान हैं। इस्लाम ने सृष्टि और मानवजाति के बारे में बुद्धि पर खरे उतरने वाले गहरे विचार पेश करके तथा एकेश्वरवाद के शुद्ध विचार के प्रचार, बौद्धिक नैतिकता व आध्यात्मिकता के परिचय, दृढ़ व व्यापक राजनीतिक व समाजिक व्यवस्था तथा नियमों को निर्धारित करके तथा उपासना एंव व्यक्ति संबंधी कर्तव्यों व कर्मों के निर्धारण द्वारा मानवजाति को निमंत्रण दिया है कि वह अपने मन को बुराइयों, कमज़ोरियों, नीचता तथा गंदगियों से पवित्र करे और उसे ईमान व सदभावना, प्रेम व लगाव, जैसी भावनाओं से सुसज्जित करे।

    इस्लामी व्यवस्था के आरंभ से ही इसे चुनौतियों का सामना रहा है इसका कारण यह था कि विश्व के सत्ता लोभियों और धन व शक्ति के स्वामी जो सदैव अपने हितों की पूर्ति के प्रयास में रहते हैं, विश्व में किसी एसी नयी शक्ति का अस्तित्व सहन नहीं कर सकते थे जो उनके अवैध हितों के विरुद्ध सक्रिय हो। ईरान में इस्लामी क्रांति की विजय और इस्लामी व्यवस्था के गठन के साथ ही एसी शक्ति अस्तित्व में गयी। इस व्यवस्था के गठन मात्र से ही उनके लिए ख़तरा उत्पन्न नहीं हुआ था बल्कि मूल ख़तरा इस्लामी जगत में संभावित चेतना फैलने से था। यही ख़तरा आज साम्राज्यवादियों की नींद उड़ाए है। यही कारण है कि साम्राज्य की शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियों का लक्ष्य इस्लामी व्यवस्था है।

    एक अन्य महत्वपूर्ण वस्तु शुद्ध इस्लामी संस्कृति और उसका प्रचार है जो वास्तव में इस्लामी जगत में चेतना के रूप में सामने आया। ईरान में इस्लामी क्रांति से पूर्व, पूरे इस्लामी जगत में इस्लाम का नाम था, हर स्थान पर यह वास्तविकता मौजूद थी किंतु उसकी गहराई कहीं कम और कहीं अधिक थी। पूरे इस्लामी जगत को संयुक्त रूप से देखने और उसकी अपार संभावनाओं के साथ उसे प्रगति के मार्ग में अग्रसर करने का विचार, ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद सामने आया और देखते देखते पूरे विश्व में फैल गया। ईरान में इस्लामी क्रांति के बाद जो सरकार बनी उसने इस्लामी शिक्षाओं और नियमों के आधार पर प्रजातांत्रिक सरकार का एसा आदर्श पेश किया जिसका उदाहरण इस से पहले कहीं नहीं मिलता।

    समाजवाद और साम्यवाद जैसी विचारधाराओं की विफलता और विशेषकर पश्चिम के उदारवादी प्रजातंत्र की वास्तविकता सामने आने के बाद इस्लाम का स्वतंत्रताप्रेमी रूप पहले से अधिक स्पष्ट हुआ और इस्लामी देशों के युवा, इस्लामी न्याय व स्वतंत्रता की छत्रछाया में जीवन बिताने की कामना के साथ इस्लामी सरकार की स्थापना के लिए आगे बढ़े और विभिन्न राजनीतिक , सामाजिक व वैज्ञानिक क्षेत्रों में उन्होंने संघर्ष आरंभ किया जो अब अपने अपने देशों में विदेशी और साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध प्रतिरोध की भावना और आंदोलन को बल प्रदान कर रहे हैं।

    इस्लामी जगत के बहुत से क्षेत्रों में जिनमें फ़िलिस्तीन सर्वोपरि है, युवा इस्लामी ध्वज उठाए स्वाधीनता व गौरव व स्वतंत्रता के नारे लगाते हुए शौर्य व साहस की गाथाएं लिख रहे हैं और साम्राज्यवादियों तथा उनके पिटठुओं को अपमान की खांईयों में ढकेल रहे हैं। इस्लामी जगत में चेतना की इस लहर ने साम्राज्यवादियों के सारे समीकरणों को बिगाड़ कर रख दिया है।

    दूसरी ओर राजनीति और विज्ञान के क्षेत्रों में इस्लाम की स्वर्णिम शिक्षाओं और नवीन तकनीक के आधार पर विकसित इस्लामी विचारधारा और उसके विकास की प्रक्रिया ने यह सिद्ध कर दिया कि इस्लाम एक जीवित जीवनशैली है जो इस्लामी जगत के बुद्धिजीवियों और सदस्यों के लिए मार्ग खोल सकती है। कल की साम्राज्यवादी शक्तियां जो आज नये रूप में पुराना काम कर रही हैं, अपनी धूर्ततापूर्ण नीतियों द्वारा एक ओर तो इस्लामी जगत में रूढ़िवादी विचारधारा को फैला रही थीं और दूसरी ओर उसे, विदेशी विचारधाराओं के अंधे अनुसरण के जाल में उलझाए हुए थीं किंतु अब वे स्वंय इस्लामी विचारधारा और उसके विकास के सामने असहाय दिखायी दे रही हैं।

    इस समय साम्राज्यवादी शक्तियां , इस्लामी जगत के विरूद्ध जो शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियां कर रही हैं वह उनकी शक्ति व आत्मविश्वास के कारण नहीं बल्कि उनकी बौखलाहट का परिणाम है। वह इस्लामी शक्ति को भांप चुकी हैं, उन्हें इस्लामी शक्ति की व्यापकता और इस्लामी शासन से ख़तरा है। यह शक्तियां उस दिन की कल्पना से ही कांप जाती हैं जब इस्लामी जगत पूरी एकजुटता के साथ उठ खड़ा हो। क्यों उस दिन इस्लामी राष्ट्र, अपनी प्राकृतिक संपत्ति, महान इतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहरों, भौगोलिक व्यापकता और असंख्य श्रम शक्ति के बल पर, उन वर्चस्ववादी शक्तियों के हाथ तोड़ देगा जो २०० वर्षों से उनका खून चूसती और उसके सम्मान को अनदेखा करती आ रही हैं।

    इस्लामी आंदोलन और इस्लामी क्रांति से आशय अंधविश्वासों और अत्याचारी शासनों के विरुद्ध आंदोलन है। जो मानवता को जंजीरों में जकड़े हुए अत्याचार व भेदभाव व जातिवाद व अश्लीलता के सहारे अपने हितों की पूर्ति करते हैं और विवश समूदायों का शोषण करते हैं । इस्लामी आंदोलन वास्तव में दो व्यवस्थाओं के मध्य टकराव का नाम है। एक विचारधारा मनुष्यों को दासता पर विवश करती है तो दूसरी विचारधारा में मनुष्यों की स्वतंत्रता मूल उद्देश्य है। इसी लिए कोई भी इस्लामी आंदोलन हो उसे विश्व की साम्राज्यवादी शक्तियों से टकराने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए।

    कई शताब्दियों के पतन व पिछड़ेपन के बाद इस समय इस्लामी जगत के कोने कोने में मुसलमान राष्ट्र चेतना और ईश्वर के लिए उठ खड़े हुए हैं। स्वतंत्रता व स्वाधीनता तथा इस्लाम व क़ुरआन की ओर वापसी की सुगंध, इस समय बहुत से इस्लामी देशों में महसूस की जा सकती है। इस्लामी चेतना का यह अर्थ नहीं है कि वह सभी राष्ट्र जो इस चेतना का भाग हैं वह वह पूरे तार्किक प्रमाणों व वैचारिक तर्कों के साथ इस्लामी व्यवस्था के आधारों का ज्ञान रखते हैं बल्कि इसका अर्थ यह है कि हर स्थान पर मुसलमानों में इस्लामी पहचान प्राप्त करने की इच्छा दिखायी दे रही है जो निश्चित रूप से एक अच्छा संकेत है।