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    इस्लामी चेतना-4

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    विभिन्न विषयों पर वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई के विचारों पर आधारित एक नयी श्रंखला मार्गदर्शन आपकी सेवा में प्रस्तुत है।

    प्रस्तुत है इस्लामी चेतना के विषय पर इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के विचार जो उनके विभिन्न भाषणों से लिए गए हैं।

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    इस समय अमरीका और पश्चिम की अन्य शक्तियां इस निष्कर्ष पर पहुंच चुकी हैं कि कि पूरे विश्व पर राज की उनकी योजना के सामने विशेषकर मध्य पूर्व के मुसलमान और राष्ट्र सब से बड़ी बाधा हैं। यदि कुछ वर्षों के दौरान आर्थिक, राजनीतिक, प्रचारिक और सैनिक हथकंडों से इस्लामी चेतना पर नियंत्रण न किया गया और उसे कुचला न गया तो विश्व पर राज और विश्व समुदाय पर वर्चस्व और उद्योग का पहिया चलाने वाले एकमात्र साधन तेल और गैस के भंडारों पर उनके एकाधिकार के सारे सपने चकनाचूर हो जाएगें। उसके परिणाम में पश्चिमी और ज़ायोनी पुंजीवादी जो सभी साम्राज्यवादी सरकारों की बागडोर अपने हाथ में रखते हैं, सत्ता से हाथ धो बैंठेगे।

     

    इतिहास पर यदि नज़र डाली जाए तो हमें दिखायी देगा कि इस्लामी राष्ट्र ने विभिन्न चुनौतियों और पथभ्रष्टताओं का सामना किया है। मुसलमानों ने स्वंय को इस्लाम से दूर करके एसी वस्तुओं में स्वंय को उलझा लिया है जिनसे इस्लाम ने मुसलमानों को कड़ाई से मना किया था । इस लंबे इतिहास के दौरान मुसलमान एक दूसरे से लड़ते रहे और साम्राजी शक्तियों के हाथों का खिलौना बने रहे। परिणाम यह निकला कि यह राष्ट्र आरंभिक काल के बाद आने वाले युग में स्वयं को उस गतंव्य तक नहीं पहुंचा सका जिसका निर्धारण इस्लाम और पैगम्बरे इस्लाम ने किया था। यद्यपि ईश्वर की यह कृपा रही है कि उसने इस्लामी देशों में भौतिक संपत्ति व पुंजी के भंडार रखे हैं जो उनकी प्रगति का साधन बन सकते थे किंतु यह देश विभिन्न क्षेत्रों में पिछड़ेपन का शिकार हैं। इस्लाम ने मुसलमानों को यह नहीं सिखाया था। यह वह अजांम था जो मुसलमानों की अचेतना व बुरे कर्मों के कारण सामने आया था।

     

    यह बात बिल्कुल सही है किसी भी समाज की आतंरिक कमजो़रियां शत्रु के आक्रमण की भूमिका होती हैं किंतु कभी शत्रु अपने साधनों व हथकंडों का प्रयोग करते हुए अच्छे भले समाजों में भी इस प्रकार की कमज़ोरियां उत्पन्न कर देता है। मुसलमानों को किसी भ्रांति में नहीं पड़ना चाहिए। इसलामी राष्ट्र के आंदोलन का रुख आज भी साम्राज्यवादी और वर्चस्वादी शक्तियों के हितों के विपरीत दिशा में होना चाहिए जिन्हों ने इस्लामी जगत पर अपने पंजे गाड़ रखे हैं। इस्लामी देश ईरान से उनकी शत्रुता का मूल कारण , ईरान में इस्लाम के प्रति प्रेम है। उनका पूरा प्रयास है कि विश्व में कहीं भी इस्लामी चेतना की लहर आरंभ न होने पाए। इस शत्रुता में अमरीकी सरकार सब से आगे रही है और उसके पीछे उन छोटी बड़ी शक्तियों की एक बड़ी लंबी पंक्ति हैं जो अपने हितों के कारण इस्लाम से शत्रुता रखती हैं या उन्हें इस्लाम से डर है। इस्लामी गणतंत्र ईरान से शत्रुता का कारण भी यही है कि इस्लामी चेतना का आरंभ यहीं से हुआ है।

    वर्षों तक पश्चिम की अश्लील संस्कृति बिना किसी रोक टोक के इस्लामी देशों में अश्लीलता फैलाती रही है। खेद की बात यह है कि भ्रष्ट और विदेशियों पर निर्भर सरकारें इस सांस्कृतिक धावे से मुक़ाबले के लिए कुछ नहीं कर सकीं यद्यपि यह वास्तव में हर देश की सरकार की ज़िम्मेदारी होती है। परिणाम यह निकला कि पश्चिमी देशों के नेता, राजनीतिक वर्चस्व और आर्थिक लूटमार के साथ ही इस्लामी देशों में अपनी तुच्छ व लज्जाजनक संस्कृति का प्रचार व प्रसार भी करने लगे और कोई भी उन्हें रोकने वाला नहीं था। (http://hindi.irib.ir)