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    इस्लामी जीवन शैली में विवाह का मानदंड

    इस्लामी जीवन शैली में विवाह का मानदंड
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    जैसा कि इससे पहले हमने इस बात का उल्लेख किया था कि शादी हर व्यक्ति की ज़िन्दगी की बहुत ही महत्वपूर्ण घटना है। इसलिए परिवार के गठन को स्वभाविक, बौद्धिक यहां तक कि धार्मिक एवं सामाजिक नज़र से भी मानव जीवन की ज़रूरत बताया गया है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि समाज का कल्याण सही शादी और उसकी सभी आयामों से देखभाल पर निर्भर है। यही कारण है कि यदि शादी सही सिद्धांत पर होगी तो इससे पति-पत्नी दोनों का विकास होगा और परिवार व समाज मानसिक दृष्टि से स्वस्थ रहेगा।

    जीवन साथी के चयन में अगर सही मानदंड को नज़र में न रखा जाए तो यह परिवार में बहुत सी समस्याओं का कारण बन सकता है। मनोवैज्ञानिकों और पारिवारिक मामलों के परामर्श दाताओं ने विवाह के संबंध में अनेक मानदंड पेश किए हैं जो वैचारिक, मानसिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आयामों पर आधारित हैं। उनका मानना है कि जिस सीमा तक महिला और पुरुष शादी से पहले एक दूसरे के बारे में बेहतर व सही जानकारी रखते होंगे वह अपने दांपत्य जीवन की सफलता या विफलता के बारे में बेहतर ढंग से अनुमान लगा सकते हैं। शोध दर्शाते हैं कि लोग अपने जैसा जीवन साथी चुनने में ज़्यादा रूचि रखते हैं जिसमें धार्मिक आस्था, शिक्षा, संस्कृति, परिवार, आर्थिक व सामाजिक स्थिति जैसी समानताएं शामिल हैं। इस प्रकार के लोग ज़िन्दगी को लगभग एक जैसा देखते हैं और उनके उद्देश्व स्वप्न भी एक दूसरे के निकट होते हैं।

    सांस्कृतिक तत्व भी उन महत्वपूर्ण मानदंडों में शामिल हैं जो पति-पत्नी को एक दूसरे के नज़दीक करने में सहायक होते हैं। जिस व्यक्ति में अपने जीवन साथी के साथ सांस्कृतिक दृष्टि से समानता जितनी ज़्यादा होगी, ऐसे व्यक्ति का अपने जीवन साथी के साथ मतभेद कम होगा। अलबत्ता इस बिन्दु का उल्लेख भी ज़रूरी लगता है कि पति पत्नी के रूप में चुनने के लिए आपस में बहुत ज़्यादा समानताओं को मद्देनज़र रखते हुए विवाह के बावजूद भी दोनों में बहुत सी चीज़ों में असमानताएं रहेंगी। इसलिए उन्हें यह सीखना चाहिए कि इन असमानताओं के बावजूद भी साथ में जीवन बिताया जाता है और आपसी मतभेदों को हल करके एक सुखी जीवन का आनंद हासिल किया जा सकता है।

    एक और बिन्दु जिस पर पति-पत्नी दोनों को ही ध्यान देना चाहिए वह संयुक्त रूप से ज़िम्मेदारी लेना है। जिस सीमा तक लड़की-लड़का विभिन्न विशेषताओं में एक दूसरे के निकट होंगे उनका उतना ही सफल दांपत्य जीवन होगा। इन विशेषताओं के समूह को इस्लाम में बराबर के जोड़े के सिद्धांत का नाम दिया गया है। विशेषताओं का यह समूह ईमानदारी, धर्मपरायणता, नैतिकता, पारिवारिक पृष्ठिभूमि, सूझबूझ, ख़ूबसूरती, आयु में उचित अंतर, पीती-पत्नी के व्यवसाय, तथा नशे से दूरी पर आधारित है।
    पारिवारिक जीवन के संबंध में शोध करने वाले ज़्यादातर शोधकर्ताओं का मानना है कि सांस्कृतिक तत्व दांपत्य जीवन को स्थिरता प्रदान करने में बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। पति-पत्नी के व्यवहार पर उतना प्रभाव किसी चीज़ का नहीं होता जितना धार्मिक आदर्शों का होता है। शोध दर्शाते हैं कि व्यक्ति के मूल्य व आस्थाएं, किसी भी तत्व की तुलना में उस पर सबसे ज़्यादा प्रभाव डालते हैं। पति-पत्नी के बीच धार्मिक मूल्यों पर प्रतिबद्धताओं का अभाव और वैचारिक दूरी समय गुज़रने के साथ और गहरी होती जाती है और इससे बहुत सी समस्याएं पैदा होती हैं। क्योंकि धार्मिक आस्थाएं एक व्यक्ति के सभी आयाम पर प्रभावी होती हैं।

    ईरानी मनोवैज्ञानिक डाक्टर ग़ुलामअली अफ़रूज़ कहते हैं, “ इस बात में शक नहीं कि स्थायी व आनंदमय दांपत्य जीवन के लिए विचारों व आस्थाओं में निकटता तथा नैतिक मूल्यों के प्रति पति पत्नी की प्रतिबद्धता बहुत ज़रूरी तत्व हैं।” इस आधार पर ईश्वर पर आस्था रखने वाले एवं अच्छे विचारों वाले महिला और पुरुष अच्छे जीवन साथी की कामना करते हैं। इस कामना के पीछे उनकी पवित्र और परिपूर्णतः की इच्छुक प्रवृत्ति होती है। इसलिए ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन में पवित्र स्वभाव के महिला व पुरुष के बीच विवाह को सबसे अच्छा विवाह कहा गया है। जैसा कि नूर नामक सूरे की आयत संख्या 26 में ईश्वर कह रहा है, पवित्र औरतें पवित्र मर्दों के लिए हैं और पवित्र मर्द पवित्र औरतों के लिए हैं। इन्सान की पवित्र प्रवृत्ति जो उसके अस्तित्व की सर्वश्रेष्ठ संपत्ति है, इसका आधार ईश्वर पर विश्वास और उसका डर है। इस बिन्दु की उपेक्षा का अर्थ यह है कि जीवन का आधार कमज़ोर है।
    इस बात में शक नहीं कि पति-पत्नी की धार्मिक आस्थाएं जितनी मज़बूत होंगी संयुक्त जीवन में उतना ही आकर्षण पैदा होगा। धार्मिक समानताएं दांपत्य जीवन को मज़बूत करने वाली ज़न्जीर की सबसे सुंदर कड़ी है।

    व्यवहार व नैतिकता के मानदंड भी जीवन साथी के चयन में प्रभावी होते हैं। नैतिक विशेषताओं पर इस हद तक बल दिया गया है कि इसे दांपत्य जीवन की ज़रूरी शर्त समझा गया है। शोध दर्शाते हैं कि मीठी ज़बान, चरित्र, सच्चाई, दूसरों की ग़लतियों को माफ़ करने जैसी विशेषताएं सफल दाम्पत्य जीवन के लिए बहुत ज़रूरी हैं। इस्लाम ने शादी के लिए ईमान और नैतिकता पर बहुत बल दिया है। पैग़म्बरे इसलाम का एक कथन है, “ जब कोई तुम्हारी बेटी का हाथ मांगने आए तो उसे अपनी बेटी दो जिसकी धर्मपरायणता और नैतिकता तुम्हें पसंद हो।”
    सामाजिक एवं सांस्कृतिक आधारों में समन्वय भी दांपत्य जीवन की सफलता में प्रभावी तत्व है। सांस्कृतिक एवं सामाजिक असमानता पति-पत्नी को एक दूसरे को समझने में मुश्किल पैदा करती है। अलबत्ता ऐसे उदाहरण भी मौजूद हैं कि पति-पत्नी सामाजिक एवं आर्थिक असमानता के बावजूद सफल दांपत्य जीवन जीते हैं। इस बात में शक नहीं कि इस तरह के उदाहरण में नैतिकता और ईमानदारी की निर्णायक भूमिका होती है। शोध दर्शाते हैं कि पति-पत्नी के परिवारों में सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से अपेक्षाकृत समानता भी उनके बीच एक दूसरे को समझने में महत्वपूर्ण कारक होती है।

    ख़ूबसूरती और विदित आकर्षण को भी दांपत्य जीवन के मानदंड में गिना जाता है। यदि विवाह में दोनों पक्षों की रूचि न हो तो एक दूसरे से दूरी पैदा होना स्वाभाविक सी बात है। इस्लाम ने विवाह के इस आयाम पर मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ध्यान दिया है। क्योंकि जब दोनों की रूचि होगी तो दांपत्य जीवन सफल रहेगा।
    इस तरह विवाह की सफलता के लिए एक और बिन्दु को बहुत अहमियत दी जाती है और वह दोनों के बौद्धिक स्तर में समानता है। पति-पत्नी के बौद्धिक स्तर और पारिवारिक जीवन में आनंद के संबंध में हुए शोध से पता चलता है कि अगर पति-पत्नी एक दूसरे को बौद्धिक दृष्टि से कम समझेंगे तो ऐसे परिवार वैवाविह जीवन में कम संतोष का आभास करेंगे। इस दृष्टि से पति-पत्नी की शिक्षा के क्षेत्र में समानता भी दोनों को एक दूसरे के निकट लाने में प्रभावी होती है। अलबत्ता सिर्फ़ शिक्षा अकेले दांपत्य जीवन की सफलता की गैरंटी नहीं हो सकती।

    इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि शादी एक ज़रूरी व निर्णायक मामला है इसकी सफलता या विफलता व्यक्ति के जीवन में बहुत प्रभावी होती है। अच्छा जीवन साथी एक ओर वैवाहिक जीवन में आनंद लाता है तो दूसरी ओर एक दूसरे की आंतरिक क्षमता के विकसित होने की पृष्ठिभूमि समतल करता है। इसके विपरीत यदि जीवन साथी अच्छा न हो तो व्यक्ति अपने जीवन में हताशा और नीरसता का आभास करता है। यहां तक कि जल्दी बूढ़े होने की आशंका भी रहती है और उसकी क्षमता भी निखरने के बजाए बुझ जाती हैं। इसलिए जो लड़का और लड़की शादी करने का इरादा रखते हैं उन्हें चाहिए कि शादी के लिए ऐसे परिवार का चयन करें जो शरीफ़ हों। ऐसे परिवारों में शादी न करें जहां नैतिक मूल्यों को अहमियत नहीं दी जाती।

    शरीफ़ परिवारों में मां-बाप यह कोशिश करते हैं कि नैतिकता व व्यवहार की दृष्टि से अपने बच्चों के लिए नमूना बनें और ऐसे परिवार अपने बच्चों को बहुत ही मूल्यवान संस्कार मीरास में देते हैं। शरीफ़ परिवारों के बच्चे नैतिक मूल्य अपने मां-बाप से पाते हैं और जीवन की कठिनाइयों में कभी भी सही मार्ग को नहीं छोड़ते। दूसरे शब्दों में वे अपने आत्मसम्मान की रक्षा करते हैं और यही चीज़ उन्हें गुमराह होने से बचाती है।

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