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    इस्लामी लोकतंत्र 1

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    लोकतंत्र अर्थात देश के संचालन और सरकार की राजनैतिक कार्यविधि में जनता की इच्छाओं को आधार और केन्द्र माना गया है। लोकतंत्र का अर्थ राजनैतिक व्यवस्था और इस व्यवस्था के संचालनकर्ताओं का जनता की ओर से चुनकर आना है। इस वास्तविक अर्थ उसी समय पूरा होता है जब जनता का निर्णय, जनता का ईमान, जनता का प्रेम, जनता की दूरदर्शिता और जनता की भावनाओं की दृष्टि से यह सहमति पायी जाए कि यह राजनैतिक व्यवस्था स्थापित हो।

    लोकतंत्र के भी लो आयाम हैं। लोकतंत्र का एक पहलू यह है कि व्यवस्था का ढांचा जनता की इच्छा और विचार के अनुरूप अस्तित्व में आए। अर्थात जनता शासन व्यवस्था, सरकार, सांसदों और मुख्य अधिकारियों का प्रत्यक्ष रूप से चयन करे। जनता के चयन का पहलू धार्मिक लोकतंत्र में भी पाया जाता है और यह इसके दो आयामों में से एक है। आवश्यक है कि जनता चाहे, पहचाने, निर्णय करे और चयन करे ताकि इन के बारे में जनता का धार्मिक दायित्व पूरा हो सके। बिना पहचान, ज्ञान और  रूचि के उनका कोई कर्तव्य नहीं होगा। लोकतंत्र का दूसरा आयाम यह है कि जब देश के अधकारियों का चयन हो गया तो जनता के प्रति उनके कुछ गंभीर दायित्व भी हैं।

    इस्लामी लोकतंत्र यह है कि उसमें ईश्वरीय धर्म की प्रभुसत्ता, जनता की इच्छा, जनता के ईमान और मांगों तथा भावनाओं से जुड़ी होती है। एक मनुष्य जिस प्रकार स्वयं को केवल ईश्वर का बंदा समझता है उसी प्रकार ईश्वर से विनती करता है कि उसे सदाचारियों के मार्ग का पथिक बना दे। सदाचारियों के मार्ग पर चलना, ईश्वर के चुने हुए बंदों का अनुसरण और पैग़म्बर या हर उस व्यक्ति का आज्ञापालन जो इस्लामी समाज की बागडोर संभाले। यह किसी एक व्यक्ति के सामने सिजदे में गिर जाना नहीं है। किसी व्यक्ति की इच्छाओं की ज़ंजीर में जकड़ कर रह जाना नहीं है। इस्लाम  जिस चीज़ का प्रभुत्व है वह है विचारधारा और मत जो मानव जाति के कल्याण और सौभाग्य को सुनिश्चित बनाता हो।

    तार्किक और सही रूप में लोकतंत्र का संस्थापक इस्लाम है। पैग़म्बरे इस्लाम के शासन में यह हुआ कि मुसलमान एक  एक करके आए और उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम की बैअत की अर्थात उनके आज्ञापालन का वचन दिया। पुरुष भी आए और महिलाएं भी आयीं। उस काल में महिलाओं का कोई आदर नहीं करता था। केवल अरबों में भी महिलाओं को तुच्छा नहीं समझा जाता था बल्कि ईरान और रोम के शासनों में भी महिलाओं को इस बात की अनुमति नहीं थी कि वह किसी भी मामले में सामने आएं। किंतु पैग़म्बरे इस्लाम को ईश्वर का आदेश हुआ कि जब ईमान वाली महिलाएं आपके पास बैअत के लिए आएं तो और उनसे उसी प्रकार बैअत लें जैसे पुरुषों से बैअत लेते हैं। महिलाओं ने भी जाकर पैग़म्बरे इस्लाम की बैअत की।

    देश के अधिकारियों के सुधार और उनके चरित्र के उत्थान के लिए जो चीज़ आज आधार बन सकती है वे धार्मिक लोकतंत्र है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने गवर्नर मालिके अश्तर से कहा कि न लोगों पर यह एहसान जताओ कि मैंने यह काम तुम्हारे लिए किए हैं या करना चाहते हैं और न ही यह करो के वादा करके उसे पूरा करना भूल जाओ। इसके बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि यदि तुमने एहसान जताया तो तुम्हारे भले कर्म का महत्व समाप्त हो जाएगा। अतिशयोक्ति सत्य के प्रकाश को धूमिल कर देती है। अर्थात वह थोड़ी बहुत सच्चाई जो शेष रह गई है अतिशयोक्ति करने से वह भी समाप्त हो जाएगी। और यदि वचन तोड़ दिया तब तो फिर यह लोगों की दृष्टि में भी और ईश्वर की दृष्टि में भी पाप है।

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