islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. इस्लामी लोकतंत्र-2

    इस्लामी लोकतंत्र-2

    Rate this post

    इस्लाम धर्म अर्थात मानवता और मानवीय मूल्यों का समर्थक धर्म, प्रेम, सहानुभूति और सहिष्णुता का प्रचार करने वाला धर्म, भाईचारे और स्नेह का धर्म। यह वह धर्म है जो सामाजिक अधिकारों की कसौटी है। इस्लाम के अनुसार समाज एसा होना चाहिए जिसमें कमज़ोर व्यक्ति शक्तिशाली व्यक्ति से भी अपना अधिकार प्राप्त करने में सक्षम हो और इसमें उसे किसी कठिनाई का सामना न करना पड़े। यह इस्लाम का संदेश है। यही वास्तविक इस्लामी समाज है। आज यही संदेश दूसरे राष्ट्रों के दिलों में उतरता जा रहा है। विश्व के किस भाग में यह व्यवस्था लागू है? कौन सा लोकतंत्र है और कौन सा लिबरलिज़्म है और कौन से मानवाधिकार हैं जिनके बारे में बड़े बड़े दावे किए जाते हैं। आज दावों के बिल्कुल विपरीत काम किया जा रहा है।
    इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था ने विश्व के सामने जो विचार पेश किया है वह बिल्बुल नया और पूरी तरह धर्म से लिया गया है। भौतिक अनुभवों और विचारों में यह बात आम हो गई थी कि आधुनिकता को धार्मिक विचारों और आध्यात्मिक सोच से अलग रखा जाए बल्कि उनको एक दूसरे का विरोधी समझा जाए। धर्म और अध्यात्म से संबंधित बातों को चाहे वो इस्लामी हो या ग़ैर इस्लामी, रूढ़िवाद कहा जाता है। धर्म के संबंध में यह ग़लत विचार बहुत आम है।
    आज इसके विपरीत इस्लामी गणतंत्र ने जो सामाजिक न्याय पेश किया है और इस्लामी शैली के अंतर्गत मानवाधाकारों का जो विचार पेश किया है वह लोकतांत्रिक दुनिया मे पेश किए जाने वाले विचार से बहुत बेहतर हैं। इस्लामी गणतंत्र ईरान का सामाजिक न्याय, तथाकथित सोशियलिस्ट संसार से कहीं ज़्यादा आधुनिक है। ईरान में मानवाधिकार और स्वतंत्रता तथाकथित लोकतांत्रिक दुनिया से अधिक बेहतर है और दुनिया इसको मानती भी है।
    इस्लामी जगत को लोकतंत्र और मानवाधिकार के संबंध में पश्चिम के ग़लत आदर्श की आवश्यकता नहीं है जिसका बहुत बार विरोध भी किया जा चुका है। इस्लामी शिक्षाओं में लोकतंत्र और मानवाधिकार का स्थान बहुत स्पष्ट है।
    इस्लाम, मानवाधिकार और मानवीय प्रतिष्ठा का रक्षक, शिष्टाचार और नैतिकता का पहरेदार तथा शांति का ध्वजवाहक है। खुला हुआ झूठ और निराधार आरोप उन्हीं लोगों की ज़बान से सुनाई देता है जो इस्लाम को मानवाधिकार, सभ्यता और शांति का विरोधी ठहराते हैं।
    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने गवर्नर मालिके अशतर के नाम अपने पत्र में निर्देश दिया कि जनता के साथ एसा बर्ताव करो, इस प्रकार का सुलूक करो, दरिंदे की भांति उन पर टूट न पड़ो। इसके बाद वह लिखते हैं कि प्रजा में जो लोग हैं या तो वह मानवधता में तुम्हारे साझीदार हैं अर्थात तुम्हारी भांति वह भी मनुष्य हैं। अर्थात जहां हक़ दिलाने और न्याय करने की बात है तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम के विचार में उस व्यक्ति का मुसलमान होना शर्त नहीं है। इस संदर्भ में मुसलमान और ग़ैर मुस्लिम दोनों एकसमान हैं। यह कितना महान विचार है जो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने पेश किया है। इस समय कुछ लोग संसार में मानवाधिकार की रट तो बहुत लगाते हैं किंतु यह सरासर झूठ और दिखावा होता है। कहीं भी, यहां तक कि उनके अपने देशों में भी मानवाधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता। पूरी दुनिया की तो बात ही अलग है। वास्तविक रूप से देखा जाए तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने मानवाधिकार की सही परिभाषा पेश की है।
    इस्लाम तो अपराधियों के भी अधिकारों का ध्यान रखने पर बल देता है। किसी को भी उस व्यक्ति को अपशब्द कहने की अनुमति नहीं है जिसे फांसी दी जाने वाली हो क्योंकि यह अन्याय होगा। गाली देना, अत्याचार समझा जाएगा। गाले देने से उसके अधिकार का हनन होगा। अतः गाली देने वाले को रोका जाना चाहिए। यह है मृत्युदंड पाने वाले अपराधी के साथ बर्ताव की बात तो फिर जेल की सज़ा पाने वाले और उस व्यक्ति की बात ही अलग है जिस पर लगे आरोप अभी सिद्ध नहीं हुए हैं। यह वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध आरोप गढ़ लिए गए हैं और केवल अटकलें लगाई जा रही हैं।
    इस्लाम में महिलाओं के अधिकार और सामाजिक एवं राजनैतिक मैदानों में उनकी भूमिका का विचार एक मान्य सच्चाई है। इस्लाम कहता है कि महिलाएं जाकर पैग़म्बरे इस्लाम की बैअत करती थीं। पैग़म्बरे इस्लाम ने यह नहीं कहा कि पुरुष बैअत करें और महिलएं अपने पति या पिता के फ़ैसले के अनुरूप कार्य करें। नहीं, उन्होंने कहा कि पुरुष भी बैअत करें और महिलाएं भी बैअत करें। इस प्रकार देखा जाए तो पश्चिम वाले इस्लाम से बहुत पीछे हैं।
    यदि देश में महिलाओं के वर्ग को इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर उन तथ्यों के परिचित कराया जाए जिनका इस्लाम ने आदेश दिया है तो देश का विकास कई गुना बढ़ जाएगा। जिस क्षेत्र में भी महिलाओं ने दायित्व संभाल लिया उसमें विकास की गति कई गुना वृद्धि हो जाएगी। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की उपस्थिति की विशेषता यह है कि जब घर की महिला किसी मैदान में क़दम रखती है तो इसका अर्थ यह होता है कि उसका पति और उसके बच्चे भी उस मैदान में उतर गए हैं।
    यदि महिला को ज्ञान प्राप्ति का पूरा अवसर न दिया गया तो यह उसके साथ अन्याय होगा। यदि बहुत अधिक व्यस्तता के कारण महिला अपने शिष्टाचार औज्ञ अपने धर्म के बारे में सोचने का अवसर प्राप्त न कर सकी तो यह उसके साथ अन्याय होगा। यदि महिला को उसकी निजी सम्पत्ति से उसकी इच्छा के अनुरूप स्वतंत्रतापूर्वक लाभ उठाने का अवसर न दिया गया तो यह भी उसके साथ अत्याचार होगा। विवाह के समय यदि महिला पर पति को थोप दिया जाए, अर्थात यदि पति के चयन में उसकी अपनी कोई भूमिका न हो और उसकी इच्छा कुछ और हो तो यह उसके साथ सरासर अन्याय और अत्याचार होगा।
    वैवाहिक जीवन के दौरान या पति से अलग हो जाने के बाद यदि महिला को बच्चों के संबंध में अपनी भावनाओं को संतुष्ट करने का अवसर न दिया जाए तो यह उसके साथ अत्याचार है। यदि महिला के भीतर योग्यताएं हैं जैसे ज्ञान संबंधी योग्यताएं, अनुसंधान की योग्यताएं, आविष्कार की योग्यताएं, राजनैतिक योग्यताएं, सामाजिक कामों की क्षमताएं और उसे इन योग्यताओं के प्रयोग और उन्हें निखारने का अवसर न दिया गया तो यह उन पर अत्याचार है।
    महिला का सबसे महत्वपूर्ण मामला यह नहीं है कि उसे रोज़गार मिला है या नहीं। महिला की मूल आवश्यकता उसकी सुरक्षा है जो दुर्भाग्य से पश्चिम में उपेक्षित है। उसे सुरक्षा का आभास होना चाहिए। उसे क्षमताओं और योग्यताओं को विकसित करने का अवसर मिलना चाहिए।
    http://hindi.irib.ir/