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    इस्लामी संस्कृति व इतिहास-5

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    इस्लामी सभ्यता के विकास के मार्ग की महत्त्वपूर्ण चर्चाओं में दर्शनशास्त्र और इसके विकास में मुसलमान दर्शनशास्त्रियों की भूमिकाएं हैं। दर्शनशास्त्र वह मानवीय ज्ञान है जिसमें सृष्टि, चीज़ों के अंत और आरंभ विशेषकर मनुष्य के विशेष स्थान के बारे में चर्चा की जाती है। दर्शनशास्त्र को अंग्रेज़ी में फ़्लास्फ़ी कहते हैं जो यूनानी शब्द फ़ैलासूफ़िया से निकला है जिसका अर्थ होता है ज्ञान को चाहना या पसंद करना।

    प्राचीन यूनान में सूफ़िस्ताई अर्थात सफ़िस्टकेटिड स्वयं को सूफ़िस्त अर्थात ज्ञानी, विवेकी और प्रबुद्ध कहते थे और उनका उद्देश्य लोगों को शिक्षा देना था किन्तु सुक़रात ने उनकी विचारधारा का विरोध किया और इस विषय में स्वयं और सूफ़िस्ताईयों के मध्य अंतर बयान करते हुए सुक़रात ने कहा कि सूफ़िस्ताईयों को ज्ञात ही नहीं है कि वह बहुत से विषयों से अनिभिज्ञ हैं किन्तु उसे इस विषय के बारे में पूरा विश्वास है और उसे मालूम है कि वह नहीं जानता। इसीलिए उसने स्वयं को फ़ैलासूफ़ अर्थात ज्ञान से प्रेम करने वाला कहना आरंभ किया। जब सुक़रात से पूछा गया कि क्या तुम ज्ञानी हो? तो उसने उत्तर दिया “नहीं” किन्तु ज्ञान से मुझे प्रेम है। इस आधार पर दर्शन शास्त्र के अस्तित्व में आने के आरंभिक दिनों से ही दर्शनशास्त्र का अर्थ ज्ञान और सोचविचार से प्रेम करना है।

    दर्शनशास्त्र की विभिन्न परिभाषाएं की गयी हैं। कुछ दर्शनशास्त्रियों ने दर्शनशास्त्र की परिभाषा इस प्रकार की है वह ज्ञान जिसमें अस्तित्व के बारे में चर्चा की जाती है। कुछ दर्शनशास्त्रियों का कहना है कि वह ज्ञान जिसमें मानवीय क्षमता के आधार पर वस्तुओं की वास्तविकता के बारे में चर्चा की जाए। यह कहा जा सकता है कि हर दर्शनशास्त्री ने अपने ज्ञान के अनुसार दर्शनशास्त्र की परिभाषा की है और हर परिभाषा का सार अस्तित्व के बारे में ज्ञान प्राप्त करना है। इस्लामी जगत में दर्शनशास्त्र तीन भागों में विभाजित होता है।

    इस्लामी दर्शनशास्त्र का एक भाग फ़लसफ़ये मश्शाई है अर्थात मश्शाई पंथ का दर्शनशास्त्र। फलसफ़ये मश्शाई का आधार तार्किक और तर्क संगत बातें हैं। दर्शनशास्त्र के इस पंथ अर्थात मश्शाई पंथ के संस्थापक अरस्तू हैं। कहा यह जाता है कि अरस्तू टहल टहल कर और रास्ता चलते हुए अपने शिष्यों को पढ़ाते थे। इसीलिए इस दर्शनशास्त्र का नाम मश्शाई अर्थात रास्ता चलने वाला पड़ा। इस पंथ के लोगों का मानना है कि मनुष्य की बुद्धि और उसका मस्तिष्क रास्ता चलते समय अधिक सक्रिय होता है। इसका उदाहरण यह है कि आजकल हम यह देखते हैं कि कुछ बच्चे टहल टहल कर स्कूल में दिए होमवर्क को याद करते हैं या परीक्षा की तैयारी करते हैं।

    इस्हाक़ किन्दी, फ़ाराबी, अबू अली सीना, इमाम फ़खरूद्दीन राज़ी और इब्ने रूश्द जैसे महान मुसलमान दर्शनशास्त्री और बुद्धिजीवी मश्शाई पंथ के दर्शन शास्त्री थे और इन्होंने इस पंथ पर बहुत कार्य किए और उसके बाद इन्हीं के प्रयासों से मश्शाई दर्शनशास्त्र पश्चिम पहुंचा।

    इस्लामी दर्शनशास्त्र का दूसरा भाग इशराक़ी फ़लसफ़ा है। अरबी भाषा में इशराक़ का अर्थ है स्पष्ट होना, चकमकना और प्रकाशमयी होना। समय और काल की दृष्टि से, सबसे प्राचीन और सबसे पहला दर्शनशास्त्र, इशराक़ी दर्शनशास्त्र है। सामान्य, साधारण और स्पष्ट होने के कारण इसका नाम इशराक़ी दर्शनशास्त्र रखा गया। इशराक़ी दर्शनशास्त्र के संस्थापक अफ़लातून थे और इस्लामी जगत में इस दर्शनशास्त्र के अग्रणी और ध्वजवाहक शेहाबुद्दीन मुहम्मद सोहरवर्दी है। इशराक़ी पंथ में सोहरवर्दी के अनुयायी शहरूज़ी और अल्लामा क़ुतुबुद्दीन शीराज़ी हैं जिन्होंने इस दर्शनशास्त्र पर कार्य किया।

    11वीं हिजरी क़मरी के विख्यात व प्रसिद्ध दर्शनशास्त्री व परिज्ञानी मुल्ला सद्रा के नाम से प्रसिद्ध सदरूद्दीन मुहम्मद शीराज़ी ने हिकमतुल मुताआलिया के नाम से एक नवीन, विस्मयकारक, अनूठे और अनछुए दर्शनशास्त्र का आधार रखा। उन्होंने इस दर्शनशास्त्र में केवल मश्शाई और इशराक़ी दर्शनशास्त्र के मध्य ही नहीं बल्कि पूर्णरूप से पूरे दर्शनशास्त्र, अंतर्ज्ञान और वादशास्त्र के मध्य मेल पैदा किया और इन सब विषयों को उन्होंने हिकमतुल मुताआलिया के अंतर्गत एकत्रित किया। इस प्रकार से उन्होंने बहुत सारे विवादित विषयों को हल किया और बहुत सी गुत्थियों को सुझाया जो इससे पहले तक समाधान योग्य नहीं थीं। मुल्ला सदरा के बाद हिकमते मुताआलिया ने मुसलमान दर्शनशास्त्रियों की विचारधाराओं पर बहुत अधिक प्रभाव डाला।

    अब्बासी शासन श्रंखला के काल में और अनुवाद क्रांति के बाद मुसलमान यूनान की दर्शनशास्त्र की उन पुस्तकों से परिचित हुए जिनका अरबी भाषा में अनुवाद किया गया था। अलबत्ता मुसलमान बुद्धिजीवियों और दर्शनशास्त्रियों ने इस मार्ग में बहुत प्रयास किए और दर्शनशास्त्र के विकास में महत्त्वपूर्ण भागीदारी निभाई।

    अबू यूसुफ़ इसहाक़ किन्दी प्रथम मुसलमान दर्शनशास्त्री समझे जाते हैं। वही पहले मुसलमान थे जिन्होंने दर्शनशास्त्र, विज्ञान और विभिन्न ज्ञानों में गहन शोध और अध्ययन किया इसीलिए उन्हें अरब दर्शनशास्त्री कहा जाता है। दूसरी और तीसरी सहस्त्राब्दी में इराक़ का कूफ़ा नगर, तर्क से संबंधित ज्ञानों का शोध केन्द्र था और किन्दी ने इसी वातावरण में ज्ञान प्राप्त किया और दर्शनशास्त्र में निपुण हुए। उन्होंने यूनानी और सीरियक भाषाएं सीखीं और मूल्यवान व महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का अरबी में अनुवाद किया। किन्दी अपने समय के अधिकांश प्रचलित ज्ञानों में बहुत की दक्ष व निपुण थे और अरस्तू व इब्ने सीना के बराबर समझे जाते थे। किन्दी ने अंतर्गान के समस्त आयामों का इस प्रकार से गहन अध्ययन किया कि ब्रिटेन के राजनेता और दर्शनशास्त्री फ़्रांसिस बेकन ने किन्दी और इब्ने हैसम को बतलीमूस का हम पल्ला बताया है। यहां तक कि बग़दाद के प्रसिद्ध पुस्तकविद और शोधकर्ता इब्ने नदीम उनके बारे में कहते हैं कि किन्दी प्राचीन ज्ञानों को समझने में अपने समय व काल के अकेले व सबसे विद्वान और ज्ञानी व्यक्ति थे।

    तीसरी हिजरी शताब्दी में किन्दी की अधिकांश आयु ऐसी स्थिति में गुज़री कि महान अनुवाद क्रांति और यूनानियों की विचारधारा चरमबिंदु पर थी। उन्होंने इस काल में अपने ज्ञान में वृद्धि की और धार्मिक शास्त्रार्थ और धार्मिक चर्चाओं व वार्ताओं से भरे वातावरण में दर्शनशास्त्र को बड़ी कठिनाईयों से सीखा।

    अलहुदूद नामक पुस्तक में उनके दृष्टिकोण बयान हुए हैं। किन्दी ने इस पुस्तक में दर्शनशास्त्र की परिभाषा इस प्रकार की है कि वह ज्ञान है जिसमें मानव की क्षमता के आधार पर वस्तुओं की वास्तिकता को जाना जाता है। यदि दर्शनशास्त्र वस्तुओं की वास्तविकता का ज्ञान हो तो इस आधार पर दर्शनशास्त्र और धर्म में कोई मतभेद नहीं पाया जाता। दर्शनशास्त्र की इस परिभाषा से किन्दी ने दर्शनशास्त्र और धर्म के मध्य समन्वय उत्पन्न करने का प्रयास किया। उनका कहना है कि दर्शनशास्त्र और धर्म दोनो ही सत्य का ज्ञान है। किन्दी ही पहले दर्शनशास्त्री हैं जिन्होंने सबसे पहले धर्म और दर्शनशास्त्र के मध्य तालमेल स्थापित किया और फ़राबी, इब्ने सीना और इब्ने रूश्द जैसे दर्शनशास्त्रियों व विद्वानों के लिए इस मार्ग को प्रशस्त किया।

    अलबत्ता किन्दी ने अपने आरंभिक दृष्टिकोणों में तर्कशास्त्रियों की शैली से लाभ उठाया और धर्म को दर्शनशास्त्र के स्थान तक नीचे ले आए। किन्तु बाद में उन्होंने अपने दृष्टिकोंणों में पुनर्विचार किया, इस प्रकार से कि बाद के दृष्टिकोंणों में उन्होंने धर्म को ईश्वरीय ज्ञान बताया जो दर्शनशास्त्र की सीमा से बहुत ऊंचा है। किन्दी अपनी दूसरी पुस्तक में कहते हैं कि ईश्वरीय धर्म को ईश्वरीय दूतों की वहि शक्ति से पहचाना जाना चाहिए। वह लिखते हैं कि मैं अपनी जान की सौगन्ध खाकर कहता हैं कि सच्चे पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम का व्यवहार और वह समस्त चीज़ें जो वह ईश्वर की ओर से लाए, बुद्धि के पैमाने पर तौली जाए तो स्वीकार योग्य हैं और वही लोग जो बुद्धि की विभूति से वंचित हैं इसका इनकार करते हैं।

    किन्दी के अनुसार फ़लसफ़ये ऊला, दर्शन शास्त्र का सबसे सज्जन, सबसे प्रिय और सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है। फ़लसफ़ये ऊला उस दर्शन शास्त्र को कहते हैं जिसमें उन विषयों पर चर्चा की जाती है जिसके लिए न तो बुद्धि में और न ही बाहर किसी पदार्थ की आवश्यकता होती। इस्लामी दर्शनशास्त्र में इसी को इल्म बेज़ाते ख़ुदा कहते हैं। इसमें ईश्वर के एक होने और उसके अस्तित्व के अनिवार्य होने इत्यादि जैसे विषयों पर चर्चा की जाती है। इसी विषय के दृष्टिगत किन्दी का मानना है कि दर्शनशास्त्र सीखना अनिवार्य है। दर्शनशास्त्र सीखाने में किन्दी की शैली, पूर्वजों की बातों का अनुसरण और उनकी बातों को बहुत की साधारण ढंग से बयान करना था ताकि जो भी दर्शनशास्त्र सीखना चाहे सरलता से सीख ले।

    किन्दी ने बहुत सी पुस्तकें लिखीं हैं और कुछ ने तो कहा है कि उन्होंने लगभग 270 पुस्तकें लिखीं हैं। किन्दी द्वारा लिखी गयीं पुस्तकें 17 भागों में विभाजित होती हैं। किन्दी ने अपनी पुस्तक में जिन महत्त्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की है उनमें दर्शनशास्त्र, तर्कशास्त्र, गणित, संगीत, खगोलशास्त्र, रेखागणित और चिकित्सा इत्यादि शामिल हैं।

    उल्लेखनीय बात यह है कि दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में कुछ पुस्तकों का स्वयं किन्दी ने अनुवाद किया और उसकी व्याख्या की। उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक का नाम “फ़ी माहियतिल अक़्ल” है। इस पुस्तक में उन्होंने बुद्धि को चार भागों में विभाजित किया है। बुद्धि, व्यवहारिक बुद्धि जिसे अक़्ल बिल फ़ेल कहा जाता है, मनुष्य के भीतर मौजूद बुद्धि जिसे अक़्ल बिल क़ूवह कहा जाता है और बुद्धि का चौथा भाग है तर्क के आधार पर बुद्धि जिसे अक़्ले बुरहानी कहा जाता है।