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    इस्लामी संस्कृति व इतिहास-6

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    जब तक इस बारे में चर्चा नहीं कर ली जाती कि लिखने की कला किस प्रकार अस्तित्व में आई और मुसलमान इस कला से किस प्रकार अवगत हुए तब तक इस्लामी सभ्यता के विकास की समीक्षा अधूरी है। एक मध्यपूर्व विशेषज्ञ हियोकैनडी इस्लामी सभ्यता के विकास में कागज़ के प्रभाव के बारे में कहते हैं “कागज का आविष्कार हुए बिना मुसलमानों का आरंभिक सांस्कृतिक जीवन कदापि आवश्यक समृद्धि एवं विविधता नहीं प्राप्त कर सका।

    ईश्वरीय धर्म इस्लाम के उदय के बाद इसके जीवन दायक संदेशों व शिक्षाओं के कारण विश्व के एक भाग में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। वास्तव में लिखने की कला ने इस धर्म के संदेशों के प्रचार- प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मुसलमानों के निकट लिखने की कला का इतिहास पवित्र क़ुरआन और उसकी आयतों को लिखने एवं उन्हें सुरक्षित करने के इतिहास से अलग नहीं है। अतः इस इतिहास का एक बड़ा भाग पवित्र क़ुरआन से जुड़ा हुआ है। निः संदेह उतार- चढ़ाव के बावजूद लिखने की कला मुसलमानों की सांस्कृतिक एकता का एक महत्वपूर्ण कारण रही है। मुसलमानों का संबंध किसी भी जाति, क़बीला और भाषा से क्यों न हो उन्हें चाहिये कि वे पवित्र क़ुरआन की तिलावत अरबी भाषा व अरबी लिपी में ही करें। यह बात स्वयं एक राष्ट्र होने का स्पष्ट चिन्ह है।

    एतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार इस्लाम धर्म के आगमन से पूर्व कुछ ही अरब लिखना- पढ़ना जानते थे। क्योंकि अरबों का आरंभिक जीवन इस प्रकार नहीं था कि वह लिखने की कला को उन पर आवश्यक व अनिवार्य कर देता। उस समय अधिकांशतः मौखिक संस्कृति प्रचलित थी और जो भी जातीय एवं क़बाएली गर्व की बात होती थी वह कविता अथवा शौर्यगाथा के रूप में होती थी और वही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरित होती थी। यही परम्परा इस्लामी काल तक पहुंची। साथ ही इस जाति के पुराने रह गये शेरों व कविताओं में लिखने की कला और उसके संसाधनों का उल्लेख मिलता है। हेजाज़ अर्थात वर्तमान सऊदी अरब में की गई खुदाई से पत्थर के ऐसे शिलालेख मिले हैं जिनका संबंध उस क्षेत्र की प्राचीन सरकारों से है। कहा जाता है कि उस क्षेत्र में नब्ती लिपी प्रचलित थी। प्रसिद्ध मुसलमान अध्ययनकर्ता एवं पुस्तक विशेषज्ञ इब्ने नदीम ने अपनी किताब “अलफेहरिस्त” में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के दादा अब्दुल मुतल्लिब के हाथों द्वारा लिखी लिपी की ओर संकेत किया है जिसकी सुरक्षा अब्बासी शासक मामून के राजकोष में की जाती थी।

    पवित्र क़ुरआन की आयतों में प्रयुक्त कुछ शब्द इस बात के सूचक हैं कि इस्लाम के उदय काल में अरब विभिन्न प्रकार की लेखन शैली से अवगत थे। इनमें से किताब और सहीफ़ा का शब्द है। किताब ऐसा शब्द है जिसका प्रयोग पवित्र कुरआन में बारम्बार किया गया है। पवित्र क़ुरआन मुसलमानों को आदेश देता है कि जब वे एक दूसरे को ऋण दें हैं या लेन-देन करें तो उन्हें चाहिये कि वे इसे लिख लें। महान ईश्वर पवित्र क़ुरआन के सूरये बक़रअ की २८२वीं आयत में कहता है” हे ईमान लाने वालो जब तुम नियत समय के लिए एक दूसरे को ऋण दो तो उसे लिख लो और इस बात को तुम्हारे मध्य जो कोई भी लिखे उसे चाहिये कि वह न्याय के के साथ लिखे” पवित्र क़ुरआन की इस आयत के आधार पर मुसलमानों का दायित्व है कि वे अपने आर्थिक एवं व्यापारिक लेन- देन को संधि के रूप में लिख लिया करें। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के कथनों में भी इस बात की ओर संकेत किया गया है। आपने कहा है कि ज्ञान को लिख कर सुरक्षित करो। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के पास कुछ विशेष लिखने वाले होते थे जो पवित्र क़ुरआन की आयतों को लिखते थे या उन लोगों का प्रयोग समझौतों एवं आधिकारिक पत्रों को लिखवाने में होता था। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के पवित्र परिजनों में से हज़रत अली अलैहिस्सलाम भी थे जो पवित्र क़ुरआन की आयतों को लिखा करते थे।

    चूंकि खाल का प्रबंध करना कठिन व महंगा था इसलिए लोग सदैव उसका प्रयोग नहीं कर सकते थे। इतिहास में आया है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब अलैहिस्सलाम खाल पर लिखते थे। खाल के अधिक समय तक टिकाऊ होने के कारण महत्वपूर्ण मामलों में उसका प्रयोग होता था। यहां तक कि बनी अब्बासी शासन के मध्यकाल तक खाल पर लिखने का महत्व अपने स्थान पर बना रहा। खाल का प्रयोग कुछ धार्मिक आदेशों एवं महत्वपूर्ण पत्रों के लिखने के लिए होता था। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम की एक पत्नी उम्मे सलमा कहती हैं कि एक बार पैग़म्बरे इस्लाम ने खाल मांगी और हज़रत अली अलैहिस्सलाम उनके पास थे और पैग़म्बरे इस्लाम बोलते थे एवं हज़रत अली अलैहिस्सलाम लिखते थे यहां तक कि खाल और चारों ओर का भाग भर गया। अरब, पालतू जानवरों विशेषकर ऊंट और बकरी की हड्डियों, खजूर की सुखी छालों यहां तक कि खजूर के सूखे तनों, रेशम के सफेद कपड़ों और घिसी व रन्दा की गई छालों पर लिखते थे।

    पहली हिजरी क़मरी के आरंभिक पचास वर्षों से संबंधित घटनाओं के स्रोतों में व्यक्तियों व शासकों के मध्य आदान- प्रदान होने वाले पत्रों की ओर संकेत किया गया है। सबसे प्रसिद्ध हज़रत अली अलैहिस्सलाम द्वारा लिखे गये वे पत्र हैं जो विख्यात पुस्तक नहजुल बलाग़ा के एक भाग हैं। अलबत्ता मुसलमानों का आस- पास की दूसरी सभ्यताओं से अवगत होना भी लिखने के उपकरणों व संसाधनों से जानकारी में प्रभावी रहा है। मिस्र और शाम अर्थात वर्तमान सीरिया पर मुसलमानों की विजय हो जाने के पश्चात मुसलमान काग़ज़ आरंभिक रूप से अवगत हुए और उसके पश्चात मुसलमानों ने काग़ज़ के आरंभिक रूप पर लिखने को प्राथमिकता दी। अमवी शासन के दौरान और इराक़, मिस्र तथा वर्तमान सीरिया में अब्बासी शासन के आरंभ में काग़ज़ का प्रयोग प्रचलित था। इतिहास में आया है कि अब्बासी शासक मन्सूर ने अपने एक कर्मी को आदेश दिया कि वह किरतासों अर्थात कागज के आरंभिक रूप को, जो राजकोष में एकत्रित हो गये हैं, बाजार में ले जाकर बेच आये ताकि राजकोष में जगह भी खाली हो जाये और सरकार के वित्तीय बजट की सहायता भी हो जाये परंतु कुछ ही क्षणों के बाद उसे इस पर पछतावा हुआ और आवश्यकता होने के कारण उसने किरतास न बेचने का आदेश दिया।

    दूसरी हिजरी शताब्दी के अंतिम पचास वर्षों में किरतास और खाल का स्थान चीनी कागज ने ले लिया और मुसलमानों ने कागज़ उद्योग के विस्तार व उत्पाद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    कागज़ से मुसलमानों के अवगत होने के इतिहास का संबंध मैसोपोटिया पर उनकी विजय से संबंधित है। सालिबी के कथनानुसार १३४ हिजरी क़मरी में मुसलमान कमांडर ज़ियाद बिना सालेह और चीनी व तुर्क सेनापतियों के मध्य तेराज़ नहर के किनारे युद्ध हुआ। तेराज़ नहर मिसोपोटैमिया के उत्तर और उस क्षेत्र में स्थित है जिसे बाद में तुर्कीस्तान के नाम से जाना गया। ज़ियाद बिना सालेह कुछ चीनी बंधकों को जो कागज बनाने के उद्योग से अवगत थे, समरक़न्द लाया। इन बंधकों के माध्यम से समरक़न्द नगर में कागज़ उद्योग में चहल- पहल आ गई और वहां के बने कागजों को दूसरे इस्लामी क्षेत्रों में भी भेजा गया। समरक़न्द का कागज अच्छा और सस्ता होने के कारण विभिन्न कालों में लोगों के मध्य प्रसिद्ध रहा है। उसके बाद मुसलमानों ने कागज़ बनाने की कला व विधि चीनियों से सीखी और स्वयं भी उसकी परिपूर्णता के लिए प्रयास किया। मुसलमान रूई और उगने वाली कुछ दूसरी चीज़ों से कागज बनाते थे। परिणाम स्वरूप पहली हिजरी शताब्दी में नाना प्रकार के कागज बनाये गये। इब्ने नदीम “अलफेहरिस्त” नामक पुस्तक में विभिन्न व्यक्तियों से संबंधित नाना प्रकार के कागज़ों की ओर संकेत करता है।

    धीरे-२ इराक़, मिस्र, सीरिया, मोरक्को, वर्तमान स्पेन और ईरान जैसे इस्लामी क्षेत्रों में कागज़ बनाने की कला प्रचलित हो गई और इन क्षेत्रों में कागज़ बनाया जाने लगा। दूसरी हिजरी शताब्दी के अंत में बग़दाद में हारून रशीद के मंत्री फज़्ल बिन यहिया बरमकी के प्रयास से जिसका संबंध एक ईरानी परिवार था, कागज़ बनाया जाने लगा। इस आधार पर बहुत से प्रमाण हैं जो बग़दाद में कागज बनाये जाने के विशेष केन्द्रों के होने के सूचक हैं। बग़दाद में बनने वाला कागज़ धीरे-२ प्रसिद्ध हो गया और उसे विभिन्न प्रकार के कागजों के मध्य महत्वपूर्ण कागज़ समझा जाता था। ८२१ हिजरी क़मरी के इतिहासकार शहाबुद्दीन क़लक़शन्दी के कथनानुसार बग़दाद का कागज़ इतना अच्छा था कि पवित्र क़ुरआन या उसके किसी खंड को लिखने के लिए अधिकांशः उसी कागज़ का प्रयोग होता था।

    पांचवीं हिजरी शताब्दी में कागज़ निर्माण उद्योग इराक़ से सीरिया गया और वहां पर भी उसमें आश्चर्यजनक परिवर्तन हुए। नासिर खुसरू अपने यात्रावृतांत में त्रिपोली नगर को याद करते हुए लिखता है” इस नगर में समरक़न्द जैसे सुन्दर कागज बनाने जाते हैं बल्कि यह उससे भी उत्तम कागज हैं” दमिश्क़ भी कागज़ बनाने में बहुत प्रसिद्ध था। वहां पर बनने वाले कागज पूर्वी यूरोप भी भेजे गये। मिस्र में भी कागज़ बनाये गये यद्यपि कुछ दूसरे इस्लामी क्षेत्रों की अपेक्षा वहां देर से यह कार्य आरंभ हुआ परंतु क़ाहेरा में बनने वाले कागज़ की रोचकता व गुणवत्ता का उल्लेख मुख्य स्रोतों में किया गया है। इस्लामी जगत के पश्चिम, उत्तरी अफ्रीक़ा, स्पेन और इटली के सिसेल नगर में भी कागज बनाने के कारखाने मौजूद थे और वहां से ग़ैर इस्लामी देशों युरोप में भेजे जाते थे। याक़ूत हमवी के कथनानुसार ईरान में भी सातवीं हिजरी शताब्दी के आरंभ में ज़न्जान के समीप ख़ूनज नगर के लोग कागज़ बनाते थे। इस प्रकार मुसलमानों ने कागज उद्योग के विस्तार में, जो संपर्क एवं सांस्कृतिक आदान- प्रदान का एक महत्वपूर्ण कारक व साधन है, आधारभूति भूमिका निभाई। यह कला मिस्र और स्पेन से युरोप गई। इस प्रकार इटली में कागज बनाने के पहले कारखाने की स्थापना वर्ष १२७६ में, फ्रांन्स में १३४८ में, जर्मनी में १३९० और ब्रिटेन में १४९५ में की गई।