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    इस्लामी संस्कृति व इतिहास-7

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    जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम इस निष्कर्ष पर पहुंच गये कि मदीना नगर इस्लाम और मुसलमानों के लिए सुरक्षित शरणस्थली है तो उन्होंने अपने अनुयाइयों को मदीना नगर पलायन करने का आदेश दिया। स्वंय पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम, अपनी पैग़म्बरी की घोषणा के चौथे वर्ष सोमवार के दिन मदीना नगर की सीमा में प्रविष्ट हुए अलबत्ता इस संदर्भ में इतिहासकारों ने जो तिथि बतायी है उसमें साधारण सा अंतर पाया जाता है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने मक्का से मदीना से निकटतम क्षेत्र अर्थात क़ुबा तक की दूरी ९ दिनों में तैय की और क़ुबा नामक इस स्थान पर उनके संक्षिप्त आवास के दौरान पहली मस्जिद का निर्माण हुआ। कुछ दिनों बाद हज़रत अली अलैहिस्सलात तथा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के अन्य परिजन भी मक्का से आकर उनसे जुड़ गये और फिर सब एक साथ मदीना नगर में प्रविष्ट हुए।

    मदीना या यसरब नगर वास्तव में यहूदियों के दो बड़े क़बीलों और पलायन कर्ता बहुत से क़बीलों का संगम था जिनमें से महत्वपूर्ण क़बीले और और ख़ज़रज थे। चूंकि यह क्षेत्र इन लोगों को एक दूसरे से जोड़ता था इस लिए आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से इस क्षेत्र के लोगों में एक प्रकार का सौहार्द पाया जाता और लोगों में संवेदनशीलता भी कम थी जिसके कारण नये धर्म के प्रचार का उचित वातावरण तैयार हो गया था। इस प्रकार से यसरब में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के धर्म को स्वीकार किये जाने की संभावना अधिक थी क्योंकि इस नगर के गैर यहूदी अरब भी, अपने क्षेत्र के यहूदियों से ईश्वर, ईश्वरीय संदेश, प्रलय, स्वर्ग, नर्क आदि के बारे में बहुत सी बातें सुनते रहते थे। इसके अतिरिक्त सदैव एक दूसरे से युद्धरत रहने वाले औस और खज़रज क़बीलों के लिए एक दूसरे पर वरीयता हेतु इस्लाम, नये घटक से गठजोड़ का सुनहरा अवसर था। यही कारण था इन दोनों क़बीलों ने एक दूसरे से पहले ही नहीं बल्कि यहूदियों से भी पहले इस्लाम से जुड़ने का प्रयास आरंभ कर दिया।

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम शुक्रवार के दिन दोपहर के समय मदीना नगर में प्रविष्ट हुए। उन्होंने पहली नमाजे जुमा पढ़ी और जुमा की नमाज़ के भाषण में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने ईश्वर का गुणगान और प्रशंसा के बाद लोगों को ईश्वर से डरने, भलाई करने और सत्य के मार्ग में संघर्ष की सिफारिश की। जुमा की नमाज़ के पश्चात, वे नगर में प्रविष्ट हुए और मदीना वासियों ने उनका अभूतपूर्व स्वागत किया। इस दिन से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के अनुयाई, दो भागों में बंट गये, जिन लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के साथ मक्का नगर से पलायन किया था उन्हें मुहाजेरीन अर्थात पलायनकर्ता जबकि मदीना नगर के स्थानीय लोगों को अंसार अर्थात सहायक कहा जाने लगा। यसरब नगर में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के प्रवेश के बाद उनके सम्मान में इस नगर को मदीनतुन्नबी अर्थात पैग़म्बर का नगर कहा जाने लगा।

    इस प्रकार से इस्लाम का अभियान मक्का नगर से आरंभ हुआ था किंतु उसके प्रसार व प्रचार के लिए मदीना उपयुक्त स्थान सिद्ध हुआ। मदीना नगर में लोग गुटों के रूप में आकर इस्लाम धर्म स्वीकार कर रहे थे। मुसलमानों की संख्या में असाधारण वृद्धि से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम को प्रथम इस्लामी समाज की आधारशिला रखने का अवसर प्राप्त हो गया। इस्लामी समाज की रचना के लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के दृष्टिगत मानक, तीन सिद्धान्तों पर आधारित थे। मस्जिद का निर्माण, पलायन कर्ताओं और सहायकों के मध्य वंधुत्व प्रतिज्ञा और मुस्लिम व गैर मुस्लिम के मध्य सहयोग का समझौता कराना। वास्तव में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने अज्ञानता व क़बाइली भावनाओं से प्रेरित संबंधों और परिस्थितियों का अंत कर दिया जो अरबों के लिए अतीत का अभिशाप थीं। इस्लामी समाज की रचना की दिशा में जिसे उम्मत कहा गया , पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के प्रयास इस बात का कारण बनें कि उसके बाद से धर्म, लोगों के मध्य संपर्क व संबंध का मुख्य साधन बने। इस प्रकार से अरबों को अज्ञानता काल और क़बाइली पंरपराओं से जोड़े रखने वाले जातीय व सांप्रदायिक बंधन, टूट गये जिससे मदीना के मुसलमान, इस्लाम धर्म के प्रचार व प्रसार के योग्य हो गये।

    असंख्य साक्षों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि पलायन के आरंभिक दिनों में इस्लाम की सभ्यता की रचना की विशेषताएं स्पष्ट हो गयीं। मुसलमानों के राजनीतिक समाज का गठन, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के मदीना पलायन के बाद आरंभ हुआ और जिन चीज़ों का उन्होंने अपने अनुयाइयों को वचन दिया था वह सब एक एक करके व्यवहारिक हुईं। मुस्लिम और गैर मुस्लिमों के मध्य सहयोग का समझौता, मदीना नगर में इस्लामी संविधान के मूल अनुच्छेदों में से एक था। क्योंकि इस समझौते से न केवल यह कि लोगों की सामाजिक स्थिति बेहतर हुई बल्कि इसमें यहूदियों के सामाजिक अधिकारों पर भी ध्यान दिया गया था। मुसलमान, इस क़ानून के बल पर अपेक्षाकृत निर्धारित राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक सिद्धान्तों के स्वामी बने। इस प्रकार इस्लाम और सामाजिक न्याय के आधार पर जनता की इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए एक सरकार का गठन हुआ। प्रत्येक दशा में पलायन, उन विचारों को व्यवहारिक बनाने की प्रक्रिया का आरंभ था जो इस्लाम ने मानव समाज के सामने प्रस्तुत किये थे। मक्का में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम एक आम नागरिक समझे जाते थे किंतु मदीना में उन्होंने प्रथम इस्लामी सरकार का दायित्व संभाला और उनकी स्थिति बदल गयी।

    मदीना के इस्लामी समाज की एक विशेषता, एक नयी सरकार के गठन के लिए आवश्यक परिस्थितियों और तत्वों की उपलब्धता थी। यह सरकार, अपना साम्राज्य, भूमि, जनसंख्या, सत्ता और व्यवस्था रखती थी। मदीना की इस्लामी सरकार की एक अन्य विशेषता जो अत्याधिक महत्व रखती थी, कानून का पालन थी। कानून का राज अर्थात समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए समान क़ानून का होना कि जिसमें किसी भी प्रकार का अन्याय या भेदभाव न पाया जाता हो। इस प्रकार से कानून के राज का उस समय तक इतिहास में उदाहरण नहीं मिलता। कानून की यह सत्ता, सभी युगों के लिए आदर्श बनी जैसा कि इतिहास में आया हैः हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपनी सत्ताकाल में एक एसे न्यायधीश से एक यहूदी की शिकायत की जिसे उन्होंने स्वंय ही इस पद पर नियुक्त किया था और कहा कि उस यहूदी ने उनका कवच ज़बरदस्ती ले लिया है। न्यायधीश ने दोनों पक्षों को अदालत में आने का आदेश दिया और शिकायत करने वाले अर्थात हज़रत अली अलैहिस्सलाम से जो उस समय के ख़लीफा के पद पर भी आसीन थे, पूछा कि क्या आप के पास अपने दावे के लिए कोई प्रमाण भी है ? इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा नहीं। तो न्यायधीश ने कहा कि आप के दावे को सिद्ध करने के लिए प्रमाण पर्याप्त नहीं है इस लिए आप का मुकद्दमा खारिज किया जाता है। न्यायधीश के इन शब्दों के साथ ही मुक़द्दमे की कार्यवाही समाप्त हो गयी और सब लोग अदालत से बाहर निकल आए। यहूदी इस न्याय से अत्याधिक प्रभावित हुआ और न्यायधीश के पास जाकर कहने लगा कि अली सच कह रहे थे और उसने उनका कवच उन्हें लौटा दिया। इस्लामी न्याय का यह एक एसा उदाहरण है जिसकी आधारशिला इस्लामी सरकार के गठन के समय और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के काल में रखी गयी थी।

    मदीना नगर में राजनीतिक व्यवस्था की रचना में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम का एक अन्य क़दम एक एसे दस्तावेज़ का संकलन है जो, मदीना के आम समझौते, मदीना व्यवस्थापत्र या मदीना के संविधान के नाम से जाना जाता है। इस दस्तावेज़ का उद्देश्य, इस्लामी नियमों के आधार पर नयी व्यवस्था को रेखांकित करना और मदीना नगर के लिए सामाजिक व्यवस्था का परिचय था। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने इस प्रकार से पलायन कर्ताओं और सहायकों जैसे इस्लामी समाज के सदस्यों और इसी प्रकार यहूदियों के विभिन्न क़बीलों के मध्य एक संबंधों को सुव्यवस्थित किया। पलायनकर्ता वास्तव में वह मुसलमान थे जो घर परिवार, क़बीले और धन संपत्ति जैसी अपनी हर चीज़ मक्का में छोड़ कर मदीना आ गये थे। उनके पास जीवन के आवश्यक साधनो के बिना किंतु ईमान के साथ पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के साथ मदीना नगर में अन्सार अर्थात मदीना के मूल वासियों के पास पहुंचे थे। अन्सार या सहायक भी एसे लोग थे जिन्हों ने त्याग व बलिदान का प्रदर्शन करते हुए अपना धन और प्राण, पलायनकर्ताओं के सामने पेश करते हुए उन्हें स्वीकार किया और आक्रमणकारियों के मुकाबले में उन्हें सुरक्षा प्रदान की। स्थानीय नागरिकों, विदेशियों और अन्य मतों से संबंध रखने वालों पर आधारित एक नगर का निर्माण और मज़बूत सामाजिक व्यवस्था की स्थापना वह भी इतनी अल्पावधि में उस समय तक इतिहास में अभूतपूर्व था।

    अधिक मज़बूत समाज की रचना और मदीना में मैत्रीपूर्ण वातावरण बनाने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम अधिक का अगला क़दम, आस्थावानों के मध्य वंधुत्व की प्रतिज्ञा कराना था। वास्तव में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने वंधुत्व की इस प्रतिज्ञा को, अज्ञानता और जातीय भावनाओं से प्रेरित संबंधों के विकल्प के रूप में पेश किया था जिसका उद्देश्य, क़बाइली पंरपराओं का अंत, ईमान व धर्म व ईश्वर पर आस्था जैसे सिद्धान्तों के आधार पर मानवीय संबंधों को सुदृढ़ता प्रदान करना था ताकि इस प्रकार से इस्लामी समाज में एकता मज़बूत होसके।