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    इस्लामी संस्कृति व इतिहास-8

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    इस्लाम के उदय के काल में इस्लाम की नवआधार सरकार की रक्षा, इस्लामी क्षेत्रों के विस्तार और शत्रुओं को दूर करने पर मुसलमानों का ध्यान मुख्य रूप से था। मुसलमानों ने पवित्र क़ुरआन की शिक्षाओं और आदेशों पर बहुत अधिक ध्यान दिया। इसके अतिरिक्त अरबी व्याकरण, इस्लामी विजय के इतिहास और फ़ेक़्ह अर्थात धर्म शास्त्र जैसे ज्ञान पर भी मुसलमानों की पैनी दृष्टि थी। धीरे धीरे इस्लामी विजय का क्रम रूक गया और इस्लामी सरकार के आधार सुदृढ़ हो गये। इस्लामी ज्ञान संक्लित करने के लिए मुसलमानों को अपेक्षाकृत अवसर मिल गया। कुछ अब्बासी ख़लीफ़ाओं की प्रेरित करने वाली नीतियों और राजकोष से भारी मात्रा में लाभ उठाने से मुसलमान समाज का ध्यान धीरे धीरे उन विज्ञान और उद्योग की ओर आकृष्ट होने लगा जो अधिकतर ग़ैर मुसलमानों के पास थे। इसीलिए मुसलमानों के जीवन में विस्तार और उनकी जीवन शैली में सुधार हुआ।

    मुसलमान ईश्वरीय धर्म इस्लाम और पवित्र क़ुरआने मजीद की शिक्षा की अनुकंपाओं की छत्रछाया में वैचारिक दृष्टि से पूरिपूर्णता की चरम सीमा पर थे और मुसलमान दूसरे राष्ट्रों और सभ्यताओं के विचारों और ज्ञानों को प्राप्त करने में व्याकुल थे। प्रसिद्ध मुसलमान इतिहासकार इब्ने ख़लदून का यह मानना है कि मुसलमानों की इस व्याकुलता का मुख्य श्रोत, क़ुरआने मजीद की बहुत सी आयतें और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के कथन हैं जिन्होंने लोगों को ज्ञान और कला की प्राप्ति की ओर प्रेरित व उत्साहित किया है। इस प्रकार से दूसरे राष्ट्रों की तकनीक और कला की प्राप्ति के लिए उठाया जाने वाला पहला क़दम उन दूसरी सभ्यताओं की रचनाओं का अनुवाद था जो उस काल में सर्वोच्च वैज्ञानिक और वैचारिक प्रगति से संपन्न थीं। बहुत थोड़े से ही समय में इस्लामी जगत में ज्ञान प्रेमियों और वैज्ञानिकों की गतविधियां और रूचियां इतनी बढ़ीं कि बाद में उसको अनुवाद अभियान के काल के नाम से याद किया गया।

    अनुवाद अभियान काल से संबंधित महत्त्वपूर्ण रचनाओं में प्रसिद्ध लेखक इब्ने नदीम की पुस्तक अलफ़ेहरिस्त की ओर संकेत किया जा सकता है। यह पुस्तक पूर्वजों के ज्ञानों के कुछ भागों का दर्पण है और चार शताब्दी हिजरी तक के इस्लामी जगत के ज्ञान अभियान इसमें देखें जा सकते हैं। तब से अब तक राष्ट्रों के रीति रीवाज के इतिहास के बारे में बहुत ही कम पुस्तकें लिखी गयी हैं जिसके लिखने में इस पुस्तक से लाभ न उठाया गया हो। इब्ने क़फ़्ती की रचना तबक़ातुल अतिब्बा और अख़बारूल ओलमा भी इस्लामी सभ्यता के इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोतों में से एक है। इन रचनाओं में इस्लामी संस्कृति और सभ्यता और इसके उतार चढ़ाव के बारे में किए जाने वाले शोधों के बारे लिखी जाने वाली बातें बारम्बार विशेषज्ञों द्वारा चर्चाओं का विषय रहीं हैं और विशेषज्ञों ने इनमें वर्णित बातों से बहुत अधिक लाभ उठाया है। बनी उमइइया के काल में यूनानी और सीरीयक भाषाओं में लिखी गयी चीज़ों का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ। इन स्रोतों में से एक मासरजोए की रचना कुन्नाश नामक चिकित्सा पुस्तक का अनुवाद है जो पहले अमवी शासक मरवान के काल में हुआ किन्तु बनी उमइइया के काल में अनुवाद होने वाली चीज़ों में अधिकतर प्रशासनिक, न्यायिक, राजनैतिक और वाणिज्य दस्तावेज़ थे जिनका अनुवाद शासकों और ग़ैर अरब नागरिकों को आपस में जोड़ने के लिए किया गया था।

    अपने व्यापक अर्थों के साथ अनुवाद अभियान ने एतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रचनाओं पर गहरा प्रभाव डाला है और ये अभियान अब्बासी ख़लीफ़ाओं के सत्ता में पहुंचने से आरंभ हुआ। ज्ञान का ये अभियान दो शताब्दी से अधिक तक चला। दूसरे अब्बासी ख़लीफ़ा मन्सूर दवानिक़ी ने विदेशी ज्ञान के अनुवाद के क्षेत्र में बहुत अधिक कार्य किए। उनके काल में अनुवाद को बहुत ख्याति प्राप्त हुई। इसीलिए कुछ इतिहासकारों ने मन्सूर दवानिक़ी को अनुवाद अभियान का संस्थापक और प्रचलित करने वाला बताया है। मन्सूर दवानिक़ी ने बग़दाद को अपनी राजधानी बनाया। उसने खगोल शास्त्रियों को अपने दरबार में निमंत्रित किया और दूसरे अधिकारियों ने भी इस कार्य में उसका अनुसरण किया। वह आम तौर पर खगोल शास्त्रियों से परामर्श किए बिना कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं करता था। उस समय खगोल शास्त्र के बारे में ईरानियों की दक्षता इतनी थी कि मन्सूर ने ईरानी खगोल शास्त्रियों के एक गुट को अपने दरबार में बुलाया। अलबत्ता पवित्र क़ुरआन की आयतों के ही कारण खगोल शास्त्र विशेष स्थान पाने में सफल हुआ और इस क्षेत्र में मुसलमानों की रूचि बढ़ी। पवित्र क़ुरआन आकाश, धरती, सूर्य, चंद्रमा और सितारों के बारे में चिंतन मनन और शोध करने के लिए लोगों को प्रेरित करता है। नमाज़, रोज़े, हज, क़िबले की दिशा की सही पहचान और वर्जित किए गये महीनों में युद्ध को वर्जित घोषित करने जैसी बहुत सी धार्मिक ज़िम्मेदारियों में सूर्य और चंद्रमा की विभिन्न स्थितियों की सही पहचान की महत्त्वपूर्ण भूमिका के होने के नाते मुसलमानों ने खगोल शास्त्र के क्षेत्र में क़दम रखा है।

    अनुवाद काल में सबसे प्रसिद्ध खगोल शास्त्री परिवार नौबख़्त परिवार था जिन्होंने कुछ ही दिन पूर्व इस्लाम धर्म स्वीकार किया था और उसके कुछ ही दिन बाद शीया मुसलमानों की आस्थाओं को दिल की गहराईयों से मानने लगे। ये ईरानी परिवार वर्षों तक अब्बासी ख़लीफ़ाओं के दरबार में रहा और इन्हीं में से बहुत से मंत्री, वाद शास्त्री, अनुवादक और खगोलशास्त्री सामने आए। अब्बासी ख़लीफ़ाओं के अनुरोध पर इस परिवार के कुछ मुखियाओं विशेषकर नौबख़्त और उनके पुत्र अबू सहल ने सितारों की गतिविधियों के बारे में लिखी गयी पुस्तकों का अनुवाद किया। अलबत्ता उन्होंने अनुवाद की गयी पुस्तकों के माध्यम से इस संदर्भ में अपना दृष्टिकोण भी बयान किया। एक अन्य खगोल शास्त्री जो उस काल में प्रसिद्ध अनुवादक समझे जाते थे, शीया बुद्धिजीवी मुहम्मद इबने इब्राहीम फ़ज़ारी थे। उनके पिता इब्राहीम वह पहले मुसलमान थे जिन्होंने एस्ट्रोलेब का निर्माण किया। उनकी एक अन्य रचना “विशाल सिंध हिंद” नामक पुस्तक थी जो अब्बासी ख़लीफ़ा मामून के काल तक खगोल शास्त्र की सूचना का मान्यता प्राप्त स्रोत समझी जाती थी। ये पुस्तक गणित की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी पुस्तक ने मुसलमानों को भारतीय अंकों से अवगत कराया था।

    मन्सूर के दरबार में चिकित्सा के क्षेत्र में लिखी जाने वाली पुस्तकों का भी अनुवाद किया गया। मन्सूर अपनी आयु के अंतिम समय में अमाशय की बीमारी में ग्रस्त हो गया। दरबारी वैद्य उसका उपचार न कर सके। अंततः मन्सूर ने जुन्दी शापुर में स्थित अपनी समय की सबसे बड़ी वैद्यशाला के प्रमुख जिरजीस नामक चिकित्सक को जो नस्तूरी ईसाई धर्म का अनुयायी था, अपने उपचार के लिए दरबार में बुलाया। जिरजीस ने जिसने चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत सी पुस्तकें लिखीं थी, वैद्यशाला अपने पुत्र बख़्तीयूश के हवाले की और स्वयं दरबार की ओर निकल पड़ा। थोड़े ही समय में जिरजीस की कला, दक्षता, प्रतिष्ठा और रोब व दबदबे ने मन्सूर को मत्रमुग्ध कर लिया। मन्सूर ने जिरजीस को अपने महल में विशेष स्थान प्रदान किया और जुन्दी शाहपुर वापस जाने से रोक दिया। इस दौरान जिरजीस ने जिन्हें पुस्तकें लिखने में बहुत अधिक रूचि थी और जो सीरियक, अरबी, पहलवी और यूनानी भाषाओं में दक्ष थे, यूनानी और सीरियक भाषाओं की चिकित्सा पुस्तक के कुछ भाग का अरबी में अनुवाद किया।

    विदेशी पुस्तकों के अनुवाद के संदर्भ अब्बासी शासक मन्सूर के काल में होने वाली अन्य गतिविधियों में कुछ साहित्यिक पुस्तकों का अरबी अनुवाद था। इन पुस्तकों में कलीले व दिमनेह की ओर संकेत किया जा सकता है जिसका अनुवाद ईरानी लेखक इब्ने मुक़फ़्फ़ह ने किया है। रूज़ूबेह के नाम से प्रसिद्ध अब्दुल्लाह इब्ने मुक़फ़्फ़ह दूसरी शताब्दी हिजरी के आरंभिक पचास वर्षों में ईरान के प्रसिद्ध बुद्धजीवियों में से थे। उनका जन्म एक ईरानी परिवार में फ़ार्स के एक क्षेत्र में जिसे बाद में फ़िरोज़ाबाद का नाम दिया गया, हुआ था। इब्ने मुक़फ़्फ़ह पहलवी भाषा और इस भाषा का अरबी अनुवाद करने में बहुत दक्ष और निपुण थे। इब्ने क़िफ़्ती इब्ने मुक़फ़्फ़ह के बारे में कहते हैं कि वे ही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मुसलमान राष्ट्रों के मध्य तर्क शास्त्र के अनुवाद का बेड़ा उठाया। इब्ने मुक़फ़्फ़ह इस बात से भलिभांति अवगत थे कि एक जाति का मिटना, उसका राजनैतिक और सैनिक पराजय पर निर्भर है बल्कि एक राष्ट्र का मिटना, उस राष्ट्र की प्राचीन यादों, रीतिरिवाजों, नैतिकता, इतिहास और राष्ट्रीय साहित्य के मिटने के अर्थ में है। उनके बारे में कहा गया कि उन्होंने पहलवी रचनाओं का अरबी में अनुवाद करके एक ओर इस राष्ट्रीय रचना को मिटने से बचाया और दूसरी ओर ग़ैर अरब मुसलमानों को ईरान की प्राचीन सुशीलता और भव्यता से अवगत कराया।

    अब्बासी शासन काल में वाद शास्त्र की चर्चाओं को सुदृढ़ करने और आवश्यकता के अनुसार, वाद शास्त्र की पुस्तकों के अनुवाद का भी आदेश दिया गया था। अरस्तू की पुस्तक तूबीक़ा का अरबी अनुवाद मन्सूर अब्बासी के पुत्र मेहदी के काल में हुआ। इस पुस्तक का सीरीयक,यूनानी और अरबी भाषाओं सहित कई भाषाओं में कई बार अनुवद किया गया है। तूबीक़ा नामक पुस्तक शास्त्रार्थ की शैली सिखाती है और विभिन्न दृष्टिकोणों से दो लोगों के मध्य प्रश्न प्रस्तुत करने और उत्तर देने का तरीक़ा सिखाती है। उल्लेखनीय है कि अब्बासी शासक मेंहदी के सत्ता में पहुंचने के समय उसके पिता के काल में आरंभ होने वाली धर्मिक चर्चाएं अपनी चरम सीमा पर थीं। ईसाई और यहूदी धर्म के लोगों का धार्मिक चर्चाओं में बहुत अधिक अनुभव था। इसके अतिरिक्त मेहदी के काल में मानवी संप्रदाय के प्रकट होने और तेज़ी से फैलने के कारण, अब्बासी शासकों की ओर से वाद शास्त्र की चर्चाओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता का अधिक आभास किया जाने लगा। इसीलिए इस तरह की पुस्तकों का अनुवाद इस प्रकार की आवश्यकताओं के दृष्टिगत किया गया।