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    इस्लामी संस्कृति व इतिहास-१३

    इस्लामी संस्कृति व इतिहास-१३
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    ईरानी चिकित्सकों में सय्यद इस्माईल जुर्जानी को विशेष ख्याति प्राप्त रही है। इस्माईल बिन हुसैन मोहम्मद जुर्जानी जो सय्यद इस्माईल जुर्जानी के नाम से प्रसिद्ध थे, गुर्गान नामक क्षेत्र में पैदा हुए। उन्होंने ख़ारज़्म की यात्रा की थी और वर्ष 531 हिजरी क़मरी में मर्व में उनका देहान्त हुआ। सय्यद इस्माईल जुर्जानी को ईरानी चिकित्सा में नए विचारों का जनक समझा जाता है ,,, उनसे पहले फ़ारसी भाषा में चिकित्सा की किताबें बहुत कम थीं। दूसरे शब्दों में जुर्जानी की रचनाएं फ़ारसी भाषा में चिकित्सा की किताबें लिखे जाने में मील का पत्थर समझी जाती हैं। जुर्जानी की किताबों में ज़ख़ीरए ख़ारिज़्मशाही को विशेष महत्व प्राप्त है। यह किताब, फ़ारसी भाषा में चिकित्सा की सबसे बड़ी किताबों में समझी जाती है। ज़ख़ीरए ख़ारज़्मशाही चिकित्सा विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का विश्वकोष है। इस किताब में रोगों की पहचान और उसकी दवा, औषधि की पहचान और रोगों के उपचार के आधारभूत क्षेत्र शामिल हैं। इसके अतिरिक्त इस किताब में शरीर के स्वास्थय और खाने के शिष्टाचार का उल्लेख और ख़ून निकालने, दांतों की देखरेख सहित चिकित्स से विशेष विषयों की व्याख्या की गयी है। ज़ख़ीरए ख़ारिज़्मशाही दस जिल्दों पर आधारित किताब है और जिस समय इस किताब की रचना की गयी उसी समय इस किताब को बहुत मूल्यवान स्रोत के रूप में ख्याति प्राप्त हो गयी थी। ज़ख़ीरए ख़ारज़्मशाही का फ़ारसी से हिब्रू भाषा में भी अनुवाद हो चुका है। जुर्जानी ने दर्शनशास्त्र, तर्कशास्त्र और चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में फ़ारसी और अरबी भाषाओं में किताबें लिखी हैं। उन्हें ईरान के सबसे परिश्रमी चिकित्सकों की श्रेणी में गिना जाता है। ज़ख़ीरए ख़ारज़्मशाही की वैज्ञानिक व्यापकता की दृष्टि से इब्ने सीना की क़ानून नामक किताब से तुलना की जा सकती है। इस किताब से ईरान में तत्कालीन शोधकर्ताओं ने बहुत लाभ उठाया है। जुर्जानी की इस बड़ी किताब के कई भाग अब तक कई बार प्रकाशित हो चुके हैं और अनेक थिसेस के विषय व स्रोत के रूप में इससे लाभ उठाया जा चुका है। जुर्जानी क़ुतुबुद्दीन मोहम्मद ख़ारज़्मशाह के दरबार के चिकित्सक थे और नगर का दवाख़ाना भी उन्हीं की देखरेख में रहता था। दमिश्क़ के विख्यात चिकित्सक इब्ने अली उसैबा के अनुसार जुर्जानी बहुत बड़े चिकित्सक, बहुप्रतिभाशाली व बहुत बड़े विद्वान थे और ख़ारिज़्म के दवाख़ाने के प्रमुख थे। उस समय ख़ारज़्म का दवाख़ाना आय का बहुत बड़ा स्रोत था। इतनी व्यस्तता के बावजूद जुर्जानी किताब लिखने के लिए समय निकाल लेते थे। इस बारे में स्वंय जुर्जानी ने कहा है कि दवाख़ाने में व्यस्तता उनका सारा समय लिये ले रही है और यह व्यस्तता दस जिल्दों वाली उनकी अंतिम किताब के लिखने में रुकावट बन रही है क्योंकि उन्हें दिखाने आने वाले रोगियों की संख्या बहुत अधिक है। इस काम के कारण उनके पास सोच विचार के लिए उचित समय नहीं बचता था। इसके बावजूद जुर्जानी ने दवाओं की पहचान व उनके निर्माण से संबंधित अपना विश्वकोष पूरा किया। उन्होंने वर्ष 506 हिजरी क़मरी में इस विश्वकोष का संक्षिप्त रूप ख़ारिज़्म के युवराज को पेश किया। जुर्जानी ख़ारज़्म के युवराज के विशेष चिकित्सक थे। जुर्जानी की एक और विख्यात किताब का नाम यादगार है जिसमें चिकित्सा विज्ञान व दवा निर्माण के एक काल का उल्लेख है। इस्लामी संस्कृति व सभ्यता के इतिहास में सीमा व जाति का कोई स्थान नहीं है। जैसा कि हम देखते हैं कि इस्लामी जगत के सुदूर क्षेत्रों के मुसलमान वैज्ञानिकों ने इस्लामी जगत की मूल्यवान सेवाएं की हैं। सीरिया और मिस्र में भी बहुत से वैज्ञानिकों ने चिकित्सा के क्षेत्र में इस्लामी जगत की सेवा की है। उन्हीं में से एक इब्ने नफ़ीस भी हैं जो अलक़रशी के नाम से विख्यात हैं। वे चिकित्सा के क्षेत्र में एक सफल लेखक भी हैं। इब्ने नफ़ीस दमिश्क़ के निकट पैदा हुए और दमिश्क़ के मुख्य अस्पताल में चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा प्राप्त की। कुछ समय पश्चात वे मिस्र चले गए और वहां एक अस्पताल में रोगियों का उपचार करते और छात्रों को शिक्षा देते थे। चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत अनुभव के कारण वे महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हुए। इन पदों के कारण उन्हें चिकित्सकों के मामलों के समाधान से संबंधित बहुत अधिकार प्राप्त थे। उन्होंने अश्शामिल फ़िस्सनाअतित तबीइया नामक चिकित्सा विज्ञान का विश्वकोष लिखना आरंभ किया। वह इसे तीन सौ से अधिक जिल्दों पर आधारित लिखना चाह रहे थे किन्तु वे केवल अस्सी जिल्दें ही पूरी कर सके। इस महारचना की कुछ जिल्दें हस्लिपि में अभी भी मौजूद हैं और उनमें से एक स्वंय उनके हाथों से लिखी हुयी है। इब्ने नफ़ीस ने वैज्ञानिकों की किताबों पर व्याख्याएं लिखी हैं।उन्होंने नेत्र विज्ञान व हुनैन इब्ने इस्हाक़ की किताब अलमसाएल फ़ित्तिब के बारे में भी व्याख्याएं लिखी हैं। इब्ने सीना की क़ानून किताब का अलमूजज़ नामक लघु संस्करण इब्ने नफ़ीस ने लिखा था जिसे बहुत अधिक लोगों ने पढ़ा है। उन्होंने पूरी क़ानून किताब की व्याख्या भी लिखी है जो बहुत ही विश्वस्नीय है। इसके बाद इब्ने नफ़ीस ने मनुष्य के शरीर की रचना के बारे में एक अलग विस्तृत किताब लिखी है। आज भी इस किताब की कई प्रतियां मौजूद हैं। उन्होंने इस किताब में फेफड़ों में ख़ून के प्रवाह का उल्लेख किया है जिसका योरोपियों ने लगभग तीन शताब्दियों के पश्चात पता लगाया। बाद में वैज्ञानिक इब्ने नफ़ीस की इस महत्वपूर्ण खोज से परिचित हुए। उन्होंने अपनी इस बेबाक खोज में लिखा है कि जालीनूस का यह विचार पूर्णतः ग़लत है कि ख़ून हृदय के एक ओर से दूसरी ओर जाता है। इब्ने नफ़ीस का मानना था कि ख़ून ह्रदय के VENTRICLE के सीधी वाले भाग से शिरा के मार्ग से फेफड़ों में जाता है और वहां ऑक्सिजन से मिल कर दूसरी शिरा से पेट के उलटे वाले भाग में जाता है और फिर वहां से पूरे शरीर में प्रवाहित होता है। इब्ने नफ़ीस ने इसकी खोज शरीर रचना के संबंध में किए गए शोध की सहायता से की। उन्होंने इस तथ्य का भी उल्लेख किया है कि VENTRICLE के बायें भाग सीधे भाग से बड़ा है। इब्ने नफ़ीस ने अपना यह दृष्टिकोण इतालवी चिकित्सक मीग्वेल स्रोतो से तीन सौ वर्ष पूर्व विस्तृत रूप में पेश किया था। इब्ने नफ़ीस की यह खोज चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में बहुत बड़ी घटना मानी जाती है। जालीनूस के चिकित्सा दृष्टकोणों का इब्ने नफ़ीस, फ़ाराबी, इब्ने सीना सहित कुछ दूसरे मुसलमान चिकित्सकों की ओर से नकारा जाना यह दर्शाता है कि मुसलमान वैज्ञानिक जालीनूस के चिकित्सा मॉडल से हट कर एक अलग चिकित्सा मॉडल के लिए गंभीर रूप से प्रयासरत थे। एक विचारक व अनुभवी चिकित्सक के रूप में इब्ने नफ़ीस ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में बहुत बड़ी खोज की है। इसलिए पिछली शताब्दियों में मुसलमान लेखक उन्हें चिकित्सकों के मार्गदर्शक, और चिकित्सा विज्ञान के समकालीन शोधकर्ताओं के बीच अरब के जालीनूस के नाम से मानते थे। इब्ने नफ़ीस ने अपनी आयु का बड़ा भाग क़ाहेरा में बिताया और अंततः वर्ष 687 हिजरी क़मरी में इसी नगर में उनका देहान्त हुआ। उन्होंने अपने देहान्त से पूर्व अपना घर व पुस्तकालय क़ाहेरा के मंसूरी अस्पताल को दान कर दिया।
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