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    इस्लामी संस्कृति व इतिहास-१४

    इस्लामी संस्कृति व इतिहास-१४
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    हमने बताया था कि मुसलमान वैद्यों और वैज्ञानिकों ने, इस्लामी सभ्यता व संस्कृति के विकास में प्रभावशाली भूमिका निभाई है। इन हकीमों और चिकित्सक में एक महत्वपूर्ण नाम ज़करिया बिन राज़ी का था। आज के कार्यक्रम में हम ज़करिया बिन राज़ी और उनकी रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। प्रसिद्ध ईरानी चिकित्सक अबूबक्र मुहम्मद बिन ज़करिया राज़ी , जिनका लेटिन नाम Rhazes या Rasis है वर्ष २५१ हिजरी क़मरी में वर्तमान तेहरान के दक्षिण में स्थित शहरे रैय में जन्में। उनके जन्म के समय रैय एक समृद्ध क्षेत्र और इस्लामी ज्ञान विज्ञान का केन्द्र था। राज़ी, ने रैय नगर में गणित, खगोल शास्त्र, साहित्य और चिकित्सा की शिक्षा लेनी आरंभ की। उन्होंने चिकित्सा के साथ ही, रसायन शास्त्र, भौतिक शास्त्र और दर्शनशास्त्र में भी अत्यन्त मूल्यवान शोध किये। उसैबअह ने अपनी प्रसिद्ध किताब उयूनुल अंबिया में लिखा है कि राज़ी जब बग़दाद आए तो उनकी आयु तीस वर्ष से कुछ अधिक रही होगी। वे बचपन से ही ज्ञान प्रेमी थे और तर्क व दर्शनशास्त्र तथा साहित्य से उन्हें लगाव था। चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा उन्होंने किशोरावस्था में आरंभ की। उन्होंने चिकित्सा व उपचार की शिक्षा अली बिन ज़ैन तबरी से ली।
    राज़ी ने बग़दाद से रैय नगर वापसी के बाद इस नगर के एक अस्पताल की ज़िम्मेदारी संभाली जहां वे चिकित्सा के साथ साथ इस ज्ञान में रूचि रखने वालों को चिकित्सा की शिक्षा भी देते थे। चिकित्सकों की जीवनी पर लिखी गयी प्रसिद्ध किताब तारीखुल हुकमा में कहा गया है कि राज़ी, एक मुसलमान बुद्धिजीवी और अस्पताल के चिकिस्तक थे जिन्हों ने पहले रैय नगर का अस्पताल संभाला और फिर बग़दाद के अस्पताल के प्रमुख बने।
    राज़ी जिन्हें कुछ लोगों ने इस्लामी जालीनूस का नाम भी दिया है, ईरान के विश्व विख्यात चिकित्सक व वैज्ञानिक, इब्ने सीना के बाद इस्लामी सभ्यता के विकास के काल के सब से बड़े चिकित्सक हैं। उन्हें अपने शिष्यों और रोगियों से अत्याधिक लगाव था और वे सदैव ही पढ़ने लिखने में व्यस्त रहते यहां तक कि उनकी आँखों से दिखायी देना बंद हो गया। राज़ी के अनुसंधान, विशेषकर चिकित्सा के क्षेत्र में किए गए शोध वास्तव में उनके अपने अध्ययन व अनुभवों का निचोड़ थे। इतिहास में कहा गया है कि जब अज़ुद्दौलह दैलमी ने बग़दाद में एक अस्पताल बनाने का इरादा किया तो उसने प्रसिद्ध चिकित्सक राज़ी को आदेश दिया कि वे इस अस्पताल के लिए कोई उचित स्थान की ढूंढें। प्रयोग में विश्वास रखने वाले राज़ी ने अपने सहयोगियों की सहायता से मांस के टुकड़े नगर के कई क्षेत्रों में लटका दिये। चौबीस घंटे बाद उन्होंने उन सारे टुकड़ों को अपने पास मंगवाया और उन सब को परखा और फिर कहा कि जिस क्षेत्र का मांस सड़ने से अधिक सुरक्षित रहा है वहीं पर अस्पताल बनाया जाए।
    राज़ी एक खोजी चिकित्सक थे और बिना प्रयोग व अध्ययन के वे अपने पहले के चिकित्सकों की जानकारियों पर विश्वास नहीं करते थे। उन्होंने एक पुस्तिका भी लिखी है जिसका शीर्षक है अश्शोकूक अला जालीनूस और इसमें उन्होंने जालीनूस की चिकित्सा शैलियों पर टिप्पणी की है। जालीनूस के विचारों पर राज़ी की सब से अधिक महत्वपूर्ण टिप्पणी देखने, सुनने और प्रकाश की तरंगों के बारे में है। राज़ी, जालीनूस के विपरीत देखने की प्रक्रिया को उन तरंगों पर निर्भर मानते थे जो आंखों तक पहुंचती हैं न कि वह तरंगें जो आंखों से निकलती हैं।
    ज़करिया राज़ी ने चिकित्सा, औषधि, दर्शनशास्त्र, भौतिकशास्त्र और खगोलशास्त्र जैसे विभिन्न विषयों पर दो सौ से अधिक पुस्तिकाएं और पुस्तकें लिखी हैं । इन सभी में से लगभग सौ किताबें केवल चिकित्साविज्ञान से संबंधित हैं। अलहावी नामक चिकित्सा ज्ञानकोष और अलमन्सूरी नामक किताब उनके ऐसी दो कृतियां हैं जो चिकित्सा की मूल और सर्वाधिक विख्यात रचनाओं में समझी जाती हैं। अलहावी नामक अपनी किताब में राज़ी ने भर्ती होने वाले रोगियों के बारे में अपने अनुभवों का वर्णन किया है। यह किताब, चिकित्सा विज्ञान में लिखी गयी अत्याधिक व्यापक और महत्वपूर्ण चिकित्सा ज्ञान कोष है। इस समय भी इस किताब की मूल अरबी प्रति का लगभग आधा भाग सुरक्षित है। राज़ी ने अपनी किताब अलहावी को वैचारिक और प्रयोगिक जैसे दो भागों में बांटा है जो इस्लामी युग के मध्य काल में चिकित्सा पर लिखी जाने वाली अन्य रचनाओं के लिए एक आदर्श बनी।
    राज़ी की प्रसिद्ध किताब अलहावी बारह अध्यायों में है और हर अध्याय में चिकित्सा संबंधी विभिन्न विषयों पर चर्चा की गयी है। अलहावी में जिन विषयों पर चर्चा की गयी है उनमें से कुछ इस प्रकार हैं: स्वास्थ्य बचाव और उपचार, रोग, हड्डी टूटना और उपचार, मिश्रित औषधियां और उनके गुण तथा जड़ी बूटियां। अलहावी के उस भाग में जिसमें जड़ी बूटियों पर चर्चा की गयी है लगभग ७०० जड़ी बूटियों का वर्णन किया गया हैं। मुसलमान चिकित्सकों को विभिन्न रोगों और उनके उपचार से अवगत कराने में इस पुस्तक की बहुत बड़ी भूमिका रही है।
    चिकित्सा विज्ञान में राज़ी की अन्य महत्वपूर्ण रचना, अलमन्सूरी है। यह चिकित्सा के विषय पर युरोप में छपने वाली पहली किताब है। अलमन्सूरी आम लोगों की जानकारी के लिए अपेक्षाकृत एक संक्षिप्त किताब है जिसे राज़ी ने सामनी शासन श्रंखला के युवराज और रैय शहर के शासक, अबू सालेह मंसूर बिन इस्हाक़ के लिए उपहार स्वरूप लिखा था। अलमंसूरी किताब दो दो भागों पर आधारित है तथा इसमें मानव शरीर की विशेषताओं, दवाओं के गुण, साफ सफाई व स्वास्थ्य, मरहम पट्टी तथा कीड़े मकोड़ों के विषों और विभिन्न रोगों पर चर्चा की गयी है। यह किताब लेटिन भाषा में प्रकाशित हो चुकी है इसके एक प्रकाशक का नाम जेरार्ड केर्मोनेयाई है जिनका जन्म वर्ष १११४ में और निधन ११८६ में हुआ था । इसका अनुवाद वर्ष १५१० में इटली में प्रकाशित हुआ।
    राज़ी ने चेचक और ख़सरे के विषय पर एक अन्य महत्वपूर्ण किताब लिखी है। अलजदरी वलहस्बा अर्थात चेचक और ख़सरा शीर्षय की यह किबात इस विषय पर लिखी जाने वाली सब से अधिक प्राचीन और महत्वपूर्ण किताब है। राज़ी वह पहले चिकित्सक हैं जिन्हों ने ख़सरे और चेचक के मध्य अंतर का पता लगाया और उन्हें दो अलग अलग रोगों के रूप में समझा । अलजदरी किताब ने पश्चिमवासियों को आश्चर्य चकित कर दिया और उन्होंने इस किताब को चिकित्सा की सर्वश्रेष्ठ प्राचीन किताबों में गिना है। मुसलमानों के मध्य चिकित्सा में प्रगति के संदर्भ में इस किताब को एक अति महत्वपूर्ण क़दम समझा जाता है। राज़ी ने अपनी इस किताब में चेचक और ख़सरे के रोगों का जिस प्रकार से वर्णन किया है और उनके उपचार की जो शैली लिखी है वह और वर्तमान अनुसंधानों से बहुत मिलती जुलती है। अपनी किताब चिकित्सा का इतिहास में नियोबर्गर (Neuberger) सहित चिकित्सा के इतिहास पर शोध करने वाले सभी अध्ययनकर्ताओं ने इसे इस्लामी संस्कृति द्वारा चिकित्सा विज्ञान की सब से बड़ी सेवा बताया है। नियोबर्गर इस संदर्भ में कहते हैं: सही बात तो यह है कि हर दृष्टि से यह किताब मुसलमानों की चिकित्सा विज्ञान पर लिखी गयी रचनाओं का सौन्दर्य है। वास्तव में अलजदरी वल्हस्बा नामक किताब राज़ी की अन्य सभी रचनाओं से अधिक चिकित्सकों और बुद्धिजीवियों के आकर्षण का केन्द्र बनी है। इस पुस्तक का लेटिन भाषा में अनुवाद, वर्ष १४९८ से १८६६ के मध्य लगभग चालीस बार प्रकाशित हो चुका है।
    राज़ी ने मूत्राशय और गुर्दे की पथरी के बारे में भी शोध किया है और उसके परिणाम को एक किताब में लिखा गया है जिसकी अरबी प्रतिलिपि का फ्रेंच सहित कई भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। यह पुस्तक वर्ष १८९६ में लंदन में प्रकाशित हुई। राज़ी की अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं में मन ला यहज़ोरोहुत्तबीब भी है। इस किताब को निर्धनों की चिकित्सा कहा जाता है और वास्तव में इसमें उन आम लोगों को विभिन्न रोगों के के उपचार की शैली बतायी गयी है जिनकी पहुंच चिकित्सकों तक नहीं होती।
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