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    इस्लामी संस्कृति व इतिहास-1

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    इस्लामी संस्कृति व सभ्यता, मानव इतिहास की सबसे समृद्ध सभ्यताओं में से एक है। यद्यपि इस संस्कृति में, जो इस्लाम के उदय के साथ अस्तित्व में आई, बहुत अधिक उतार-चढ़ाव आए हैं किंतु इसका अतीत अत्यंत उज्जवल है। इस्लामी सभ्यता के इतिहास की समीक्षा से पता चलता है कि यह संस्कृति व सभ्यता, एक तर्कसंगत आधार पर अस्तित्व में आई है। आप को इस संस्कृति व सभ्यता से अधिक अवगत कराने के लिए हम इस्लामी सभ्यता का इतिहास नामक एक नई श्रंखला लेकर उपस्थित हैं। इसमें हम आपको इस्लामी सभ्यता के परवान चढ़ने, इसके उतार-चढ़ाव भरे इतिहास और इसकी प्रगति के आधारों से अवगत कराएंगे।

    मानवता के लिए इस्लाम का उपहार वह महान एवं व्यापक संस्कृति व सभ्यता है जिसने सभी मनुष्यों विशेष कर मुसलमानों को सदा के लिए अपना ऋणी बना लिया है। आज इस्लामी संस्कृति व सभ्यता का परिचय, विभिन्न समाजों विशेश कर बुद्धिजीवी वर्ग के लिए एक महत्वपूर्ण एवं ध्यान योग्य मुद्दा है। मुसलमानों की भावी पीढ़ियों के लिए यह जानना आवश्यक है कि उनके पूर्वज संस्कृति व सभ्यता की दृष्टि से किस स्तर पर थे। यह ज्ञान उनके व्यक्तित्व के निर्माण या पुनर्निर्माण में बहुत अधिक प्रभावी है। साम्राज्य ने पिछली दो शताब्दियों के दौरान विभिन्न राष्ट्रों विशेष कर मुसलमानों की सभ्यता व संस्कृति की मौलिकता व उपयोगिता का इन्कार करने का प्रयास किया है ताकि इसके माध्यम से अपनी संस्कृति व सभ्यता को देशों पर थोप सके। पश्चिम का वास्तविक लक्ष्य यह है कि संसार तथा विभिन्न संस्कृतियों के भीतर इस विचार को सबल बना दे कि उनके पास पश्चिम के रंग में रंगने के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं है।

    इस्लामी सभ्यता के इन्कार और पूर्वी देशों पर पश्चिमी संस्कृति व मूल्यों को थोपने का एक लक्ष्य यह है कि पश्चिम वाले, एक ओर तो संसार के अन्य राष्ट्रों व सभ्यताओं की प्रगति को स्वयं से संबंधित कर सकें और दूसरी ओर मुसलमानों की तीव्र प्रगति एवं विकास को रोक सकें। ईरान के एक बुद्धिजीवी और विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डाक्टर शफ़ीई सेरविस्तानी का मानना है कि पश्चिम अपनी श्रेष्ठ तकनीक एवं आर्थिक शक्ति की सहायता से, कि जो स्वयं ही देशों के शोषण से प्राप्त हुई है, वर्षों से पूरे संसार में अपनी संस्कृति को फैलाने और सांस्कृतिक भूमंडलीकरण के प्रयास में है। पश्चिम ने इस बात का बहुत अधिक प्रयास किया है कि जिस प्रकार से भी संभव हो, अपने प्रतीकों और मूल्यों को पूर्वी समाजों पर थोप दे।

    चूंकि पश्चिम ने स्वयं को मानव सभ्यता का मूल स्थान दर्शाने और अपनी मान्यताएं अन्य क्षेत्रों पर थोपने के लिए व्यापक प्रयास किए हैं अतः इस्लामी संस्कृति व सभ्यता की महानता व उसके मूल आधारों का वर्णन अत्यंत आवश्यक है। अमरीका के एक विचारक और सभ्यताओं के बीच टकराव के दृष्टिकोण के जनक सेमुइल हेन्टिंग्टन इस संबंध में कहते हैं। “नवीनीकरण के विषय में पश्चिम ने न केवल विश्व को एक नए समाज की ओर बढ़ाया है बल्कि अन्य सभ्यताओं के लोग भी प्रगति करते करते पश्चिमवादी हो गए हैं। वे अपनी पारंपरिक मान्यताओं व संस्कारों को छोड़ कर उनके स्थान पर वैसे ही पश्चिमी प्रतीकों को अपना रहे हैं।

    इस समय पश्चिमी संसार इस्लामी सभ्यता की प्रगति व विकास को रोकने के लिए, सांस्कृतिक वर्चस्व के माध्यम से अन्य देशों पर अपना राजनैतिक वर्चस्व जमाने की चेष्टा में है। उल्लेखनीय है कि पश्चिम ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से संसार का नेतृत्व अपने हाथ में लेने के प्रयास आरंभ कर दिए थे किंतु चूंकि कुछ राष्ट्र अपनी मान्यताओं व राष्ट्रीय व धार्मिक संस्कृति की सुरक्षा पर बल देते हैं और सरलता से बाहरी वर्चस्व के समक्ष घुटने नहीं टेकते अतः वह सांस्कृतिक वर्चस्व के माध्यम से राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। पश्चिम का प्रयास है कि ग़ैर अरब विशेष कर इस्लामी देशों में अपनी संस्कृति को फैला कर धीरे-धीरे उनकी संस्कृति में मूल परिवर्तन कर दे ताकि उन पर उसके राजनैतिक वर्चस्व का मार्ग प्रशस्त हो जाए।

    अमरीका के एक शोधकर्ता व लेखक एडवर्ड बर्मन लिखते हैं कि पश्चिम, सामूहिक संचार माध्यमों व पत्र पत्रिकाओं और रॉक फ़ैलर, कारनेगी तथा फ़ोर्ड जैसी तथाकथित सांस्कृतिक संस्थाओं जैसे हथकंडों के माध्यम से विकासशील समाजों में विशेष ज्ञानों व विचारों का प्रसार करने का प्रयास कर रहा है। विचारों व संस्कृतियों को उत्पन्न करके उन्हें प्रचलित करना जिनके नियंत्रण में है वे प्रयास कर रहे हैं कि संसार और जीवन के प्रतिदिन के मामलों के संबंध में लोगों के सोचने की शैली को प्रभावित कर दें।

    इस्लामी संस्कृति व सभ्यता पर चर्चा के लिए उचित होगा कि इस सभ्यता को अस्तित्व में लाने वाले कारकों तथा पश्चिमी संस्कृति व सभ्यता से उसकी तुलना के बारे में कुछ बात की जाए। इस्लामी सभ्यता को अस्तित्व प्रदान करने वाले महत्वपूर्ण कारकों में से एक, उसमें पाई जाने वाली विभिन्न संस्कृतियां हैं। इतिहास हमें बताता है कि गतिशील व सक्रिय संस्कृतियां किसी भी स्थिति में समाप्त नहीं होतीं बल्कि सदैव अपने आपको सुरक्षित रखती हैं। उदाहरण स्वरूप यद्यपि इस्लामी संस्कृति व सभ्यता को अपने पूरे जीवनकाल में उतार-चढ़ाव और बाहरी लोगों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा है किंतु वह कभी भी उनसे पराजित व प्रभावित नहीं हुई है। इसके अतिरिक्त इस्लामी संस्कृति व सभ्यता, ईरानी, मिस्री व अरबी संस्कृतियों की भांति स्थानीय संस्कृतियों की रक्षा के कारण, विशेष सांस्कृतिक विविधता से संपन्न है जबकि पश्चिमी संस्कृति, अन्य संस्कृतियों व राष्ट्रियताओं को समाप्त करने और सभी संस्कृतियों को एकसमान बनाने के प्रयास में है। इस्लामी संस्कृति व सभ्यता में सभी संस्कृतियों व राष्ट्रियताओं को सुरक्षित रखा गया है और यह बात स्वयं इस्लामी सभ्यता के फलने-फूलने का एक कारण है।

    अमरीकी इतिहासकार वेल डोरेन्ट सभ्यता और सभ्य समाज के बारे में कहते हैं कि सभ्यता, सामाजिक अनुशासन, क़ानून की सरकार तथा अपेक्षाकृत उचित स्थिति के परिणाम स्वरूप अस्तित्व में आने वाली सांस्कृतिक रचनात्मकता को कहते हैं। सभ्यता, ज्ञान व संस्कृतिक के उत्थान का फल है। जो समाज, सामाजिक अनुशासन को स्वीकार करता है और ज्ञान से लाभ उठा कर मानवीय गुणों के विकास व परिपूर्णता के बारे में सोचता है वही, सभ्य समाज कहलाता है।

    निश्चित रूप से विभिन्न जातियों व समुदायों को अपनाना, इस्लामी संस्कृति व सभ्यता की गतिशीलता के कारणों में से एक है। इस्लामी सभ्यता में जातियों के भेद का कोई महत्व नहीं है और यह सभ्यता किसी विशेष जाति या समुदाय से संबंधित नहीं है। इस्लाम प्रगति व विकास का धर्म है और उसने यह सिद्ध किया है कि वह व्यवहारिक रूप से विकास व कल्याण की ओर समाज का मार्गदर्शन कर सकता है।

    इस्लामी सभ्यता की एक अन्य विशेषता अंधविश्वास व सांप्रदायिकता से दूरी है। इस्लाम ने एक ऐसे संसार में अपने निमंत्रण का आरंभ किया जिसमें लोग अंधकार और गतिहीनता में ग्रस्त थे। इस्लाम ने अपनी शिक्षाओं के माध्यम से, जो ज्ञान व बुद्धि पर आधारित हैं, अज्ञानता व अंधविश्वासों की ज़ंजीरों को तोड़ दिया, लोगों के बीच प्रेम व बंधुत्व का प्रचार किया तथा एक प्रकाशमान सभ्यता के अस्तित्व में आने और उसके विकास का मार्ग प्रशस्त किया। वेल डोरेन्ट अपनी प्रख्यात पुस्तक मानव सभ्यता का इतिहास में लिखते हैं कि इस्लामी सभ्यता से अधिक आश्चर्यचकित करने वाली कोई अन्य सभ्यता नहीं है। यदि इस्लाम गतिहीनता, निश्चलता और जड़ता का समर्थक होता तो इस्लामी समाज को अरब समाज की उसी आरंभिक सीमा तक रोके रखता जबकि एक शताब्दी से भी कम समय में उसने अपने पड़ोस की सभ्यताओं को अपनी ध्रुव पर एकत्रित कर लिया और उन सबसे मिला कर एक अधिक व्यापक सभ्यता को अस्तित्व प्रदान किया।

    इस्लामी सभ्यता में, जिसका स्रोत एक पवित्र विचारधारा है, लोक-परलोक एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो मानव जीवन के भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों आयामों पर ध्यान देता है। धर्म, मनुष्य की प्रगति एवं परिपूर्णता का माध्यम है और बुद्धि एवं विवेक से उसका गहरा नाता है। प्रख्यात मुस्लिम समाज शास्त्री इब्ने ख़ल्लदून का मानना है कि मनुष्य के धार्मिक व बौद्धिक आयाम, उसके मानवीय आयामों से जुड़ जाते हैं और इस प्रकार एक बड़ी सभ्यता जन्म लेती है।

    यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि महान इस्लामी सभ्यता ने अपने से पहले वाली सभ्यताओं के नकारात्मक व अंधविश्वासपूर्ण तत्वों को नकार दिया और उनके सकारात्मक बिंदुओं को अपना कर महान इस्लामी सभ्यता के उत्थान और उसके फलने फूलने का मार्ग प्रशस्त किया।