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    इस्लाम धर्म का पुनर्जीवन

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    17 रबीउल अव्वल सन 83 हिजरी क़मरी को संसार में ईश्वर की ओर से जनता का मार्गदर्शन करने वाला एक अन्य सूर्य भी उदित हुआ। यह दूसरा सूर्य हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम हैं। पूरी श्रद्धा के साथ हम उनकी सेवा में सलाम भेजते हैं और आपकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं।

    इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम बारह वर्ष की आयु तक अपने दादा इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के साथ रहे और उनके ज्ञान के अथाह सागर से अनमोल मोती बटोरते रहे और फिर उनकी शहादत के पश्चात 19 वर्षों तक अपने पिता इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के साथ जीवन बिताया। ईश्वर की ओर से हर इमाम को मिलने वाले आध्यात्मिक आयामों के अतिरिक्त इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने पिता और दादा की सेवा में उपस्थित रह कर ज्ञान और अध्यात्म प्राप्त किया जिसके कारण इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम अनुदाहरणीय क्षमताओं और महान विवेक के आधार पर परिपूर्णतः और ज्ञान के चरम बिन्दु पर पहुंच गए।

    इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने पिता की शहादत के पश्चात 34 वर्षों तक जनता के ईश्वरीय मार्गदर्शन का दायित्व संभाला और इस दौरान जाफ़री मत की स्थापना की और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम द्वारा लाए गये ईश्वरीय धर्म इस्लाम को उसके अस्ली रूप में बाक़ी रखा। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के उपलब्धि भरे जीवन काल में बनी उमय्या के 5 शासकों ने हुकूमत की कि इनमें से हर एक ने किसी न किसी रूप में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम को यातनायें दी। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के जीवन काल में सफ़्फ़ाह और मंसूर नामक दो अब्बासी शासकों ने भी सत्ता संभाली कि ये दोनों भी अत्याचार करने व यातना देने में किसी तरह उमवी शासकों से पीछे नहीं थे। इस प्रकार इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के मूल्यवान जीवन के अंतिम दस वर्ष बहुत अधिक दुखों व कठिनाइयों में बीते।

    इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम का काल उमवी शासन व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह का काल था और राजनैतिक खींचतान के कारण बनी उमय्या के शासन काल के पतन के समय राजनैतिक सीमित्ताएं कुछ हद तक समाप्त हो गयी थीं और मदीने में अपेक्षाकृत स्वतंत्रतापूर्ण माहौल बन गया था। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इस अवसर का सदुपयोग करते हुए एक बड़े विश्वविद्यालय की स्थापना की जिसमें ज्ञान की विभिन्न शाखाओं की बहुत सी हस्तियों का प्रशिक्षण हुआ और उनके बीच से हदीस, इस्लामी ज्यूरिप्रूडेन्स और धर्मशास्त्र के बड़े बड़े विद्वान सामने आए कि हर एक अपने कार्यक्षेत्र से विशेष दायित्व निभाता था। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने जनता के ईश्वरीय मार्गदर्शन के 34 वर्षीय काल में कि जो उतार-चढ़ाव से भरा हुआ था, ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में लोगों का प्रशिक्षण किया और इससे भी महत्वपूर्ण कार्य यह था कि मुसलमानों के बीच पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के आचरण को पुनर्जीवित किया। उन्होंने उस काल में कि जब अब्बासी शासन के दबाव में मदीने को दो वर्षों के लिए छोड़ कर कूफ़े के निकट हैरह नामक शहर में मजबूरन रहना पड़ा, हैरह नगर में एक बड़ा स्कूल स्थापित किया और प्रतिभाशाली छात्रों का प्रशिक्षण किया।

    बनी उमय्या से बनी अब्बास को सत्ता मिलने का काल इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के जीवन का उतार-चढ़ाव भरा काल था। दूसरी ओर उनका काल विभिन्न मतों व दृष्टिकोणों तथा दार्शनिक और धर्मशास्त्र के विचारों के टकराव का काल भी था जिसका कारण जीते हुए देशों की जनता के साथ मुसलमानों के मेल-जोल और बाहर की दुनिया से इस्लामी केन्द्रों का संपर्क था इसलिए इस्लामी समाज में ज्ञान की प्राप्ति व शोध के लिए एक विशेष उत्साहपूर्ण वातावरण बन गया था।

    इस काल में किसी भी प्रकार की लापरवाही इस्लाम की जीवनदायक शिक्षाओं के अंत या उससे लोगों के दूर होने का कारण बन सकती थी। ऐसी संकटमय स्थिति में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के लिए ज़रूरी था कि वह मुसलमानों को नास्तिकता व अनेकेश्वरवाद के भ्रष्ट विचारों से मुक्ति दिलाने की सोचें और इस्लाम की शिक्षाओं व सिद्धांतों से आम लोगों के दूर होने को भी रोकें। उन्हें यह काम ऐसी स्थिति में अंजाम देना था कि जब बनी अब्बास का शासन काल था और स्थिति इतनी घुटन भरी थी कि इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के सभी साथियों के जान से मारे जाने का ख़तरा मंडरा रहा था। उदाहरण स्वरूप इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने एक निष्ठावान साथी जाबिर जोअफ़ी को उन्होंने एक विशेष काम के लिए कूफ़ा रवाना किया। अभी वह रास्ते में थे कि बहुत तेज़ी से इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम का एक संदेशवाहक उनके पास पहुंचा और उसने कहाः इमाम कह रहे हैं कि तुम पागलपन का स्वांग रचो। इमाम के इस आदेश से जाबिर जोअफ़ी मौत के मुंह में जाने से बच गए और कूफ़े का राज्यपाल जाबिर की हत्या के आदेश को व्यवहारिक बनाने से रुक गया और ऐसा उसने हज़रत जाबिर को पागल समझ कर नहीं किया। ऐसी कठिन परिस्थिति में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने ऐसे महान स्कूल की स्थापना की जिसमें ज्ञान की विभिन्न शाखाओं के 4000 छात्र प्रशिक्षित हुए और वे तत्कालीन विशाल इस्लामी जगत में फैल गए। इस्लामी शिक्षाओं को फिर से इस्लामी समाज में दिनचर्या का भाग बनाने का इतना बड़ा कारनामा अंजाम देने पर इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम शीया मत के संस्थापक के रूप मे प्रसिद्ध हुए। उन्हीं के कारण शीया मत को जाफ़री मत कहा जाता है।

    इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने कभी भी न थकने वाले योद्धा की भांति विचार व व्यवहार के मैदान में एक महावैज्ञानिक आंदोलन की बुनियाद रखी। ऐसा आंदोलन जिसके सामने दो बड़ी चुनौतिंया थीं। एक गढ़ी हुयी हदीसों और अंधविश्वास के बीच से अस्ल धार्मिक शिक्षाओं का सामने लाना और दूसरे दिगभ्रमित करने वाले विचारों की यल्ग़ार के सामने तर्क की शक्ति से प्रतिरोध करना था।

    इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के उज्जवल काल में इस्लामी दर्शनशास्त्र और धर्मशास्त्र, यूनानी दर्शनशास्त्र के मुक़ाबले में विकसित हुआ और इस्लाम की छत्रछाया में बड़े बड़े दार्शनिकों का प्रशिक्षण हुआ। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इस्लामी ज्यूरिसप्रूडेन्स और धर्मशास्त्र की बहुत सी विषयवस्तु को सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया। जाफ़री ज्यूरिसप्रूडेन्स वे धार्मिक नियम हैं जिसे ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन के माध्यम से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही तक भेजा। यह समृद्ध व प्रगतिशील ज्ञान उन्हीं मौलिक सिद्धांतों व नियमों की व्याख्या पर आधारित हैं जो इस्लाम के आरंभ में मौजूद थे। मुसलमानों के हनफ़ी मत के संस्थापक अबू हनीफ़ा, इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम के बारे में कहते हैः मैने इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम से अधिक ज्यूरिसप्रूडेन्स में किसी को दक्ष न देखा और न पहचानता हूं।

    दर्शनशास्त्र और धर्मशास्त्र में भी इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम अपने साथियों और उन लोगों से भी शास्त्रार्थ किया करते थे जो धर्म और ईश्वर पर आस्था नहीं रखते थे। इमामों की प्रचारिक शैलियों में एक यह भी शैली थी कि आप विभिन्न मतों व धर्मों के विद्वानों, नास्तिकों और भ्रम फैलाने वालों से शास्त्रार्थ किया करते थे। यही शैली इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने जीवन काल में भी अपनाई। वे चिकित्सा ज्योतिषि, ज्यूरिसप्रूडेन्स और धर्मशास्त्र इत्यादि के विद्वानों से शास्त्रार्थ करते थे कि इनमें से बहुत से शास्त्रार्थ इस्लामी स्रोतों में मौजूद हैं। इब्ने अबिल औजा, इब्ने मोक़फ़्फ़ा, सुफ़यान सौरी, अबु हनीफ़ा जैसी हस्तियों और मोतज़ेला मत के अम्र बिन उबैद और वासिल बिन अता जैसे विद्वानों से शास्त्रार्थ बहुत प्रसिद्ध हैं।

    इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के शुभ जन्म दिवस की हार्दिक बधाई के साथ उनके आचरण और स्वर्ण कथन के कुछ अंश को आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं।

    इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम अपने पूर्वजों की भांति अपने काल में हर नैतिक गुण में सबसे आगे थे। उनका मन ईश्वर की याद से प्रकाशमय था और वे दीन-दुखियों की सहायता और दान-दक्षिणा में भी अपने पूर्वजों की भांति दानी थे। पूरी नम्रता और ख़ुशी से अपने व्यक्तिगत काम अंजाम देते थे और हेजाज़ की तेज़ धूप में बेलचा लेकर अपने खेत में काम करते थे और कहते थेः यदि इस स्थिति में मुझे ईश्वर बुला ले तो मैं सौभाग्यशाली हूंगा क्योंकि पूरी मेहनत से अपने और अपने परिवार के लिए आजिविका की व्यवस्था कर रहा हूं।

    इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की क्षमाशीलता के संबंध में इतिहास में मिलता है कि एक व्यक्ति इमाम की सेवा में आया और उसने कहाः अमुक व्यक्ति से जब मेरी भेंट हुयी तो उसने आपको बहुत बुरा कहा। उस समय इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम अपने स्थान से उठे और वज़ू करके नमाज़ के लिए खड़े हो गए। वर्णन करने वाला कहता हैः मैं अपने मन में सोच रहा था कि इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम उसके लिए बद्दुआ करेंगे किन्तु इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम

    ने नमाज़ पढ़ने के बाद ईश्वर से इस प्रकार प्रार्थना कीः हे मेरे पालनहार! जितना मेरे अधिकार में था मैंने उसे क्षमा कर दिया। तेरी क्षमाशीलता व दान मुझसे अधिक है तो तू भी उसे क्षमा कर दे और उसके बुरे कर्म की उसे सज़ा न दे।

    इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैः तीन अवगुण जिस व्यक्ति में होंगे वह पाखंडी होगा चाहे व रोज़ा रखता हो और नमाज़ पढ़ता हो, पहले यह कि बात करने झूठ बोलता हो, दूसरे यह कि वादा ख़िलाफ़ी करता हो अर्थात वचन का पालन न करता हो और तीसरे यह कि अमानत में बेइमानी करता हो।

    इसी प्रकार इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः शैतान का कहना है कि पांच समूह के लोगों पर मेरा बस नहीं चलता। वे इस प्रकार हैः जो व्यक्ति पूरी निष्ठा से ईश्वर की शरण चाहे और अपने समस्त कामों में उस पर विश्वास रखे। दूसरा वह व्यक्ति जो दिन रात ईश्वर का अधिक स्मरण करे। तीसरे वह व्यक्ति जो कुछ अपने लिए पसंद करता है वही वह अपने दूसरे मोमिन भाई के लिए भी पसंद करे। चौथे वह व्यक्ति जो कठिनाई व विपत्ति के समय बेचैनी व चीख़-पुकार नहीं करता और पांचवे वह व्यक्ति जो ईश्वर की ओर से मिलने वाली आजीविका पर संतुष्ट हो और आजीविका का रोना न रोता हो।