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    इस्लाम में एकता के उपाय पैग़म्बर (स) के द्वारा

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    इस्लामी जगत में एकता का उद्देश्य यह है कि मुसलमान अपनी धार्मिक आस्थाओं के पालन के साथ ही पवित्र क़ुरआन, पैग़म्बरे इस्लाम और एक क़िबला जैसे संयुक्त धार्मिक बिन्दुओं पर बल दें और विभिन्न धार्मिक, राजनैतिक और जातीय मतभेदों से बचें जिससे इस्लामी जगत कमज़ोर होगा। इस बात में शक नहीं कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम का आचरण, मौजूदा इस्लामी जगत में एकता लाने के लिए मानदंडों व सिद्धांतों का आधार बन सकता है। इस आचरण की विभिन्न आयामों से समीक्षा की जा सकती है।
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    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम, सभी समय व स्थान में मुसलमानों के प्रभुत्व के लिए इस्लामी जगत में एकता को मूल स्ट्रेटिजी मानते थे और इसे व्यवहारिक बनाने के लिए बहुत कोशिश की। इसका नतीजा ख़ुद पैग़म्बरे इस्लाम के जीवन में देखने में आया। पैग़म्बरे इस्लाम के राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आचरण पर नज़र डालने से यह बात सामने आती है कि न सिर्फ़ मुसलमानों के बीच आपस में एकता बल्कि पूरे इस्लामी समाज में समरस्ता जिसमें ग़ैर मुसलमान संप्रदाय भी शामिल थे, उनकी प्राथमिकताओं में थी। इस संदर्भ में हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं, “पैग़म्बरे इस्लाम ने सामाजिक फूट को एकता से सही किया और आपस में एक दूसरे के प्रति मन में दूरी को ख़त्म किया।”
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    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने इस्लामी जगत में एकता के लिए आस्था, नैतिकता, राजनीति और संस्कृति पर आधारित नीति अपनायी। नास्तिक व अनेकेश्वरवादी विचारों से संघर्ष और उसके स्थान पर एकेश्वरवादी विचारों के फैलने से उस समय के माहौल में आस्था की दृष्टि से एकता वजूद में आयी। पैग़म्बरे इस्लाम ने वैचारिक एकता के लिए तत्कालीन समाज की क्षमता के मद्देनज़र एकेश्वरवाद और इब्राहीमी धर्म के आधार पर अपने दायित्व को अंजाम दिया। उस समय के अनपढ़ समाज में अरबों का एक समूह हज़रत इब्राहीम के धर्म पर आस्था रखता था जो एकेश्वरवाद पर आधारित था और पैग़म्बरे इस्लाम ने इस्लाम की व्याख्या में हनीफ़ शब्द का बहुत ही अच्छे ढंग से इस्तेमाल किया जो एकता पैदा करने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। मौजूदा युग में भी मुसलमान इस वैचारिक क्षमता को अपने बीच एकता के लिए प्रयोग कर सकते हैं। अगर एकेश्वरवाद अपने वास्तविक अर्थ में मुसलमानों के बीच प्रचलित हो जाए तो पूरी दुनिया में एकेश्वरवाद पर आधारित सबसे मज़बूत समरस्ता वजूद में आएगी। इस विचार की छाव में अत्याचार व भ्रष्टाचार के प्रतीकों से संघर्ष इस्लामी जगत की प्राथमिकताओं में शामिल होगा।
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    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के काल में इस्लामी समाज में एकता लाने में एक और प्रभावी तत्व उनका शिष्टाचार था। इतिहासकारों ने इस हक़ीक़त को स्वीकार किया है कि जो चीज़ पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के लोगों के मन पर राज करने में प्रभावी रही, वह लोगों के साथ उनका शिष्टाचार था। नैतिक गुण, लोगों से खुले मन से मिलना, निर्धनों के साथ कृपा और अहंकार से दूरी वे विशेषताएं थी जिसने पैग़म्बरे इस्लाम को लोकप्रिय बना दिया था और उनका वजूद मुसलमानों के बीच एकता की धुरी बन गया था। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने कभी भी अपने स्थान को लोगों के डराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया। वह बहुत ही मेहरबान शासक थे। आम लोगों को क्षमा कर देना उनके व्यवहार की पहचान थी।
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    पैग़म्बरे इस्लाम द्वारा लोगों को व्यापक स्तर पर माफ़ करने की सबसे बड़ी मिसाल, मक्का को फ़त्ह करने के बाद वहां के लोगों को राजक्षमा प्रदान करने की घटना है। मक्के के लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम और उनके अनुयाइयों को नाना प्रकार की पीड़ाएं दी थीं लेकिन पैग़म्बरे इस्लाम ने मक्का फ़त्ह करने के बाद सबको माफ़ कर दिया हालांकि मक्क़ा को फ़त्ह करने के वक़्त पैग़म्बरे इस्लाम अपनी शक्ति के चरम पर थे और वह चाहते तो बदला ले सकते थे। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने मक्का फ़त्ह करते वक़्त कहा था, “मुसलमान मुसलमान का भाई है। उस पर ज़ुल्म नहीं करता, उसका अपमान नहीं करता, उसके साथ धोखा नहीं करता।मुसलमानों का यह कर्तव्य है कि एक दूसरे के साथ संबंध रखे, ज़रूरतमंदों की मदद करें और आपस में एक दूसरे के साथ मेहरबान रहें।”
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    इस प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम का आकर्षक शिष्टाचार मतभेद को ख़त्म करने में सबसे प्रभावी तत्व था और लोग एक दूसरे से मेल-जोल कर लेते थे। लेकिन खेद के साथ कहना पड़ता है कि ज़्यादातर इस्लामी देशों में इस वक़्त जनता से सहानुभूति रखने वाला, न्यायप्रेमी और भरोसे योग्य शासक नहीं है और इसी वजह से इस्लामी जगत और शासन वर्ग के बीच खाई बढ़ी है। और यही चीज़ इस्लामी समाज के भीतर बहुत सी समस्याओं के सिर उठाने का कारण बनी है और अपने एकमात्र दुश्मन से निपटने में उनकी क्षमता को कम करती है। इसी प्रकार मुसलमानों के बीच फूट डालने वालों के पैठ बनाने की पृष्ठिभूमि मुहैया होती है।
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    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने अपने स्थान, उपाय और दूरदर्शिता से बहुत से मतभेदों को जड़ से ख़त्म कर दिया था। तत्कालीन मदीना के समाज की एक मुश्किल, बहुत से क़बीलों व संप्रदायों का वजूद था। ये क़बीले एक दूसरे से मतभेद रखते थे। पैग़म्बरे इस्लाम ने एकेश्वरवाद को आधार बनाकर समाज में ऐसी आस्था को प्रचलित किया कि सभी क़बीले एक दूसरे के निकट हो गए। क्योंकि सभी मुसलमान को ईश्वर और उसके दूत का पालन करना चाहिए। इस्लाम से पहले सउदी अरब की राजनैतिक स्थिति के अध्ययन से पता चलता है कि वहां पर एक व संगठित सत्ता नहीं थी बल्कि अनेक क़बीले सामन्तवादी व्यवस्था अपनाए हुए थे। उस अनपढ़ समाज में हर प्रकार के राजनैतिक व प्रशासनिक नियम के अभाव के कारण अराजकता फैली हुयी थी।
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    एक राजनैतिक व्यवस्था की स्थापना, इस्लामी एकता का सबसे महत्वपूर्ण आधार बनी क्योंकि धार्मिक सरकार एवं एक नेता के ज़रिए समाज के राजनैतिक मार्गदर्शन के बिना, एकता संभव नहीं थी। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने मदीना पहुंच कर विभिन्न गुटों के साथ संधियां की। इन संधियों को, समाज में इस्लामी एकता लाने की कोशिशों का सबसे स्पष्ट सुबूत कहा जा सकता है।
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    इन संधियों में सबसे अहम संधि, पैग़म्बरे इस्लाम और मदीने के क़बीलों के बीच होने वाली संधि थी। यह उपाय धार्मिक समरस्ता व राष्ट्रीय एकता के लिए बेहतरीन मार्ग था क्योंकि इस संधि ने संघर्षरत क़बीलों, ग़ैर मुसलमानों और पलायन करने वाले मुसलमानों के सामाजिक अधिकार को सुनिश्चित बनाया। दूसरी ओर इन संधियों से राजनैतिक एकता पर आधारित सत्ता के गठन की भूमि प्रशस्त हुयी। जिन लोगों ने इस्लाम के सामने उद्दन्डता नहीं दिखायी, वे अपने धर्म पर बाक़ी रहते हुए मदीना के मुस्लिम समाज में पूरी सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा तथा अधिकारों से संपन्न थे। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहा, “ अगर कोई ग़ैर मुसलमान तुम्हारे पास शरण ले तो उसकी सुख सुविधा का ध्यान रखो और इस्लामी शिक्षाओं के ज़रिए उसकी आत्मिक भूख मिटाओ। शायद सत्य को समझ ले और इस्लाम स्वीकार कर ले। अगर इस्लाम स्वीकार कर लिया तो तुम्हारा भाई कहलाएगा और अगर इस्लाम स्वीकार न किया तब भी तुम्हारी शरण में बाक़ी रहेगा और उसका सम्मान किया जाना चाहिए।”
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    इस प्रकार इस्लामी एकता के लिए पैग़म्बरे इस्लाम ने जो हल अपनाए उसमें संयुक्त धार्मिक व राष्ट्रीय भावना को जागृत करना था। यह ऐसा उपाय है जिससे इस युग में भी इस्लामी समाज में इस्लामी देशों में रहने वाले ग़ैर मुसलमान अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल हो सकता है और यह विदेशी ख़तरों से सुरक्षित रख सकता है।
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    पैग़म्बरे इस्लाम ने मदीना पहुंचने के पहले साल एक और अहम काम यह किया कि मुसलमानों के बीच आपस में बंधुत्व स्थापित किया। यह सामूहिक बंधुत्व संधि जातीय व क़बायली भावनाओं को नकारने तथा सत्य व सामाजिक सहयोग के आधार पर वजूद में आयी और यह पवित्र क़ुरआन के हुजरात नामक सूरे की दसवीं आयत का व्यवहारिक उदाहरण बनी जिसमें ईश्वर कह रहा है कि मोमिन एक दूसरे के भाई हैं तो दो मोमिन भाइयों के बीच शांति स्थापित करो। ईश्वर से डरो ताकि उसकी कृपा के पात्र बन सको।
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    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने एक मोहाजिर और एक मदीनावासी के बीच बंधुत्व संधि स्थापित की। इस प्रकार सारे मुहाजिरों और मदीनावासियों के बीच बंधुत्व संधि स्थापित हुयी। पैग़म्बरे इस्लाम की यह कोशिश ईश्वर पर आस्था के आधार पर सामाजिक संबंध के वजूद में आने का आधार बनी। इसके नतीजे में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने अरब की सामाजिक संरचना को इस्लामी जगत में एकता के लिए उपयोग किया।
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    पैग़म्बरे इस्लाम ने इस्लामी जगत में एकता के लिए एक और क़दम उठाया और वह नस्लभेद का उन्मूलन था। पैग़म्बरे इस्लाम की ओर से जातीय भेदभाव के निराधार होने के बारे में अनुशंसा का मुसलमानों और ख़ास तौर पर ग़ैर अरब मुसलमानों के बीच एकता व समरस्ता पर गहरा प्रभाव पड़ा। यही कारण है कि अरब और ग़ैर अरब मुसलमानों ने इस्लाम को अपना समझा और जातीय भेदभाव ग़ैर अरब मुसलमानों में इस्लाम के प्रति दुर्भावना न पैदा कर सका। इस बात में शक नहीं कि पैग़म्बरे इस्लाम ने मुसलमानों के बीच एकता के लिए सबसे उपयोगी उपाय पेश किए। राष्ट्रीय एवं जातीय भेदभाव से दूरी और संयुक्त धार्मिक मान्यताओं पर बल और भ्रान्तियों को दूर करने और दुश्मन की चालों को समझने के लिए विभिन्न मतों के बीच दृष्टिकोणों में निकटता से मुसलमानों के सामने एकता के नए क्षितिज खुल सकते हैं।

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