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    इस बहस का नतीजह्।

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    कूरआन, एक ऐसी आसमानी ग्रंथ और पैग़म्बरे अकरम (स.) के लिए हमेंशा मोज़ेज़ा है, और बिना परिवर्तन व किसी प्रकार के बातिल चीज़े प्रवेश किये बगैर हमारे दर्मियान उपस्थित है, यह वही क़ुरअने मजीद है जो पैग़म्बरे अकरम (स.) पर नाज़िल हूई थी और किसी परिवर्तन होने से पाक व पाकीज़ह है। और हमारे मासुमीन (अ) ने भी इसी कूरआन जो मुस्लमानों के हाथ में है इस को अपना हक़ व बातिल की पह्चान का मियार क़रार दिया है, और जो कुछ कूरआन के मुताबिक़ नहीं है उस को बातिल घोषना किया है। और जो कुछ कूरआन के मुआफ़िक़ है उस को अपना जीवन के समस्त प्रकार निर्देश बयान किया हैः और इस के साथ साथ ताकीद के साथ बर्नना किया है किः पवित्र कूरआन को बेशि से बेशि अनुराग करो, उस के क़ावानीन के उपर अमल करो, उस को सम्मान प्रर्शन करो, इस के साथ साथ और भी फ़रमायाः कूरआन पाठ करने का सवाब और उस को रक्षा करने के सम्पर्क, जिस समय कूरआन पाठ हो ध्यान से सुन ना, और समस्त प्रकार क़ावानीन के ऊपर कूरआन मजीद की अइन को बर्तरी देना, कोई भी इंसान आपनी ज़िन्दगी में खुश बख़्ति देख नहीं सकता जब तक वह कूरआन पर अमल न करे. मगर यह हैं की वह कूरआन के साये में जीवन बस्र करे चाहे वह क़ानून फ़र्दि हो या समाजिक,मद्दि हो या मानबी, सियासी हो या इक़्तेसादी वगैरह……विजयी उस समय अर्जन करना संभव है, जब उस के बिधानें पर अमल करें।