islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. ईरान के समकालीन बुद्धिजीवी-3

    ईरान के समकालीन बुद्धिजीवी-3

    ईरान के समकालीन बुद्धिजीवी-3
    Rate this post

    समकालीन विश्व में ईरान की इस्लामी क्रान्ति के स्थान और इमाम ख़ुमैनी के प्रभाव के दृष्टिगत, उनकी आध्यात्मिक विशेषताओं, उनके व्यक्तित्व के आयामों तथा उनके धार्मिक व राजनैतिक विचारों को समझने के लिए सबसे अच्छी शैली उनके भाषणों, राजनैतिक व सामाजिक मामलों पर उनके लेखों और उनके व्यक्तित्व व परिवार से संबंधित लेखों का अध्ययन है। पिछले कार्यक्रम में हमने इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह की आत्मज्ञान से संबंधित कुछ किताबों से आपको परिचित कराया था। आज की कड़ी में भी इमाम ख़ुमैनी की कुछ दूसरी रचनाओं से आपको परिचित कराएंगे।

                 *****

    अधिकांश शायरों का यह मानना है कि चूंकि कवि कोमल भावना का स्वामी होता है इसलिए एक राजनेता बनने के बाद उसमें शेर कहने की क्षमता नहीं रह जाती किन्तु इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के बारे में शायरों का अलग दृष्टिकोण है। ईरान के समकालीन शायर हमीद सब्ज़वारी इमाम ख़ुमैनी की साहित्यिक अभिरूचि के बारे में कहते हैः इमाम ख़ुमैनी के शेरों में उनके आत्मज्ञानी व्यक्तित्व की झलक प्रकट होती है और इसी तत्व ने उन्हें एक आत्मज्ञानी कवि बना दिया है। आत्मज्ञान, व्यक्ति को उच्च स्थान पर ले जाता है और इसीलिए इमाम के शेर समाज को मुक्ति दिलाएंगे। इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह युवावस्था से जीवन के अंत तक सामयिक रूप से शेर कहा करते थे कि जिनके नमूने किताबों में मौजूद हैं या फिर लोगों को याद हैं। इन शेरों का एक भाग इमाम ख़ुमैनी के स्वर्गवास के पश्चात सामने आया।

    इमाम ख़ुमैनी के शेरों के संग्रह में आत्मा को ताज़गी देने वाले क़सीदे, रोबाईयां और ग़ज़लें हैं। इमाम ख़ुमैनी के शेर ईश्वर की पहचान और एकेश्वरवादी विचारधारा पर आधारित हैं। केवल एकेश्वरवादी विचारधारा ही व्यक्ति को अंधविश्वास से मुक्ति दिलाती है, उसके विचार को सृदृढ़ आधार प्रदान करती है और उसे अमर शांति प्रदान करती है।

    चेहल हदीस अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम व उनके पवित्र परिजनों के चालीस कथनों पर आधारित किताब भी इमाम ख़ुमैनी की महारचनाओं में है। यह किताब इमाम ख़ुमैनी ने वर्ष 1339 हिजरी क़मरी में लिखी। उन्होंने इस किताब में पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के चालीस मूल्यवान कथनों की व्याख्या की है। इमाम ख़ुमैनी ने इस किताब के आरंभ में प्रस्तावना में लिखा हैः यह बेचारा कमज़ोर बंदा कुछ समय से यह सोच रहा है कि पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के 40 कथनों को जो प्रतिष्ठित किताबों में मौजूद हैं उन्हें संकलित करे और हर एक की उचित व्याख्या करे जिसे आम लोग समझ सकें इसलिए इसे फ़ारसी में लिखा है ताकि फ़ारसी भाषी भी इससे लाभान्वित हो सकें।

    इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने इस किताब में पहले एक कथन का उल्लेख किया है, फिर उसका फ़ारसी में अनुवाद किया है और कथन में मौजूद कठित शब्दावली का अर्थ बयान किया है। उसके बाद हदीस की कई अध्याय में व्याख्या की है। चालीस कथनों पर आधारित इस प्रकार की किताब के संकलन का आधार पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम का एक कथन है जिसमें उन्होंने फ़रमायाः जो भी मेरी क़ौम के हित में 40 कथन याद करेगा ईश्वर प्रलय के दिन उसे विद्वान व धर्मशास्त्री के रूप में उठाएगा।

    इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह की चेहल हदीस नामक किताब में आरंभ की 33 हदीसें नैतिक मामलों से विशेष हैं। इस भाग में इमाम ख़ुमैनी ने मनुष्य की मनोवैज्ञानिक बीमारियों व विकारों को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। हर एक नैतिक बुराई के नुक़सान का उल्लेख किया है। उन्होंने घमंड, दिखावा, क्रोध और द्वेष को अप्रशिक्षित मन में पनपने वाली बुराई बताई है और व्याख्या के दौरान इन बुराइयों को दूर करने के मार्गों का उल्लेख किया है। इसी प्रकार हदीस की व्याख्या में अपने वर्णन की पुष्टि में पवित्र क़ुरआन की आयतों को उद्घरित किया है।

    अब्दुल अज़ीज़ क़ुरबानी भी पवित्र नगर मशहद में मदरसे के उन छात्रों में हैं जिन्हें इमाम ख़ुमैनी की चेहल हदीस किताब में वर्णित सभी चालीस कथन याद हैं। वे इस मूल्यवान किताब के महत्वपूर्ण बिन्दुओं का इस प्रकार उल्लेख करते हैः चेहल हदीस किताब में महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि इस किताब को लिखते समय इमाम ख़ुमैनी ने हर कथन की व्याख्या में मनुष्य के आत्मनिर्माण के लिए फ़ार्मूले और समीकरण पेश किए हैं। ये फ़ार्मूले व समीकरण व्यक्तिगत प्रशिक्षण के लिए इतने व्यापक हैं कि बुद्धिजीवी, छात्र, धर्मगुरु, आम कारोबारी व्यक्ति, व्यापारी सहित समाज के सभी वर्ग इससे आत्मनिर्माण कर सकते हैं।

    इमाम ख़ुमैनी जैसा कि सातवें कथन की व्याख्या में जो क्रोध से विशेष है, लिखते हैः मनुष्य को उस समय जब उसका मन शान्त हो, अपने क्रोध की ओर से बहुत चिंतित रहना चाहिए। यदि उसमें यह जलाने वाली ज्वाला है तो जिस समय वह शांत है उसे क्रोध से छुटकारा पाने का प्रयास करना चाहिए। उसे चाहिए कि क्रोध आने के कारण के बारे में सोच कर स्वयं को इस बुराई से बचाए। उसे क्रोध से होने वाली बुराइयों के बारे में सोचना चाहिए। संभव है इस बुराई का परिणाम एक व्यक्ति सदैव भुगते। दुनिया में कठिनाइयों में घिरा रहे और प्रलय में दंड व प्रकोप झेले।

    इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह की एक और किताब है जिसका शीर्षक है जेहादे अकबर या मन से संघर्ष। ये किताब भी मनुष्य के आत्मनिर्माण व उसके प्रशिक्षण के बारे में है। यह किताब वास्तव में पवित्र नगर नजफ़ में इमाम ख़ुमैनी द्वारा छात्रों व धर्मगुरुओं के बीच दिए गए भाषणों का संकलन है। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने जेहादे अकबर में आत्मा की शुद्धि के लिए मन को नैतिक बुराइयों से दूर करने के महत्व पर चर्चा की है। इमाम ख़ुमैनी इस किताब में एक स्थान पर लिखते हैः ज्ञान प्रकाश है किन्तु यह भ्रष्ट के काले मन में अंधकार के दायरे को और बढ़ा देता है। वह ज्ञान जो मनुष्य को ईश्वर के निकट करता है, सांसारिक मोहमाया पर मिटे व्यक्ति को, ईश्वर से और दूर कर देता है।

    इमाम ख़ुमैनी स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान की प्राप्ति के साथ साथ आत्मशुद्धि व मन की गंदगी का जड़ से सफाया भी ज़रूरी है। यदि मन की गंदगी को जड़ से साफ़ न किया जाए तो न केवल यह कि ज्ञान की प्राप्ति उस दूषित अस्तित्व के लिए लाभदायक नहीं होगी बल्कि उसे और दूषित करेगी तथा और बुराइयों की ओर ले जाएगी। पहले चरण में तो भ्रष्ट विद्वान के नाश का कारण बनेगा और फिर बाद के चरण में दूसरों अर्थात मानव समाज को भ्रष्ट करेगा। इतिहास व अनुभव से सिद्ध है कि मानव समाज को जितना भ्रष्ट विद्वानों से हानि पहुंची उतनी आम लोगों से हानि नहीं पहुंची है।

    स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की दृष्टि में मानवीय मानदंडों व नैतिक गुणों से व्यक्तित्व को संवारना बहुत बड़ा व कठिन दायित्व है जो समाज के वर्गों विशेष रूप से ज्ञान प्राप्त करने वाले छात्रों के कंधे पर है। यदि ज्ञान मन की पवित्रता के साथ होगा तो बहुत सी भलाइयों का स्रोत बनेगा और मानव समाज में सुधार की पृष्ठिभूमि बनेगा।

    इमाम ख़ुमैनी की सहीफ़ए नूर नामक किताब को उनकी सबसे महत्वपूर्ण व प्रभावी किताब की संज्ञा देना ग़लत न होगा। यह किताब 21 जिल्दों में है जो इमाम ख़ुमैनी के सभी बयान और लेखों का संकलन है। इस किताब में उनके भाषण, पत्र, संदेश, साक्षात्कार, धार्मिक अनुमतिपत्र इत्यादि शामिल हैं।

    यह किताब इमाम ख़ुमैनी द्वारा वर्ष 1933 में लिखे गए पत्र से आरंभ होती है और उनके अंतिम पत्र  पर जो उन्होंने अपने स्वर्गवास से दो सप्ताह पूर्व 18 मई 1989 को लिखा था, समाप्त होती है।

    इमाम ख़ुमैनी के अपने बेटों, वकीलों और मित्रों को ईरान सहित इस्लामी दुनिया में लिखे गए पत्र उनकी महान आत्मा के दूसरे आयामों को स्पष्ट करते हैं। वरिष्ठ धर्म गुरु और इस्लामी क्रान्ति के नेतृत्व की ज़रूरतें उन्हें कभी भी अपने बच्चों, वकीलों और श्रद्धालुओं के हक़ में धार्मिक, नैतिक और भावनात्मक दायित्व अंजाम देने से कभी भी न रोक सकीं। इमाम ख़ुमैनी के पत्रों में आम कुशल क्षेम पूछने से लेकर समस्याओं के समाधान, चेतावनी, जीवन यापन के संबंध में सद्भावनापूर्ण निर्देशों और शिक्षा की प्राप्ति व आत्मशुद्धी की अनुशंसा सहित और दूसरे महत्वपूर्ण मामलों का उल्लेख मिलता है। ये सब दूसरों के साथ इस्लामी शिष्टाचार को पूरी तरह अंजाम देने के संबंध में उनमें सावधानी का पता देते हैं।

    सहीफ़ए नूर में इमाम ख़ुमैनी के संकलित लेखों में सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक व राजनैतिक मामलों से संबंधित उनके संदेश हैं। वास्तव में इमाम ख़ुमैनी क्रान्ति से पूर्व इन संदेशों के प्रकाशन द्वारा जनता व अपने श्रद्धालुओं के साथ प्रत्यक्ष रूप से संपर्क में थे और यह संपर्क की उनकी सबसे प्रभावी शैली थी। ये संदेश राजशाही शासन के विरुद्ध जनांदोलन चलाने में प्रभावी बने और ईरानी राष्ट्र के संघर्ष के पूरे काल में इमाम ख़ुमैनी की ओर से घोषणाएं एवं संदेश क्रान्ति के मार्ग और उसके नारों व क्रियाकलापों की दिशा तय करते थे।

    जनता के बीच इमाम ख़ुमैनी का भाषण भी सहीफ़ए नूर में संकलित एक दूसरा महत्वपूर्ण विषय है। जनता के विभिन्न वर्गों के बीच इमाम ख़ुमैनी के भाषण अपने विचारों से जनता को सीधे तौर से परिचित होने का अवसर प्रदान करते थे। चेहरे पर शांति व संतोष के साथ ही दृढ़ संकल्प, स्नेहपूर्ण व दिल में उतरने वाली दृष्टि, जनता के साथ सच्चाई और सादगी वे तत्व थे जो इमाम ख़ुमैनी के भाषणों को प्रभावी बनाते थे।

    इमाम ख़ुमैनी के दृष्टिकोण व क्रियाकलाप उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का पता देते हैं कि एक ओर अत्याचारियों व साम्राज्यवादियों के सामने वीरता व दृढ़ता थी तो दूसरी ओर पीड़ित राष्ट्रों के प्रति वे सहानुभूति रखते थे। वह एक जागरुक धर्मगुरु, दक्ष दार्शनिक, ईश्वर की प्राप्ति में खोए हुए आत्मज्ञानी थे जिन्होंने ईरान की महाक्रान्ति का बहुत ही अच्छे ढंग से नेतृत्व किया। ऐसी क्रान्ति जिसके अच्छे प्रभाव अभी भी विश्व पर पड़ रहे हैं।