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    ईरान में ज्ञान आंदोलन-2

    ईरान में ज्ञान आंदोलन-2
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    ज्ञान आंदोलन के परिणाम स्वरूम आज हमें विभिन्न वैज्ञानिक क्षेत्रों में व्यापक विकास देख रहे हैं तो क्या अब हमें संतुष्ट होकर बैठ जाना चाहिए? ज़ाहिर है कि नहीं, हमं अभी ज्ञान विज्ञान की अग्रिम पंक्ति से पीछे हैं। अभी जीवन के लिए आवश्यक बहुत से वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्रों में हम पीछे हैं और यह पिछड़ापन बहुत पुराना है। अतः इस पिछड़ेपन को दूर करने के लिए हमें काम करना होगा क्योंकि विश्व में वैज्ञानिक प्रयासों और संघर्ष में व्यस्त कारवां कभी रुकता नहीं, विश्राम के लिए ठहरता नहीं बल्कि आगे बढ़ता रहता है, तीव्र गति से आगे बढ़ता रहता है। अतः हमें अपनी वर्तमान स्थिति और विकास को सुरक्षित व जारी रखने के साथ साथ और भी आगे बढ़ने की आवश्यकता है। इसके लिए प्रयास और मेहनत की आवश्यकता है।

    एक महत्वपूर्ण बिंदु जो विश्वविद्यालयों में ध्यान का केन्द्र बनना चाहिए यह है कि विज्ञान औज्ञ तकनीक के क्षेत्र में विकास, देश के आम विकास की विषय के साथ जुड़ जाना चाहिए। विश्वविद्यालयों में यह विषय और यह सोच पायी जाती है किंतु इसे और भी व्यापक स्तर पर उठाने की आवश्यकता है। इस सोच को प्रबल बनाने की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों में वैज्ञानिक शोध और आविष्कार पर बल दिया जाना आवश्यक है किंतु इसके साथ ही साथ देश की आवश्यकताओं की दृष्टिगत रखना भी आवश्यक है अर्था शोध और अनुसंधान, आविष्कार व नई खोज देश की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखकर की जाए। यह महत्वपूर्ण विचारशैली और दृष्टिकोण है। कारण यह है कि हमारी संभावनाएं और संसाधन सीमित हैं अतः वैज्ञानिक शोध का कार्य हमें अपनी ज़रूरतों के अनुरूप करना चाहिए। हमारी आवश्यकताएं बहुत अधिक तथा विभिन्न प्रकार की हैं। इन आवश्यकताओं को पूरा किया जाना चहिए।

    आठ वर्षीय युद्ध के दौरान हमें अनगिनत समस्याओं का सामना करना पड़ा, बहुत सी कमियां थीं। धीरे धीरे विश्वविद्यालयों ने अपना सहयोग बढ़ाया और यह कमियां पूरी हुईं शून्य भरे गए। हम इसी प्रकार सांस्कृतिक क्षेत्र मे, राजनैतिक क्षेत्रों में तथा प्रबंधन के क्षेत्र में अपनी कमियों को इन्हीं विश्वविद्यालयों के योगदान से दूर कर सकते हैं। रिक्त स्थानों को भर सकते हैं। विश्वविद्यालय एसा कर सकते हैं कि उन विषयों पर अनुसंधान और शोध करें जिनसे यह कमियां दूर हो सकती हों। अतः यह कसौटी होना चाहिए कि अनुसंधान और शोध का कार्य देश की आवश्यकताओं के अनुरूप अंजाम दिया जाए।

    विश्वविद्यालय के शोधकार्यों का देश के औद्योगिक व व्यापारिक क्षेत्र से जुड़ जाना वह विषय है जिस पर हम दस बारह साल से आग्रह कर रहे हैं। हमने सरकारों से भी कहा, युनिवर्सिटियों से भी कहा। इस पर काफ़ी हद तक काम भी हुआ है किंतु पूरी तरह से अभी इस पर अमल होना शेष है। यह शैली विश्वविद्यालयों के लिए भी लाभदायक है, उद्योग के लिए भी बहुत रचनात्मक है और साथ ही साथ व्यापार तथा कृषि को भी इससे बड़ी मदद मिल सकती है।

    एक और महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि अनुंसधान, शोध और आविष्कार के क्षेत्र में हमें सार्थक और रचनात्मक प्रतिस्पर्धा का वातावरण बनाने की आवश्यकता है। देश में सार्थक और गंभीर प्रतिस्पर्धा का वातावरण होना चाहिए। यह प्रतिस्पर्धा युनिवर्सिटियतं के बीच भी हो, शिक्षकों के बीच भी हो और बुद्धिजीवियों के बीच भी हो हर सतह पर यह प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। उच्च शिक्षा से संबंधित संस्थाओं को चाहिए कि प्रतिस्पर्धा का यह वातावरण उत्पन्न करें। उदाहरण स्वरूप इंजीनियरिंग में कुछ युनिवर्सिटियां देश की महत्वपूर्ण युनिवर्सटियां हैं इसी प्रकार अन्य कुछ विषयो में कुछ दूसरे विश्वविद्यालय सबसे अच्छे विश्वविद्यालय हैं। अब इन विश्वविद्यालयों में आपस में कंपटीशन होना चाहिए।

    यह तथ्य भी सबके दृष्टिगत है कि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में हमें जो प्रगति मिली है वह इस्लामी क्रान्ति की देन है। अगर हमें आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक अर्थात क्रान्ति न होती और हमें भीतर प्रबल धार्मिक आस्था और आत्म विश्वास की भावना न होती तो पूरे देश में इस प्रकार का सार्थक वातावरण न बन पाता और वर्चस्ववादी शक्तियां कभी भी ईरान को, जिस पर उनकी ललचाई नज़रें अब भी लगी हुई हैं, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ने और आत्म निर्भर हो जाने का अवसर न देतीं। देश में जिस भाग पर भी इन शक्तियों का वर्चस्व था इस्लामी क्रान्ति ने आकर उनका वर्चस्व समाप्त हो गया ।

    मैं यह भी कहना चाहूंगा कि ज्ञान आंदोलन के तहत जारी प्रयासों से हमें अपने विश्वविद्यालयों के स्तर को और बेहतर बनाना चाहिए। विश्वविद्यालयों की संख्या में निरंतर वृद्धि भी कम महत्वपूर्ण नहीं है यह भी बहुत सार्थक और सराहनीय चीज़ है। यदि देश में विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ती है, मेडिकल कालेज बढ़ते हैं और देश के हर कोने में चिकित्सकों की संख्या बढ़ती है और हर जगह इलाज की सहूलतें उपलब्ध हों, आवश्यकता पड़ने पर बड़े बड़े आप्रेश्न किए जाएं तो यह अच्छी बात है किंतु इसके साथ ही मैं इस बात पर भी  ज़ोर देना चाहूंगा कि विश्वविद्यालयों के स्तर को अधिक से अधिक बेहतर किया जाए। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि विश्वविद्यालयो के लिए मानक निर्धारित किए जाएं ताकि पता चले के आदर्श मानकों के आधार पर कौने से विश्वविद्यालय आवश्यक स्तर से नीचे हैं ताकि उनके स्तर को ठीक करने के लिए सटीक प्रयास किए जा सकें।   ]

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