islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. ईर्ष्या का परिणाम

    ईर्ष्या का परिणाम

    ईर्ष्या का परिणाम
    Rate this post

    भारी वर्षा हो रही थी और कारवां कठिनाई से आगे बढ़ रहा था। काफिले में एक शंज़बेह नामक बैल था कि जो थकन के कारण एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ा सकता था। कारवां के स्वामी को अपने व्यापारिक सामान की चिंता थी, उसने निर्णय लिया कि बैल को वहीं छोड़ आगे बढ़ना चाहिए। उसने अपने एक सेवक को बुलाकर कहा यहीं शंज़बेह के पास ठहर जाओ। जब वर्षा रुक जाये और बैल चलने योग्य हो जाये तो उसे अपने साथ लेते आना। कई घंटे बाद अंततः वर्षा थम गयी। किन्तु शंज़बेह अभी भी चल नहीं सकता था। सेवक भूखा और प्यासा था और उसे डर था कि कहीं अंधेरा न हो जाये और वह रास्ता भूल जाये। शंज़बेह को वहीं छोड़ कर वह कारवां की ओर चल दिया कि जिसने कुछ दूरी पर पड़ाव डाला हुआ था। कारवां के स्वामी ने जब सेवक को अकेला देखा तो उससे शंज़बेह के बारे में पूछा। सेवक ने दिखावटी दुख प्रकट करते हुए कहा शंज़बेह थकन और भूख से मर गया इस लिए मैं अकेला आने के लिए मजबूर हो गया। काफिले को स्वामी को शंज़बेह की मौत का समाचार सुनकर काफी दुख हुआ किन्तु उसने सोचा कि अब किया भी क्या जा सकता है। शंज़बेह कि जो अकेला रह गया था और सोच रहा था कि यह उसके जीवन की अंतिम घड़ी है खड़ा हुआ और अधमरी हालत में लड़खड़ाता हुआ एक ऐसे स्थान पर पहुंच गया जहां हरी भरी घास और स्वच्छ जलवायु थी। हरी भरी घास खाकर और नदी का पानी पीकर उसकी जान में जान आई। उसने निर्णय लिया कि वहीं रहेगा। कुछ दिन इसी प्रकार बीत गये। एक दिन जब शंज़बेह टहल रहा था ईश्वर की इन सब अनुकंपाओं से उत्साहित होकर वह अनैच्छिक चिल्लाया। कुछ दूरी पर शेर ने उसके चिल्लाने की आवाज़ सुन ली। शेर उस वन का राजा था और वहां के सभी जानवर भेड़िये से लेकर चूहे तक उसकी प्रजा थे। उसने कभी भी इस प्रकार की धहाड़ नहीं सुनी थी इस लिए वह डर से कांप गया। तेज़ी से महल की ओर बढ़ गया। वह नहीं चाहता था कि कोई उसके भय को भांप ले। उसने सोचा कि जिस जानवर की ऐसी गरज है वह कितना विशालकाय एवं शक्तिशाली होगा, किन्तु मैं उससे नहीं डरता हूं। लेकिन इन बातों का कोई लाभ नहीं था शेर बिन बुलाये महमान से भयभीत था। वन में करटम एवं दिमने नाम के दो गीदड़ भी रहते थे. दिमने अधिकतर चतुर एवं होशियार था और बहुत ध्यान से कार्य करता था। इसी जिज्ञासा के कारण वह शीघ्र समझ गया कि कुछ दिन से शेर घूमने फिरने महल से बाहर नहीं निकल रहा है। वह देख रहा था कि अधिकांश समय शेर कछार के अन्दर ही रहता है। दिमने ने अपनी ग़ुफा के निकट टहलते हुए सोचा आवश्य कोई गड़बड़ है, मुझे पता लगाना चाहिए। तुरन्त वह अपने मित्र कलीले के पास गया, प्रणाम किया और कहा प्रिय कलीले नहीं पता कि तुम जानते हो या नहीं? कलीले ने पूछा किस बारे में बात कर रहे हो? दिमने ने कहा कुछ दिन से शेर महल से बाहर नहीं आया है। लगता है कोई समस्या है। मैं जिज्ञासा से मर रहा हूं जिर प्रकार भी हो सके इसका पता लगाना चाहता हूं. कलीले ने कहा, अरे भाई दिमने तुझे इससे क्या लेना देना, वह महाराजा है और हम उसके सेवक, बड़ों के मामले में टांग अड़ाने का परिणाम अच्छा नहीं होता है. दिमने ने कहा बुद्धि से काम लो। मैं समान्य सेवक बनकर नहीं रहना चाहता. मैं चाहता हूं उच्च पद ग्रहण करूं और शेर के निकटतम सलाहकारों में शामिल हो जाऊं। कलीले ने कहा ऊंचा उड़ने की भी एक सीमा होती है। जो कुछ हो उसी पर संतोष करो। संभवतः उसे सैर में दिलचस्पी न हो। दिमने ने कहा ऐसा नहीं है। मुझे महल में जाना चाहिए और शेर से निकट से बात करनी चाहिए। कलीले कि जो उसे मनाने में असहाय हो गया था कहा, ठीक है। मैं तुम्हारी भलाई चाहता हूं मेरा कर्तव्य था कि तुम्हें इस बारे में बताऊं। दिमने उसी दिन शेर के महल में गया। जो कुछ उसे कहना था भर रास्ते मन ही मन में दोहराता रहा। महल के द्वारा पर पहरा दे रहे चौकीदार से आज्ञा ली और महल के भीतर चला गया। पहली बार महल में प्रवेश किया था। दिमने महल को देखकर बहुत उत्साहिक हो रहा था। शेर को देखा कि वह अपने कुछ सलाहकारों के साथ कक्ष में बैठा हुआ है। आगे बढ़ा और कक्ष से कुछ दूरी पर खड़ा हो गया। जब शेर ने दिमने को देखा तो बाघ कि जो उसके निकट बैठा हुआ था उससे पूछा कि यह कौन है? बाघ कि जो दिमने जानता था शेर से उसका परिचय करवाया। शेर ने कहा मैं तेरे पिता को जानता था फिर दिमने को बुलाया और कहा आगे आओ। दिमने सादर प्रणाम कर कुछ क़दम आगे बढ़ा। शेर कि जो सिंहासन पर बैठा हुआ था और अपने पैर को हिला रहा था कहा अभी तक कहां थे और किया करते थे? दिमने ने पुनः सादर प्रणाम किया और कहा जहां भी आप ही की छत्रछाया में था और इस दिन की प्रतिक्षा कर रहा था कि यह सुअवसर मुझे प्राप्त हो और आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊं। यह सेवक सेवा के लिए उपस्थित है। शेर को दिमने की बातें अच्छी लगीं उसने कहा बुद्धिमान जानवर हो। जब भी चाहो यहां आ सकते हो। दिमने बहुत प्रस्न्न हुआ और हज़ारों मनोकामनाएं लेकर महल से बाहर आया। उस रात सोच सोचकर दिमने को नींद नहीं आ रही थी।

    दूसरे दिन फिर दिमने महल गया। महल के चौकीदार से गर्मजोशी से हालचाल पूछा और महल में प्रवेश कर गया। कक्ष में शेल अकेला बैठा हुआ था। अपनी योजना को व्यवहारिक बनाने हेतु उसके पास यह बेहतरीन अवसर था। आगे बढ़ा और सादर प्रणाम किया. शेर ने उसे पहचान लिया। दिमने ने कहा. महाराजा मैं कल आपकी सेवा में उपस्थित हुआ था ताकि आपसे कुछ पूछ सकूं। किन्तु आपके आसपास भीड़ थी। शेर ने कहा क्या बात है क्या कोई घटना घटी है। दिमने ने कहा, नहीं मुझे आशा है कि कोई ख़ास घटना नहीं घटी होगी। मैं अधिकांश आपको वन में टहलता हुआ देखता था। लेकिन कुछ दिन से नहीं देख रहा हूं। यदि गुस्ताख़ी न हो तो मैं इसका कारण जानने के लिए आया हूं। शेर दिमने के प्रश्न से चौंका, किन्तु इसे उसने प्रकट नहीं होने दिया। वह अपने हृदय का रहस्य उससे कहने से डर रहा था। इन कुछ दिनों में केवल दिमने ने उसकी कठिनाई को ओर ध्यान दिया था। उसने प्रयास किया कि इस अपनी इस स्थिति को छिपा ले कहा कुछ महत्वपूर्ण नहीं है। कुछ अस्वस्त हूं आराम से ठीक हो जाऊंगा। उसी समय अचानक गरजने की आवाज़ आई। शंज़बेह कि जो आस पास ही टहल रहा था पुनः उसने धहाड़ना आरम्भ कर दिया। भय से शेर का चेहरा सफ़ैद पड़ गया। उसने अपना सर नीचे झुका लिया ताकि दिमने उसे न देख सके। किन्तु दिमने कि जो नज़रें झकाकर उसे देख रहा था उसके डर को भांप गया और उसने स्वयं से कहा, ओह हो, शेर इस आवाज़ से भयभीत है।

    ***

    इस सप्ताह इस कहावत के परिदृश्य में कि मैंने कहा, कौन था जो स्वीकार करे, एक कहानी सुनते हैं।

    सुनते हैं कि एक सीधे साधे व्यक्ति ने कुछ राशि एकत्रित की ताकि नगर की यात्रा पर जाये। वह चाहता था कि उस नगर से वस्तुएं ख़रीदे और अपने नगर में लाकर बेचे ताकि लाभ कमा सके और इस प्रकार बड़े व्यापार की स्थापना करे। सुबह सवेरे उठकर उस व्यक्ति ने जमा राशि को एक पोटली में रखकर कमर से बांध लिया और शहर की ओर चल दिया। रास्ते में एक चोर से उसकी भेंट हुई। उन्होंने प्रणाम का आदान प्रदान किया चोर ने सीधे साधे व्यक्ति से कहा, कहां जा रहे हो? उस व्यक्ति ने कहा शहर जा रहा हूं ताकि कुछ वस्तुएं ख़रीदूं और अपने शहर ले जाकर बेंचू। उसके बाद पैसों की पोटली की ओर संकेत करके कहा इस कम राशि से अधिक माल नहीं ख़रीदा जा सकता, परन्तु निंरतर इस काम को करता रहूंगा जब तक कि व्यापारी न बन जाऊं। चोर ने निर्णय कर लिया कि वह इस सीधे साधे आदमी से राशि लेकर रहेगा। बनावटी मुस्कुराहट से उसने कहा तुम बहुत जाने पहचाने लग रहे हो। हम एक दूसरे से कहीं मिल नहीं चुके हैं? उस व्यक्ति ने कहा नहीं, मुझे नहीं लगता। चोर कि जिसका निशाना चूक गया था उसे अपने घर ले जाने के लिए आग्रह करने लगा। सीधा साधा व्यक्ति सोच भी नहीं सकता था कि कि जिसके साथ वह है वह एक चोर है, कहा धन्यवाद, उचित होगा कि भीड़ भाड़ होने से पहले मैं बाज़ार पहुंचकर आवश्यक वस्तुओं की ख़रीदारी कर लूं। किसी और अवसर पर तुम्हारें घर आ जाऊंगा। चोर कि जिसका निशाना चूक गया था उससे विदा हुआ और चला गया। उसके बाद उसने अपने मित्रों को इसकी सूचना दी और कहा एक सीधे साधे व्यक्ति को मैंने खोज निकाला है। जिस प्रकार भी संभव हो सके हमें उसकी राशि चुरा लेनी चाहिए। चोरों ने मिल बैठकर षडयंत्र रचा उस व्यक्ति को खोजने बाज़ार की ओर चल दिये। काफ़ी खोज बीन के बाद उन्होंने उसे ढूंड निकाला। वे जब उससे मिले तो वह अपनी कुछ राशि खर्च कर चुका था। उन्होंने निर्णय किया कि कोई ऐसी चाल चलें ताकि शेष राशि उनके हाथ लग जाये। चोरों के मुखिया ने एक योजना बनाई और सबने उससे सहमति जताई। चोरों का मुखिया धीरे धीरे उस सीधे साधे व्यक्ति के पास पहुंचा। उसके चेहरे की ओर देखा मानो कोई बहुत पुराना मित्र अचानक उसे बाज़ार में मिल गया हो, आगे बढ़ा उत्साहपूर्वक प्रणाम किया और उसके हाथ चूमकर कहा आश्चर्य है श्रीमान ख्वाजा सहमुद्दीन! किस कारण बाज़ार में पधारे हैं? मुझ जैसे किसी व्यक्ति को कि जो आपसे बहुत श्रद्धा रखते हैं आदेश दे दिया होता ताकि जो कुछ आपको चाहिए था वह ख़रीद लेते। सीधे साधे व्यक्ति ने कि जिसकी समझ में चोरों के मुखिया की बातें नहीं आ रही थीं उससे कहा, ऐसा प्रतीत होता है कि आपको धोका हुआ है, मैं ख़्वाजा सहमुद्दीन नहीं हूं। चोरों के मुखिया ने कहा मैं जानता था मैं जानता था कि सदैव की तरह आप विनम्रतापूर्वक व्यवहार करेंगे और अज्ञात रहने का प्रयास करेंगे। किन्तु मुझ जैसे सेवक आपको तुरन्त पहचान लेते हैं। भोजन का समय है यदि आपकी आज्ञा हो तो यहीं निकट ही के एक भोजनालय में चला जाये। उस व्यक्ति ने कहा मैं ख़्वाजा सहमुद्दीन नहीं हूं। अभी उसकी बात भी समाप्त नहीं हुई थी कि एक दूसरा चोर उसके पास आया और कहा, प्रणाम महान ख़्वाजा सहमुद्दीन। फिर वह झुका और उसके हाथों को चूमा। सीधे साधे व्यक्ति को और अधिक अचरज हुआ और उन दोनों से कहा भाईयों तुम्हे धोका हुआ है। मैं ख़्वाजा सहमुद्दीन नहीं हूं। चोरों के मुखिया ने दूसरे चोर की ओर देखकर कहा तुम देख रहो हो? देख रहे हो कि ख़्वाजा कितने विनम्र हैं? यहां तक कि वह नहीं चाहते कि मेरे और तुम्हारे जैसे लोग कि जो उनके भक्त हैं उनका नाम ज़बान पर लाये। कुछ देर बाद एक और दूसरा चोर आया। झुक कर प्रणाम किया और उस व्यक्ति का हाथ चूमा और कहा, मैं कितना भाग्यशाली हूं कि जो आज बाज़ार में श्रीमान ख्वाजा सहमुद्दीन के दर्शन हो गये। आपके दर्शन करना मेरी मनोकामना थी। एक एक कर चोर आते रहे और सीधे साथे व्यक्ति को ख्वाजा सहमुद्दीन कह कर संबोधित करते रहे और दोपहर के भोजन के लिए अनुरोध करते रहे। उस व्यक्ति ने स्वयं से कहा, इन बेचारों को धोका हुआ है और मुझे कुछ और समझ रहे हैं। निश्चिंत मैं ख़्वाजा सहमुद्दीन के बहुत समान हूं कि जिसे यह बहुत चाहते हैं। अतः इनके साथ जाकर खाना खाने में किया बुराई है? कोई बात नहीं उन्हें यही समझने दो कि उन्होंने ख्वाजा सहमुद्दीन को ही खाने पर निमंत्रित किया है। सीधा साधा व्यक्ति चोरों के घेरे में भोजनालय की ओर चल दिया। वहां विभिन्न प्रकार के खानों का आदेश दिया गया। कोई कहता था कि यहां का मट्ठा बहुत अच्छा है ख्वाजा सहमुद्दीन के लिए लाया जाये। कोई कहता था कबाब लेकर आओ। संक्षेप में उनमें से प्रत्येक कुछ न कुछ लाने के लिए आदेश दे रहा था। अब उस सीधे साधे व्यक्ति को ख़्वाजा सहमुद्दीन कहे जाने पर कोई आपत्ति नहीं थी। उसने चोरों के साथ भोजन खाया। खाना खाने के बाद किसी न किसी बहाने से एक एक करके सभी चोर ख़्वाजा सहमुद्दीन को ऊंघता हुआ छोड़कर चले गये। सीधे साधे व्यक्ति को उस समय होश आया कि जब सारे चोर जा चुके थे और भोजनालय का स्वामी उसके सर पर खड़ा समस्त भोजन के मूल्य चुकाने की मांग कर रहा था। सीधे साधे व्यक्ति ने कहा उन्होंने मुझे निमंत्रित किया था, भोजन के मूल्य मैं क्यों दूं। किन्तु वे कह रहे थे कि आप ख्वाजा सहमुद्दीन हैं और यह उचित नहीं है कि आपके होते हुए वे अपनी जेबों में हाथ डालें, और भोजन के मूल्य चुकायें। सीधे साधे व्यक्ति ने कहा देखा मैं कैसे फंस गया? मैंने सैकड़ों बार उनसे कहा कि मैं ख्वाजा सहमुद्दीन नहीं हूं, परन्तु कौन विश्वास कर रहा था? सीधे साधे व्यक्ति ने बाध्य होकर अपने और चोरों के भोजन के मूल्य चुकाये और भोजनालय से बाहर निकल आया। जब उसने देखा कि ख्वाजा सहमुद्दीन कहने वाला कोई भी अब उसके आस पास नहीं है तो समझ गया कि उसे टोपी पहनाई गयी है और धोका दिया गया है।

    उसके बाद से जब भी कभी कोई यह आभास करता है कि दूसरे उसे धोका देना चाहते हैं, इस कहावत की ओर संकेत करता है और कहता हैः मैंने कहा तो, कौन था जो स्वीकार करे।