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    ईर्ष्या का परिणाम- भाग 2

    ईर्ष्या का परिणाम- भाग 2
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    शन्ज़बे नामक बैल अपने गल्ले से अलग होकर एक हरे-भरे जंगल पहुंच गया और वहीं रह गया। एक दिन वह अनुकंपाओं से मस्त होकर अचानक चिल्लाया। उससे कुछ दूर पर खंड़े शेर ने जो कछार का शासक था, बैल की आवाज़ सुनी और चूंकी उसने आज तक ऐसी आवाज़ नहीं सुनी थी इसलिए वह उस आवाज़ से भयभीत हो गया। शेर सोचने लगा कि जिस पशु की ऐसी आवाज़ है वह बहुत बड़ा व शक्तिशाली पशु होगा। शेर ने अपने भय को छिपाया किन्तु विगत की भांति अब वह कछार का चक्कर नहीं लगाता था। कछार में मौजूद पशुओं में केलीले और दिमने नामक दो सियार भी रहते थे। दिमने जो अधिक बुद्धिमान था शेर के व्यवहार में आए परिवर्तन को समझ गया और केलीले की नसीहतों के बावजूद अपने मन में ऊचे पद व स्थान तक पहुंचने की इच्छा के कारण शेर के व्यवहार में इस परिवर्तन के कारण का पता लगाने निकला ताकि इस प्रकार स्वयं को शेर के निकट कर सके। एक दिन वह शेर के निकट था कि शेर की परेशानी का कारण उससे पूछे कि अचानक शन्ज़बे बैल चिल्लाया। शेर के चेहरे का रंग भय से सफ़ेद हो गया। शेर ने अपना चेहरा नीचे झुका लिया ताकि दिमने उसके भयभीत चेहरे को न देख सके किन्तु दिमने शेर के भयभीत होने का कारण समझ गया और अपने में उसने कहाः अच्छा तो शेर इस आवाज़ से डरता है। दिमने साहस जुटाते हुए कहाः महाशेर क्या आपकी चिंता कारण यह आवाज़ नहीं है? शेर न जब देखा कि उसके भय का राज़ दिमना समझ गया है तो उसने विवश होकर दिमने की बात की पुष्टि कर दी। दिमने ने कहाः आपको इस आवाज़ से भयभीत नहीं होना चाहिए। यदि आप हमें अनुमति दें तो मैं अभी जाकर इस आवाज़ के बारे में पता लगाता हूं। शेर इस काम के लिए तय्यार नहीं था किन्तु उसने दिमने को भवन से जाने की अनुमति दे दी। दिमने जंगल का चक्कर लगाया। अचानक उसकी दृष्टि एक ऐसे पशु पर पड़ी जिसे उसने अब तक कछार के आस पास नहीं देखा था। दिमने ने स्वयं से कहाः निःसंदेह यह वही पशु है जिससे शेर भयभीत है। फिर वह शन्ज़बे को देखे बिना जिस मार्ग से आया था पलट गया और भवन में गया। दूसरी ओर शेर दिमने को भेजने पर पछता रहा था और डर रहा था कि कहीं उसके राज़ को खोल न दे। शेर बेचैनी के कारण नहीं बैठ रहा था इसलिए भवन के फाटक की ओर गया। भवन के बाहर शेर ने दिमने को आते हुए देखा। शेर ने तुरंत दिमने से पूछाः क्या हुआ? उसे देखा? कुछ पता चला? दिमने ने जो शेर के भयभीत होने व बेचैन होने से आनंदित हो रहा था और स्वयं को शेर से ऊंचा समझ रहा था कहाः जी शेर महोदय मैंने उसे देखा। वह एक बड़ा व मज़बूत पशु है जिसे मैंने भी अब तक नहीं देखा था। घास खाता है और मुझे ख़तरनाक पशु नहीं लगता। यदि आप बेहतर समझें तो मैं उसे भवन लेता आउं ताकि आप उसे निकट से देखिए। शेर को दिमने की बातों से कुछ शांति मिली किन्तु उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। उसे भवन में बुलाने का आमंत्रण दे या उसे मारने का आदेश दे दे? दिमने से कहाः तुम्हें क्या ठीक लगता है? दिमने भी शेर के मुंह से यही सुनना चाहत रहा था कि शेर उससे परामर्श करे। इससे बेहतर और क्या आनंद हो सकता है। दिमने ने चलते चलते हुए कहाः बेहतर होगा उसे यहां ले आउं ताकि आप उससे परिचित हो जाएं। शायद उसे देख कर आपमें भय व व्याकुलता समाप्त हो जाए। शेर इस सुझाव को मान लिया और दिमने शन्ज़बे को ढूंढने चला गया। चलते चलते दिमने हंस कर स्वयं से कह रहा थाः हा हा दिमने महोदय, बधाई हो। धीरे धीरे शेर के सलाहकार बन रहे हो। बहुत शीघ्र प्रगति की। इस समझदारी व बुद्धिमत्ता पर बधाई हो। यह कह कर दिमने ने दौड़ना आरंभ कर दिया। जिस समय शन्ज़बे के निकट पहुंचा वह घास चर रही थी। इस बार शन्ज़बे ने उसे देख लिया। दिमने ने ऊंचे स्वर में कहाः सलाम! मेरा नाम दिमने है। मुझे शेर महोदय ने यहां भेजा है और मुझसे कहा है कि तुम्हें उनके पास ले चलूं। शन्ज़बे जो घास खाने में व्यस्त थी बहुत ही ठंडे मन से कहाः शेर कौन है? दिमने ने आगे बढ़ कर कहाः कछार का शासक शेर है और सभी पशु उसका आज्ञापालन करते हैं। तुम भी चलो उनसे परिचित हो जाओ। शन्ज़बे ने चरना रोक दिया और कहाः यदि वचन दो कि मेरे प्राण को ख़तरा नहीं है तो तुम्हारे साथ चलूंगी। दिमने ने कहाः निश्चिंत रहो तुम्हारा प्राण सुरक्षित है। शन्ज़बे मान गयी और दोनों चल पड़े। दिमने उससे बातचीत के दौरान यह समझ गया कि यह परदेसी पशु एक बैल है और उसका नाम शन्ज़बे है। जैसे ही दोनो भवन पहुंचे शेर शन्ज़बे को देख कर डरा किन्तु जब उसने देखा कि छोटे से शरीर वाला दिमने निश्चिंत होकर उसके साथ चल रहा है तो शेर ने अपना भय छिपा लिया और शन्ज़बे का स्वागत किया फिर उससे पूछाः कहां से आर रही हो और इस कछार में क्या कर रही हो? शन्ज़बे ने अपने आने की पूरी घटना शेर को सुनाई। शन्ज़बे का अच्छे ढंग से बात करना शेर को बहुत दिलचस्प लगा और उसने शन्ज़बे से कहाः अब जब कि भाग्य यहा ले आया और स्वयं तुम भी यहां रहने पर संतुष्ट हो तो सदैव के लिए हमारे पास रहो यहां तक कि तुम्हारे रहने सहने की सुविधाएं मुहैया कर दूं, भवन में हमारे साथ जीवन यापन करो। शन्ज़बे ने जो शेर के निमंत्रण से प्रसन्न थी कहाः आपकी सेवा में रहना हमारे लिए गर्व की बात है। पूरे मन से आपका निमंत्रण स्वीकार है, मैं भवन में रहूंगी। दिन बीतने के साथ ही शेर भी शन्ज़बे के निकट होता जा रहा था। शेर जितना शन्ज़बे से बात करता उसकी सच्चाई व ईमानदारी से अधिक अवगत होता जाता। यहां तक कि शेर ने उसे अपना विशेष सलाहकार नियुक्त कर लिया और बहुत से मामलों में उसका दृष्टिकोण पूछता था। दिमने को जो इस दौरान निरंतर भवन में आता जाता था, इस मित्रता का पता चल गया। धीरे धीरे द्वेष की आग उसके मन में तेज़ होती जा रही थी। स्वयं को दोषी ठहराता था। न तो विरोध कर सकता था और न ही इस मित्रता को सहन कर पा रहा था। एक दिन द्वेष की आग में जलते हुए अपने मित्र केलीले के पास गया और कहाः यह हाथ टूट जाए। जो स्थान मुझे मिलना चाहिए था वह मैंने शन्ज़बे के हवाले कर दिया। काश उसे भवन न ले जाता और शेर से उसे जान से मारने के लिए कहता। केलीले ने ने जब उसकी अप्रसन्नता को देखा तो पूछाः क्यों? क्या हुआ? क्यों क्रोधित हो? दिमने ने क्रोध भरे स्वर में कहाः क्यों न हूं, शन्ज़बे को शेर से परिचित कराया था इस आशा से कि शेर मेरे इस काम से प्रसन्न होगा और मुझे कोई पद देगा। अब वही बैल जिससे शेर भयभीत रहता था, उसकी सबसे अच्छी मित्र हो गयी है। यदि तुम मेरे स्थान पर होती तो क्या करती? क्या हंसती और ईश्वर का आभार प्रकट करती? अब पहले की भांति शेर की कृपा दृष्टि मुझ पर नहीं रह गयी। इससे पहले की स्थिति और ख़राब हो कोई मार्ग ढूंढना होगा। हां कुछ करना होगा कि शेर अपने पंजों से शन्ज़बे को मार डाले। केलीले ने कहाः शांत हो जाओ! यह क्या कह रहे हो! द्वेष ने तुम्हें अंधा कर दिया है। किस प्रकार उसे अपने मार्ग से हटा सकते हो जबकि वह तुमसे बड़ी और अधिक समझदार है। दिमने ने कहाः मेरे छोटे शरीर को मत देखो मैं उससे अधिक समझदार हूं। केलीले ने जो दिमने को शांत करने का प्रयास कर रहा थाः कहाः हां बुद्धिमान हो किन्तु शन्ज़बे भी बहुत समझदार है जभी तो उसने शेर को जीत लिया है। मुझे नहीं लगता कि उससे शत्रुता का कोई परिणाम निकलेगा। प्रायः समस्याएं, मित्रता द्वारा बेहतर ढंग से हल हो सकती हैं। अपने मन में इतना द्वेष मत बढ़ाओ। इसके बजाए सही मार्ग से अपनी इच्छा तक पहुंचो। दिमने ने कहाः नहीं कर सकता। यह द्वेष मुझे मार रहा है। मैत्रीपूर्ण व्यवहार के लिए कहते हो क्या ऐसा हो सकता है? ठीक कहते हो वह मुझसे बड़ी और अधिक समझदार है। किन्तु तुम्हें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि वह मुझ पर भरोसा करती है और मुझे अपना मित्र समझती है। मेरे लिए यही काफ़ी है और इसी विश्वास द्वारा मैं उसे शेर की नज़रों से गिरा दूंगा। केलीले ने जब यह देखा कि इस विषय पर और कुछ कहना बेकार है तो धीरे से स्वयं से कहाः जो चाहे करो केवल इतना याद रहे कि तुम्हारे काम का अंजाम अच्छा नहीं होगा।