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    ईश्वरीय आतिथ्य-13 ईश्वर से पापों की क्षमा याचना

    ईश्वरीय आतिथ्य-13 ईश्वर से पापों की क्षमा याचना
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    हे पालनहार, आज के दिन मुझसे मेरे पापों का हिसाब न ले और मेरी ग़लतियों और पापों को क्षमा कर दे और मुझे आपदाओं में ग्रस्त न कर। तुझे तेरी गरिमा और मर्यादा की सौगंध, हे मुसलमानों को गरिमा प्रदान करने वाले।

    रमज़ान के पवित्र दिनों में मनुष्य ईमान के साथ ईश्वरीय पहचान के ऐसे चरण में पहुंच जाता है कि बहुत ही विनम्रता से ईश्वर से इच्छा व्यक्त करता है कि उसके पापों को क्षमा कर दे और उससे हिसाब किताब न ले और उसे दंडित न करे। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि मनुष्य के जीवन पर पापों का बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। मनुष्य जो भी पाप करता है उस से वह अपनी आत्मा और मानस पटल को प्रदूषित कर लेता है और कल्याण और सफलता के मार्ग से दूर हो जाता है। इसीलिए पापी व्यक्ति कभी कभी इस बात का भी आभास करने लगता है कि वह ईश्वरीय अनुकंपाओं और विभूतियों से कट कर रह गया है। कुछ अवसरों पर उसका हृदय इतना गंदा और पापों से दूषित हो जाता है कि उसे किसी भी प्रकार के अत्याचार और अन्याय से संकोच नहीं होता है। पवित्र क़ुरआन जब लोगों को पाठ सिखाने के लिए पूर्वजों की कथाएं बयान करता है तो इस बिन्दु को याद दिलाता है कि हमने नगरों को उसमें रहने वालों के अत्याचारों के कारण विनष्ट किया। पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के कथनों से जो बात समझ में आती है  वह यह है कि समस्त ग़लतियों की जड़, संसार में सीमा से अधिक व अनुचित प्रेम व लगाव है। हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम इस संबंध में कहते हैं कि हर पाप की जड़, संसार से प्रेम है।

    भाग्यशाली वह है जो एक पाप के बाद, यद्यपि वह कितना ही छोटा क्यों न हो, ईश्वर से प्रायश्चित कर लेता है क्योंकि ईश्वर हर कर्म को चाहे वह एक कण के बराबर ही क्यों न हो देखता है और उसके बारे में प्रश्न करता है और उस समय पापी को अधिक घाटा उठाना पड़ता है। सर्वसमर्थ व महान ईश्वर बेहतरीन क्षमा करने वाला और अपने बंदों से बहुत शीघ्र ही प्रसन्न होने वाला है। इसीलिए ईश्वर को सरीउर्रेज़ा अर्थात जल्दी प्रसन्न होने वाला कहते हैं। ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन में अपने बंदों से अपनी तौबा और पापों के प्रायश्चित के लिए आग्रह किया है और कहा है कि क्या यह नहीं जानते कि ईश्वर अपने बंदों की तौबा स्वीकार करता है और सदक़ा अर्थात विशेष दान जो बंदे उसके नाम पर देकर लोगों की सहायता करते हैं उसको लेता है और वही बड़ा तौबा स्वीकार करने वाला और दयालु है।

    ईश्वर आवश्यकतामुक्त है और यह ऐसी स्थिति में है कि हमारे पास उसके अतिरिक्त कोई और नहीं है। उसके अतिरिक्त कौन है जो हमारे तौबा को स्वीकार कर सकता है और हमारे पापों को क्षमा कर सकता है। आइये पवित्र रमज़ान की विभूतियां भरी रातों और दिनों में ईश्वर के दरबार में, उससे अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं और उससे पापों को माफ़ करने की विनती करते हैं।

    ईरान के प्रसिद्ध कवि मौलवी की मसनवी में एक कथा बयान की गयी है कि एक व्यक्ति के मृत्यु का समय निकट होता है। उसके पास धन दौलत, पत्नी, घर बार और बड़ा सा बाग़ सब कुछ था। उसके पास एक पवित्र क़ुरआन भी था जो उसके पास वर्षों से था और उससे उसे बहुत लगाव था। उसने जीवन के अंतिम क्षणों में अपनी पत्नी से कहा कि मेरा अंतिम समय आ गया है और मैं शीघ्र ही परलोक सिधारने वाला हूं। तुम वर्षों से मेरे साथ थी और मेरी ख़ुशी और दुखों में तुमने मेरा साथ दिया। अब तुम बताओ के मेरे बाद तुम क्या करोगी। पत्नी ने उससे कहा कि तुम तो जानते हो कि मैं इस यात्रा में तुम्हारे साथ नहीं जा सकती। तुम्हारे बाद मैं अपने जीवन को जारी रखूंगी और शायद दूसरा विवाह भी कर लूं। पुरुष ने निराश होकर अपने बाग़ की ओर देखा और कहा यहां केवल एक बंजर था मैंने उसे उपजाऊ बनाया और फिर बाग़ लगाकर हरियाली में परिवर्तित किया, हे बाग़ मैने तुम्हारे साथ बड़ी मेहनत की है अब मेरा अंतिम समय है, क्या तुम मेरे साथ आओगे या मेरी पत्नी ही की भांति मुझे धोखा दोगे। बाग़ ने कहा कि तुमने दूसरों की बोई हुई फस्ल खाई और दूसरों के लगाए हुए पेड़ से फल खाएं हैं और अब तुम अपने हाथों से लगाए गये पेड़ों से दूसरों को फल खाने देना नहीं चाहते। चलो अपना रास्ता देखो, मैंने तुम्हारे जैसे हज़ारों मालिक देखे हैं और बाद में भी तुम्हारी तरह हज़ारों मालिक देखूंगा। पुरुष बहुत दुखी हुआ और दुखद लहजे में कहने लगा। दुर्भाग्यशाली वह है जो संसारिक मायामोह में ग्रस्त हो और जब उसकी शक्ति समाप्त हो जाती है और बुढ़ापा आ जाता है तो न निकट संबंधी और परिवार काम आता है, न धन दौलत। उसके बाद उसने पवित्र क़ुरआन को अपने हाथों में लिया और कहा कि हे दुखी दिलों के साथी, हे आवश्यकता रखने वालों की पुकार, वर्षों से, मुझमें जितनी क्षमता थी, तेरी तिलावत की और तेरी सुन्दर शिक्षाओं से अपने हृदय को प्रकाशमयी किया। मैं जो कि परलोक की यात्रा पर जा रहा हूं, तो क्या तेरा प्रकाश, प्रलय की यात्रा में मेरे अंधकारमयी मार्ग को उज्जवल करेगा। पवित्र क़ुरआन से आवाज़ आईः मैं मज़बूत रस्सी हूं, जो भी मेरे साथ हो जाता है, मैं उसे अपमानित नहीं होने देता और उसे विभूतियों के घर में उतार देता हूं और ईश्वरीय पहचान के स्थान पर ईश्वर की प्रसन्नता तक पहुंचा देता हूं। संतुष्ट रहो कि मैं क़ब्र के अंधेरे में जलते हुए दिए की भांति तुम्हारे साथ हूं।

    लोक परलोक के जीवन में मनुष्य के साथ सदैव रहने वाला और बेहतरीन मित्र, पवित्र क़ुरआन और सदकर्म है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम एक स्थान पर कहते हैं कि यह बात सच है कि मुसलमान पुरुष के तीन मित्र होते हैं। एक मित्र जो यह कहता है कि तेरे जीने मरने में मैं तेरे साथ हूं, वह उसका चरित्र और कर्म है। दूसरा मित्र जो यह कहता है कि मैं केवल क़ब्र के किनारे तक तेरे साथ हूं और उसके बाद तेरा साथ छोड़ दूंगा, वे उसकी संतान और पत्नी है। तीसरा मित्र कहता है कि मैं तेरे मरने तक तेरे साथ हूं वह उसकी धन दौलत है।

    हम में से हर एक, जहां कहीं भी हो, एक निर्धारित समय पर, एक निर्धारित स्थान पर जिसके बारे में हमें कुछ ज्ञात नहीं है, मौत के फ़रिश्ते से भेंट करेगा। यह बात स्पष्ट है कि जो लोग ईश्वर से जुड़े होते हैं और सांसारिक मायामोह में ग्रस्त नहीं होते, उनका इस मिट्टी के शरीर से अलग होना बहुत ही सरल, सुन्दर और मनमोहक होता है और यदि मनुष्य की जान सांसारिक मायामोह में अटकी रहती है तो मिट्टी के इस शरीर अर्थात भौतिकवाद से उसका अलग होना बहुत कठिन होता है। बुद्धिमान और दूरदर्शी वह है जो सदैव इस प्रयास में रहता है कि उसके जीवन का कोई भी क्षण ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के प्रयास के अतिरिक्त कहीं और ख़र्च न हो। महापुरुषों ने कहा है कि हर बंदे की आयु, ईश्वर की अमानत है कि मरने के बाद जिसके बारे में प्रश्न किया जाएगा और हिसाब किताब मांगा जाएगा। यदि उसमें लापरवाही की तो उसने ईश्वर की अमानत को बर्बाद किया और यदि समय से भरपूर लाभ उठाया और उसका सही उपयोग किया तो उसने ईश्वर की अमानत की बड़े अच्छे ढंग से रक्षा की है।

    जिस प्रकार अन्य महीनों की तुलना में रमज़ान का पवित्र महिना विशेषताओं और गुणों का स्वामी होता है उसी प्रकार इस महीने में किए जाने वाले कर्मों के भी विशेष प्रकार के पारितोषिक होते हैं। इसी लिए मुसलमान इस महीने में निर्धन और दुखी लोगों की सहायता को अपना दायित्व समझते हैं और हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास करता है। इसी के साथ कुछ लोग मनुष्य के जीवन को प्रकाशमयी बनाने के लिए सूर्य की भांति होते हैं। इन्हीं में से एक व्यक्ति स्वर्गीय शैख़ रजब अली नीकूगूयान थे। वे बहुत ही साधारण व सामान्य जीवन व्यतीत करते थे किन्तु उनके शिष्टाचार और परिज्ञान की चर्चा सभी लोगों की ज़बान पर थी।

    शैख़ रजब अली ख़य्यात एक दर्ज़ी थे। फ़ारसी और अरबी भाषा में ख़य्यात दर्ज़ी को कहा जाता है। उन्होंने आधारिक रूप से किसी धार्मिक स्कूल या विश्वविद्यालय में ज्ञान प्राप्त नहीं किया किन्तु अधिकतर ज्ञान,परिज्ञान और आध्यात्म से जुड़े महापुरुषों की सेवा में रहते थे। उनके शिष्यों में से एक थे करबलाई अहमद तेहरानी। वे अपने उस्ताद शैख़ के बारे में कहते हैं कि शैख़ अर्थात दानशीलता और मानवता। वे बड़े ही अनोखे ढंग से निर्धनों की सेवा करते थे, यहां तक कि निर्धनों की चिंता उन्हें सोने नहीं देती थी। इसीलिए वे अपने मित्रों से बारम्बार कहते थे कि हमारी और तुम्हारी जेब एक ही है और इसमें कोई अंतर नहीं है। जब भी पैसों की आवश्यकता हो बे झिझक मुझ से मांग लेना, मुझ पर तुम्हारा अधिकार है।

    वे लोगों के प्रति भलाई को ईश्वरीय प्रसन्नता का आधार मानते हैं जैसा कि पवित्र क़ुरआन में आया है कि हम केवल ईश्वर की प्रसन्नता के कारण तुम्हें खिलाते हैं न तुम से कोई बदला चाहते हैं और न आभार।

    शैख़ रजब अली ख़य्यात कहते हैं कि यदि वास्तविक एकेश्वरवाद के मार्ग को खोजना चाहते हो तो लोगो से भलाई करो। बंदों से भलाई, उपासना और एकेश्वरवाद के मार्ग की भूमि प्रशस्त करता है। उन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लोगों की भलाई और विभिन्न समस्याओं के निवारण के लिए जो प्रयास किए उनके अतिरिक्त विभिन्न अवसरों पर अपने छोटे से घर में लोगों को खाना खिलाया करते थे और ईमान वालों को खाना खिलाने को विशेष महत्त्व देते थे। शैख़ रजब अली ख़य्यात का आचरण हमें एक महापुरुष के उस कथन की याद दिलाता है जिसमें उन्होंने कहा है कि ईश्वर का वास्तविक बंदा वह है जो ईश्वरीय गुणों को अपने कर्मों और व्यवहार की अंग्रिम सूचि में रखे। वह दयालु और कृपालु है, तुमको भी कृपालु बनना चाहिए। वह दानी और क्षमाशील है, तुमको भी दानी बनना चाहिए। वह भलाई और नेकी करने वाला है, तुम को भी भलाई करने वाला बनना चाहिए। तुम्हारे भीतर जितने अधिक ईश्वरीय गुण प्रकट होंगे तुम उतना ही ईश्वर की भांति बनते जाओगे और ईश्वर का उतराधिकारी बनने की योग्यता तुम में पैदा हो जाएगी।