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    ईश्वरीय आतिथ्य-6 दूसरों को खाना खिलाना

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    विश्व की जनसंख्या अब सात अरब के आंकड़े को पार कर चुकी है।  विश्व जनसंख्या दिवस पर जहां विश्व की बढ़ती हुई जनसंख्या का उल्लेख किया गया वहीं पर यह भी बताया गया है कि संसार के बहुत से क्षेत्रों में विकास एवं प्रगति के बावजूद इस समय भूखे लोगों की संख्या बढ़कर करोड़ों में पहुंच गई है।  विगत की तुलना में संसार में भूखों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही है।  भुखमरी आज के समाज की एक एसी कटु सच्चाई है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।  गणना से पता चलता है कि पांच हजार बच्चे कुपोषण और भुखमरी का शिकार होकर मौत के मुंह में समा जाते हैं। यह स्थिति तो केवल भारत की है।  दुनिया भर में प्रतिदिन चौदह हज़ार बच्चे खाने की कमी के कारण काल के गाल में समा जाते हैं।  वर्तमान समय में विश्व में भूखों की संख्या ९२ करोड़ बताई जा रही है।  यह सारे आंकड़े, सरकारी हैं और निश्चित रूप से संसार मे भूखों की संख्या इनसे अधिक ही होगी।  विश्व की बहुत सी संस्थाएं और संगठन संसार से भुखमरी और कुपोषण को समाप्त करने के लिए लंबे समय से प्रयासरत हैं किंतु उसके उल्लेखनीय परिणाम सामने नहीं आए बल्कि सर्वेक्षण यह बताते हैं कि विगत की तुलना में इस समय भूखों तथा कुपोषण के शिकार लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है।  इससे यह पता चलता है कि बढ़ती भुखमरी और कुपोषण इस बात को सिद्ध करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय  नेतृत्व भुखमरी के विरूद्ध संघर्ष में बहुत गंभीर नहीं हैं।  श्रोताओ दूसरों को खाना खिलाना एक अच्छी व  प्रभावी शैली है जो समाज को भूख, कुपोषण व निर्धनता से मुक्ति दिलाती है। अनाथों, दरिद्रों और आश्रयहीन लोगों के पेट भरने का बहुत पुण्य है।  यही कार्य समाज के लोगों के मध्य प्रेम व समरसता में वृद्धि का कारण भी बनता है और लोगों के बीच सहकारिता की  भूमि प्रशस्त होती है।  अच्छे कार्यों और लोगों की सहायता करने से लोगों के हृदय एक दूसरे से निकट हो जाते हैं।  महान ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन में इस कार्य पर बहुत अधिक बल दिया है विशेषकर पवित्र रमज़ान में खाना खिलाने पर।  पवित्र रमज़ान में प्रतिदिन पढ़ी जाने वाली हर दिन से विशेष दुआओं में भी दुखी, निर्धन और जीवन की कठिनाइयों से जूझते लोगों की सहायता पर विशेष ध्यान दिया गया है।  संसार में जो लोग कुछ करने की क्षमता नहीं रखते हैं या बुढ़ापे और शरीर के किसी अंग के निष्क्रिय हो जाने के कारण अपनी आवश्यकता की पूर्ति करने में सक्षम नहीं हैं उन्हें सक्षम लोंगो की सहायता की बहुत अधिक आवश्यकता होती है।  पवित्र क़ुरआन के अनुसार दरिद्रों, वंचितों एवं अनाथों को खाना खिलाना, आर्थिक दृष्टि से सक्षम लोगों का ही दायित्व बनता है।  इस आधार पर जिसकी जैसी भी आर्थिक क्षमता है उसे चाहिये कि वह उसी के अनुरूप ग़रीबों व दरिद्रों की सहायता करे।  निःसंदेह यदि धर्म की इस मूल्यवान शिक्षा को आज विश्व में लागू कर दिया जाये तो निश्चित रूप से  इतने व्यापक स्तर पर विश्व में लोग भूखमरी का शिकार नहीं होंगे।