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    ईश्वरीय आतिथ्य-8 क़ारून का ख़ज़ाना

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    आज-कल पवित्र रमज़ान के प्रकाशमय वातावरण में बीत रहा है। ये वे दिन हैं जिनमें ईश्वर वर्ष के दूसरे महीनों की तुलना में अपने बंदों पर अपनी असीम कृपा की वर्षा करता है। अपने मन व आत्मा को पवित्र रमज़ान की इस दुआ से शांति प्रदान करते हैः ईश्वर इस दिन भलाई व नेकी को मेरे लिए प्रिय बना दे और पाप व बुराई से मेरे मन में घृणा पैदा कर दे। आज के दिन अपने कोप की ज्वाला से मुझे सुरक्षा प्रदान कर। अपनी कृपा से हे विनती करने वालों की विनती सुनने वाले।

    इन सुंदर व मूल्यवान क्षणों में ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमारे मन में भले कर्मों के प्रति रुचि पैदा कर दे। जब किसी व्यक्ति को कोई कर्म अच्छा लगता है तो उसे पुनः अंजाम देता है तो वह व्यक्ति कितना सौभाग्यशाली है जिसके मन में ईश्वर भले कर्म के प्रति रुचि पैदा कर दे। इस्लाम धर्म के महापुरुषों का कहना है कि सद्कर्म अच्छी विशेषता है जो मनुष्य को परिपूर्णतः की ओर ले जाती है। भले कर्म के संबंध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैः भला-कर्म सदाचारी के स्वभाव में होता है जबकि बुराई, दुष्ट के स्वभाव में होती है। पवित्र क़ुरआन में बहुत सी आयतों में सदाचारियों की प्रशंसा की गयी है उन्हें मोहसेनीन शब्द के साथ याद किया गया है। इस पवित्र किताब में सदाचारियों की विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। भलाई करने वालों का मन दयालु होता है इसलिए वे दान-दक्षिणा करते हैं। पवित्र क़ुरआन में सदाचारियों की एक विशेषता यह बयान की गयी है कि वे ज़रूरतमंद व निर्धन व्यक्ति की वित्तीय सहायता करते हैं। जैसा कि सूरए आले इमरान की आयत क्रमांक 134 में ईश्वर कह रहा हैः वे ख़ुशहाली और कठिनाई दोनों ही स्थिति में अपने धन ज़रूरतमंदों में बांटते हैं, अपने क्रोध को पी जाते हैं, लोगों को क्षमा कर देते हैं और ईश्वर भलाई करने वालों को दोस्त रखता है। पवित्र क़ुरआन में सदाचारियों की एक और विशेषता यह बयान की गयी है कि वे अप्रिय घटना व विपत्ति की स्थिति में धैर्य और ईश्वर से भय रखते हैं। पवित्र क़ुरआन के शब्दों में सदाचारी कठिन स्थिति में धैर्य से काम लेते हैं और ईश्वर की मंशा पर सहमत रहते हैं। पवित्र क़ुरआन के सूरए तौबा में सदाचारियों को मिलने वाले पारितोषिक का उल्लेख किया गया है। जैसा कि सूरए तौबा की आयत क्रमांक 100 में आया हैः ईश्वर उनसे राज़ी व प्रसन्न है और उनके लिए स्वर्ग के ऐसे बाग़ बनाए हैं जिनके नीचे नहरें जारी हैं और यही बड़ी सफलता है।

    पैग़म्बरे इस्लाम के कथन में आया है कि सदाचारियों पर ईश्वर की कृपा दृष्टि होगी। ईश्वर ने उनका मार्गदर्शन किया और उन्हें ज्ञान व तत्वदर्शिता प्रदान की। इसी प्रकार ईश्वर सदाचारियों का अंत भलाई पर करता है इसलिए वे मोक्ष प्राप्त करने वालों में होंगे।

    आपने क़ारून और उसके ख़ज़ाने के बारे में अवश्य सुना होगा। क़ारून, हज़रत मूसा का चचेरा भाई था और उसे ईश्वरीय ग्रंभ तौरैत की बहुत जानकारी थी। वह आरंभ में मोमिन सदाचारियों की पंक्ति में था किन्तु धन-संपत्ति और घमंड उसे कुफ़्र की ओर ले गया यहां तक कि ज़मीन उसे निगल गयी। क़ारून अपनी महत्वकांक्षा में अति का शिकार था और बहुत ही कंजूस था। ईश्वर ने उसे इतना अधिक धन दिया था कि उसकी ख़ज़ानों की चाबियां शक्तिशाली व्यक्तियों के लिए उठाना बहुत कठिन हो गया था किन्तु क़ारून इन सभी अनुंकपाओं का आभार व्यक्त करने के बजाए बनी इस्राईल के सामने शेखी बघारता और निर्धनों व कमज़ोरों का अपमान करता था। जैसे जैसे क़ारून की संपत्ति बढ़ती वैसे वैसा उसका घमंड बढ़ता जाता था। बनी इस्राईल के बुद्धिमान व सदाचारी व्यक्ति क़ारून को इस बात की नसीहत करते थे कि ईश्वर ने जो कुछ तुम्हें दिया है उससे परलोक की सफलता के लिए प्रयास करो। धन-संपत्ति कुछ लोगों के विचारों के विपरीत बुरी चीज़ नहीं है। बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि मनुष्य अपनी धन-संपत्ति को किस प्रकार व्यय करता है। क़ारून अपनी विशाल धन-संपत्ति से बहुत से लाभदायक सामाजिक कार्य कर सकता था किन्तु अहंकार उसके वास्तविकता को देखने के मार्ग में रुकावट बन गया। बहुत से शुभचिंतक क़ारून से इस वास्तविकता का उल्लेख करते थे कि जिस प्रकार ईश्वर ने तुम पर कृपा की है उसी प्रकार तुम भी दूसरों के साथ भलाई करो वरना ईश्वर अपनी अनुकंपा तुमसे वापस ले लेगा। किन्तु क़ारून उन लोगों के उत्तर में कहता था कि ये धन-संपत्ति मैने अपने ज्ञान से अर्जित की है इससे तुम्हारा कोई लेना देना नहीं है कि मैं अपने धन के साथ क्या करूं। इस प्रकार क़ारून की उद्दंडता अपनी चरम को पहुंच गयी। यहां तक कि एक दिन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ईश्वर के आदेश से क़ारून से धार्मिक कर ज़कात की मांग की और कहा कि ईश्वर ने मुझे आदेश दिया है कि ज़रूरतमंदों का भाग तुम्हारे धन से ज़कात के रूप में ले लूं।

    जब क़ारून ने ज़कात के रूप में निकाले जाने वाले धन की मात्रा का हिसाब लगाया तो समझ गया कि उसे बहुत अधिक धन निकालना  पड़ेगा इसलिए उसने ज़कात देने से इंकार कर दिया। क़ारून का भ्रष्टाचार व अत्याचार इस सीमा तक बढ़ा कि उसने अपनी स्थिति की रक्षा के लिए हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के विरुद्ध षड्यंत्र रखा और उन पर निराधार आरोप लगाए। हज़रत मूसा ने क़ारून को शाप दिया। ईश्वर ने हज़रत मूसा के शाप से भीषण भूकंप भेजा और धरती क़ारून को उसकी धन-संपत्ति के साथ निगल गयी। इस प्रकार इस घमंडी के जीवन का अंत हो गया। जो लोग उस समय तक क़ारून के धन व वैभव की कामना करते थे, समझ गए कि धन-संपत्ति से न केवल यह कि सम्मान व ईश्वर का सामिप्य प्राप्त नहीं होता बल्कि धन तबाही व बर्बादी का कारण भी बन सकता है। उन्होंने इस वास्तविकता को समझ कर कहाः यदि ईश्वर की कृपा न होती तो हम भी क़ारून का अनुसरण करते और उसी जैसा अंजाम हमारा भी होता। ईश्वर ने सूरए क़सस में आयत क्रमांक 76 से 82 के बीच क़ारून की कहानी का बहुत ही रोचक ढंग से उल्लेख किया है।

    इस कहानी से यह वास्तविकता स्पष्ट होती है कि घमंड और अधिक धन का नशा कभी मनुष्य को नाना प्रकार के पाप और बुराइयों की ओर खींच ले जाता है। यहां तक मनुष्य ईश्वरीय पैग़म्बर के विरुद्ध उठ खड़ा होता है। सूरए क़सस की आयत क्रमांक 83 में इन शब्दों में निष्कर्ष पेश किया गया है। ये परलोक का घर हम उन लोगों के लिए विशेष कर देंगे जो धरती पर वर्चस्व और बुराई का इरादा नहीं रखते और अच्छा अंजाम तो सदाचारियों के लिए है। इस बात में संदेह नहीं कि धरती पर वर्चस्व जमाने व बुराई फैलाने की भावना बहुत से लोगों की निर्धनता व वंचित्ता का कारण बनेगी। इस्लाम उस संपत्ति का समर्थन करता है जो धरती पर बुराई के फैलने तथा मानवीय मूल्यों को छोड़ने, स्वयं को बेहतर समझने ता दूसरे के अपमान का कारण न बने। इस्लामी शिक्षाओं में धन-संपत्ति ज़रुरतमंदों की आवश्यकताओं को दूर करने का माध्यम तथा वंचितों घाव पर मरहम के समान होना चाहिए।

    क्या आप जानते हैं कि पवित्र क़ुरआन की कौन सी आयत (परलोक के अच्छे अंजाम की ओर से) सबसे अधिक आशावान बनाती है। इस अर्थ को हज़रत अली अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के हवाले इस प्रकार बयान करते है। एक दिन मैं मस्जिद में गया तो वहां उपस्थित लोगों से पूछा क्या आप लोग जानते हैं कि पवित्र क़ुरआन की कौन सी आयत सबसे अधिक आशावान बनाती है? हर एक ने अपने ज्ञान के अनुसार आयत का उल्लेख किया। कुछ लोगों ने सूरए निसा की आयत क्रमांक 48 का उल्लेख किया जिसमें ईश्वर कहता है कि वह अनेकेश्वरवाद के सिवा हर पाप को क्षमा कर देगा।

    कुछ लोगों  ने सूरए निसा की आयत क्रमांक 110 का उल्लेख किया जिसमें ईश्वर कह रहा हैः जो भी कोई बुरा कर्म कर बैठे या स्वयं पर अत्याचार करे फिर ईश्वर से क्षमा की प्रार्थना करे तो ईश्वर को क्षमाशील व दयावान पाएगा।

    कुछ लोगों ने सूरए ज़ुमर की आयत क्रमांक 53 का नाम लिया जिसमें ईश्वर कह रहा हैः हे मेरे बंदो! यदि तुमने अपने आप पर ज़्यादती की है, तो ईश्वर की कृपा से निराश न हो क्योंकि वह सभी पापों को क्षमा करता है।

    हज़रत अली ने विभिन्न दृष्टिकोण सुनने के पश्चात कहाः मैंने स्वयं पैग़म्बरे इस्लाम को यह फ़रमाते सुना है कि सूरए हूद की आयत क्रमांक 114 सबसे अधिक आशावान बनाती है। जिसमें ईश्वर कह रहा हैः हे पैग़म्बर आप दिन के दोनों किनारों (सुबह और शाम) और कुछ रात गुज़रने पर नमाज़ क़ाएम करें निःसंदेह भलाईयां बुराइयों को समाप्त कर देती हैं। ये याददेहानी है उन लोगों के लिए जो ईश्वर को याद रखते हैं। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमायाः ईश्वर की सौगंद जिसने हमें लोगों के बीच शुभसूचना देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा है, जिस समय व्यक्ति वज़ू करता है उसके पाप झड़ जाते हैं और जिस समय क़िबले की ओर मुंह करके खड़ा होता है, पवित्र हो जाता है। हे अली प्रतिदिन की नमाज़ पढ़ने वाला उस व्यक्ति के समान है कि जिसके घर के सामने पानी की नहर हो और वह उसमें पांच बार नहाए।