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    ईश्वरीय आतिथ्य-9 दूसरों की बुराइयों पर पर्दा डालें

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    हे मेरे पालनहार इस दिन मुझे पवित्रता और पापों से दूरी के वस्त्र से सुसज्जित कर और मुझे संतुष्टि का परिधान पहना और मुझे आज के दिन न्याय करने पर प्रोत्साहित कर और अपनी सुरक्षा द्वारा मुझे हर उस कार्य से सुरक्षित रख जिससे मैं डरता हूं, हे भयभीत होने वालों के रक्षक।

    इस प्रकाशमयी दुआ में पवित्रता और दूसरों की बुराइयों और ग़लतियों को छिपाने को मनुष्य के दो आभूषणों के रूप में याद किया गया है और ईश्वर की सुन्दरतम विशेषताओं व गुणों में सत्तारूल उयूब है अर्थात बुराइयों पर पर्दा डालने वाला है। पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के कथनों में आया है कि ईश्वर ने अपने बंदों में से हर एक के लिए चालीस पर्दे रखे हैं और जब भी बंदा गुनाहे कबीरा अर्थात बड़ा पाप करता है, तो एक पर्दा फट जाता है और यदि पाप करने के बाद वह प्रायश्चित कर लेता है यह पर्दा अपनी पहली वाली स्थिति पर लौट आता है और यदि प्रायश्चित नहीं करता और अपने पापों पर आग्रह करता रहता है तो यह समस्त पर्दों के फट जाने का कारण बनता है, तब फ़रिश्ते ईश्वर से कहते हैं, हे पालनहार तेरे बंदे ने सभी पर्दों को फाड़ दिया है। उस समय आकाश से आवाज़ आती है कि उसे अपने परों से ढांक दो, किन्तु यदि उसने पापों पर डटे रहकर उदंड्डता की तो ऐसी स्थिति में आवाज़ आती है कि अपने परों को उस पर से हटा लो। यही वह स्थान है जहां पर पापी, अपमानित और लज्जित होता है।

    कितना अच्छा होता कि हम मनुष्य अपने जैसों की बुराइयां करना छोड़ दें और दयालु व कृपालु ईश्वर की भांति दूसरों की बुराइयों पर पर्दा डालने वाले बनें। इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि यद्यपि ईश्वर पापों पर पर्दा डालने वाला है किन्तु मनुष्य को भी पवित्र होना और पापों से दूर होना चाहिए क्योंकि अपवित्रता का परिणाम अपमान और लज्जा है।

    पवित्रता, धैर्य और संयम का सबसे सुन्दर उदाहरण है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम का कहना है कि पवित्रता, आंतरिक इच्छाओं के मुक़ाबले में प्रतिरोध और उन पर विजयी होना है। वास्तव में जब कोई व्यक्ति अपनी आंतरिक इच्छाओं को अपनी बुद्धि और ईमान के नियंत्रण में रखता है, तो वह पवित्र रहता है। पवित्रता का फल, सुशीलता, लज्जा और शुद्धता है। एक पवित्र और सुशील व्यक्ति जो अपनी इच्छाओं को बुद्धि और ईमान के माध्यम से नियंत्रित करता है, वास्तव में अपने भीतर बेहतरीन प्रतिरोधक क्षमता का पोषण करता है। उसके भीतर सदैव एक प्रकार का निरिक्षक पाया जाता है और इस प्रकार से वह सरलता से हर काम में हाथ नहीं लगाता और उसकी नज़र अपनी समस्त करनी और कथनी पर होती है ताकि ऐसा न हो कि हाथ, ज़बान और शरीर के अन्य अंग पाप में ग्रस्त हो जाएं। बेहतरीन पवित्रता और लज्जा, ईश्वर से लज्जा है। वह मनुष्य जो ईश्वर से लज्जा करता है, जब पाप में ग्रस्त होने वाला होता है तो एक क्षण के लिए अपने सामने सृष्टि के रचियता को देखता है और उसे लज्जा आ जाती है और वह पापों से मुंह फेर लेता है।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम मुहम्मद बिन अबी बक्र से वसीयत करते हुए कहते हैं कि जान लो कि सबसे बड़ी पवित्रता, ईश्वरीय धर्म में अवज्ञा से बचना और ईश्वर के आदेशों का पालन करना है। मैं तुमसे सिफ़ारिश करता हूं कि गुप्त और स्पष्ट रूप से अपने दिल में और अपने व्यवहार में सृष्टि के रचयिता ईश्वर से भय रखो।

    ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन में जिन विषयों की बहुत अधिक सिफ़ारिश की है वह ईमान और सदकर्म का प्रयास है। ईश्वर ने ईमान के बाद सदकर्म की सिफ़ारिश की है। यह इस अर्थ में है कि केवल ईमान लाना ही पर्याप्त नहीं है। सच्चा ईमान अच्छे कर्म का कारण बनता है। ईश्वर ने बारम्बार पवित्र क़ुरआन में सदकर्म करने वालों को शुभ सूचना दी है कि जो लोग सदकर्म करते हैं उन्हें वह पसंद करता है। ईश्वर की दृष्टि से कोई भी अच्छा और भला कर्म छिपा नहीं रहता और उसके निकट भले कर्म करने वालों का पारितोषिक सुरक्षित है। सूरए मरियम की आयत संख्या 96 में उन पारितोषिकों में से एक को बयान किया गया है जो संसार में ईश्वर ईमान वालों को प्रदान करता है। इस आयत में आया है कि निःसंदेह जो लोग ईमान लाए और सदकर्म किए यथाशीघ्र दयावान ईश्वर लोगों के दिलों में उनका प्रेम पैदा कर देगा।

    इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ईमान और सदकर्म का चिन्ह मनुष्य के व्यवहार में खुलकर स्पष्ट हो जाता है। ईश्वर और ईश्वरीय दूतों की पैग़म्बरी पर ईमान, मनुष्य की आत्मा और उसके व्यवहार में सुन्दर रूप में प्रकट होता है। सच्चाई, धैर्य, ईश्वरीय भय, उच्च शिष्टाचार, इसी प्रकार त्याग और बलिदान जैसे उच्च मानवीय भावनाएं, ईश्वर पर ईमान से उत्पन्न होती हैं। यह सभी सुन्दर गुण ऐसे हैं जिन्हें सभी मनुष्य पसंद करते हैं और सभी लोग इन गुणों से संपन्न लोगों की प्रशंसा करते हैं। उदाहरण स्वरूप जो व्यक्ति संयम से काम लेते हैं और धैर्य व संयम के आभूषण से सुसज्जित होते हैं, अपने आस पास के लोगों पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। इस प्रकार के लोग लोगों के निकट प्रिय होते हैं और लोग उन्हें बहुत पसंद करते हैं।

    इसी प्रकार जो लोग अमानतदार होते हैं सभी लोग उन पर विश्वास करते हैं। सच्चे और दानी लोग भी लोगों की दृष्टि में सज्जन और महापुरुष होते हैं। इन विशेषताओं और गुणों का स्रोत ईमान होता है और व्यक्ति और समाज पर इनका लाभदायक प्रभाव पड़ता है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने प्रेम की इस भावना को ईश्वरीय प्रेम का प्रतिबिंब बताया और कहा कि जब ईश्वर अपने बंदों में से किसी एक को पसंद करता है तो अपने महान फ़रिश्ते जिब्राइल से कहता है कि मैं अमुक व्यक्ति से प्रेम करता हूं तुम भी उससे प्रेम करो। जिब्राइल भी उससे प्रेम करने लगते हैं। उसके बाद वह आकाश में पुकारते हैं, हे आकाश वासियों, ईश्वर इस बंदे से प्रेम करता है तुम भी इससे प्रेम करो, तब सभी आकाशवासी उससे प्रेम करने लगेगें। उसके बाद यह प्रेम धरती पर प्रतिबिंबित होता है।

    पैग़म्बरे इस्लाम का यह स्वर्ण कथन इस बात का चिन्ह है कि सृष्टि पर ईमान और भले कर्म का विस्तृत प्रतिबिंबन होता है और इससे प्राप्त लोकप्रियता की किरणें सृष्टि के कोने कोने में फैली होती है। वास्तव में इससे बढ़कर आनन्ददायक और क्या हो सकता है कि मनुष्य इस बात का आभास करे कि वह सृष्टि के सभी पवित्र और नेक लोगों का प्रिय है।

    यहां तक कि कभी कभी वह लोग भी जिन्होंने ग़लतियां की हैं, मोमिन लोगों के भले कर्मों से प्रभावित हो जाते हैं और दिल ही दिल में उनकी प्रशंसा करते हैं। कितने हैं ऐसे लोग जिनके पूरे अस्तित्व पर अब भी भ्रष्टता का अंधकार नहीं छाया, पवित्र और भले लोगों के सदकर्म, उनके लिए सुन्दर और मनमोहक होते हैं और वे उसकी ओर क़दम बढ़ाते हैं। मोमिन और भले लोग इस प्रकार से लोगों में प्रिय होते हैं कि जब वह संसार से आंखें बंद कर लेते हैं, तो उनके वियोग में आंखें रोती हैं। यद्यपि वे विदित रूप से इस संसार में भौतिक स्थान से वंचित थे, उन्होंने ईश्वरीय प्रेम को अपने हृदयों में स्थान दिया और ईश्वर ने भी इसके पारितोषिक के रूप में उनके प्रेम को लोगों के हृदयों में बिठा दिया है। बहुत अधिक देखा गया है कि भले और सुकर्मी लोग जब इस संसार से चले जाते हैं तो लोग उनके लिए रोते हैं यद्यपि विदित रूप से संसार में उन्हें कोई विशेष स्थान और पद प्राप्त नहीं था।

    आइये ईश्वर से यह दुआ करें कि रमज़ान के बाक़ी बचे दिनों में हमारी आत्मा को ईमान और हमारे व्यवहार को सदकर्म के आभूषण से सुसज्जित कर दे। (आमीन)

    आइये कार्यक्रम के अंत में एक महान परिज्ञानी की सेवा में उपस्थित होकर शिष्टाचार का पाठ सीखते हैं, हो सकता है कि यह पाठ हमारे जीवन के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो। ईरान के एक प्रसिद्ध परिज्ञानी और धर्मशास्त्री थे जिनका नाम था सैयद अली क़ाज़ी तबातबाई। वे अल्लामा क़ाज़ी के नाम से प्रसिद्ध थे। ज्ञान के आभूषण से सुसज्जित यह विद्वान इतने विनम्र थे कि कभी भी सभा में आगे नहीं बैठते थे और जब भी अपने शिष्यों के साथ चलते थे तो कभी भी आगे नहीं चलते थे। जब भी उनके घर पर कोई मेहमान या शिष्य आता था तो उसके सम्मान में खड़े हो जाते थे। वे सभा में आने वाले छोटे बच्चों तक के सम्मान में खड़े होते थे। जब भी कोई मेहमान उनके घर आता तो वह नमाज़ को उसके सर्वाधिक शुभ व उचित अर्थात आरंभिक समय में पढ़ने के लिए मेहमान से अनुमति लेते थे और तब जा कर नमाज़ पढ़ते थे। अल्लामा क़ाज़ी नमाज़ को उसके उत्तम समय पर पढ़ने पर बहुत बल देते थे। नमाज़ के बारे में उनका दृष्टिकोण इस प्रकार थाः यदि तुमने नमाज़ की रक्षा की तो तुम्हारी सभी चीज़ें सुरक्षित रहेंगी। http://hindi.irib.ir