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    ईश्वरीय वाणी – 16

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    अनफाल सूरा पवित्र कुरआन का आठवां सूरा है जो पवित्र नगर मदीना में दूसरे हिजरी वर्ष में उतरा और इसमें ७५ आयतें हैं। चूंकि इस सूरे के आरंभ में जन सम्पत्ति और उसके खर्च का तरीक़ा बयान किया गया है इसलिए इसका नाम अनफाल रखा गया है। इस सूरे का दूसरा नाम बद्र है क्योंकि यह सूरा सबसे पहले “बद्र” नामक युद्ध के बाद उतरा था।

    शत्रुओं के निरंतर आक्रमण के मुकाबले में मुसलमानों का दायित्व, खुम्स अर्थात साल भर में बची वस्तुओं के पांचवें भाग का आदेश, सैनिक, राजनीतिक, जेहाद के लिए एकत्रित होना, युद्ध में बंदी बना लिये गये लोगों की समस्या और उनके साथ बर्ताव एवं लेनदेन का मामला, आरंभ में मुसलमानों का कमज़ोर होना, इस्लाम की छत्रछाया में उनका मज़बूत होना, वे विषय हैं जिन्हें इस सूरे में बयान किया गया है। इसके अतिरिक्त ईश्वर के मार्ग में पलायन करने वालों के बारे में भी इस सूरे में बहस की गयी है। इसी प्रकार मित्थाचारियों की पहचान और उनके मुकाबले का तरीका वह विषय है जिनका उल्लेख इस सूरे में किया गया है।
    सूरे अनफाल की २७वीं आयत में महान ईश्वर कहता है” हे ईमान लाने वालो! ईश्वर और उसके पैग़म्बर से विश्वासघात न करो और अपनी अमानतों में विश्वासघात न करो जबकि तुम जानते हो”

    पवित्र कुरआन की संस्कृति में अमानत का अर्थ बहुत विस्तृत है और जीवन के समस्त मामलों में विश्वासघात एक अप्रिय कार्य है। जिसकी भी अमानत हो उसके संबंध में अमानत के दायित्वों व जिम्मेदारियों का पालन किया जाना चाहिये चाहे अमानत रखने वाला व्यक्ति गैर मुसलमान ही क्यों न हो। यह हर मुसलमान का धार्मिक एवं नैतिक दायित्व है।

    इतिहास में आया है कि बनी कुरैज़ा के यहूदियों ने समझौते का उल्लंघन किया और वे मुसलमानों के शत्रुओं से जा मिले। अतः मुसलमानों ने उनका परिवेष्टन कर लिया। उस समय तय यह पाया किया कि साद बिन माज़ मुसलमानों के प्रतिनिधि के रूप में उनसे वार्ता करें। यहूदियों ने कहा कि अबु लोबाबा नाम का मुसलमान उनके पास आये क्योंकि उसकी यहूदियों से दोस्ती थी और उसका परिवार, बच्चे और धन सम्पत्ति यहूदियों के बीच में थी। पैग़म्बरे इस्लाम ने यहूदियों की इस मांग के प्रति सहमति जताई। उसके बाद अबु लोबाबा यहूदियों के पास गये और उन्होंने उनसे विचार विमर्श किया और जब यहूदियों ने अबु लोबाबा से कहा कि क्या साद बिन माज़ के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाये? तो अबु लोबाबा ने अपनी गर्दन की ओर संकेत किया यानी अगर साद बिन माज़ की बात मान लोगे तो सबकी हत्या कर दी जायेगी। इस सुझाव को स्वीकार न करो। उस समय महान ईश्वर ने हज़रत जीब्राईल को पैग़म्बरे इस्लाम के पास भेजकर सारे प्रकरण की सूचना दे दी और सूरे अनफाल की २७वीं व २८वीं आयत उतरी। इसके बाद अबु लोबाबा समझ गया कि उसने ईश्वर और उसके पैग़म्बर के साथ विश्वासघात किया है। और वह बहुत परेशान हो गया। उसने स्वयं को मस्जिद के एक स्तंभ से बांध दिया और कमस खाई कि जब तक उसे मौत नहीं आ जाती या उसकी माफी व तौबा स्वीकार नहीं होती तब तक वह न तो खाना खायेगा और न पानी पीयेगा। सात दिन रात गुजर गये। वह भूख प्यास के कारण बेहोश हो गया। उस समय महान व कृपालु ईश्वर ने उसकी तौबा स्वीकार कर ली। मुसलमानों के माध्यम से उसे अपनी तौबा के स्वीकार होने की जानकारी मिली परंतु उसने भी सौगन्द खाई कि वह स्वयं को मस्जिद के खंभे से नहीं खोलेगा मगर यह कि पैग़म्बरे इस्लाम स्वयं आकर अपने पवित्र हाथों से बंधन को खोलें। पैग़म्बरे इस्लाम आये और उन्होंने अपने हाथों से उसकी रस्सी खोली।

    वास्तविकता यह है कि धन सम्पत्ति, संतान और व्यक्तिगत हितों से लगाव कभी मनुष्य के कान और आंख पर पर्दे बन जाते हैं और उसके परिणाम में मनुष्य ग़लती या विश्वासघात कर बैठता है जिसके समाज के लिए हानिकारक प्रभाव व परिणाम हैं परंतु महत्वपूर्ण यह है कि मनुष्य अबु लोबाबा की भांति शीघ्र अपनी गलती को समझ जाये और अपनी ग़लती की भरपाई का प्रयास करे। महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे अनफाल की ३०वीं आयत में कहता है” जब अनेकेश्वरवादी तुम्हें जेल में डाल देने, हत्या कर देने या मक्के से निकाल देने का षडयंत्र रच रहे थे और वे इसके बारे में सोच रहे थे तो ईश्वर ने युक्ति बनाई और ईश्वर बेहतरीन युक्ति करने वाला है”

    यह आयत उन घटनाओं की ओर संकेत करती है जिसके कारण पैग़म्बरे इस्लाम मक्का से मदीना पलायन करने पर विवश हो गये। इन घटनाओं को पवित्र कुरआन के व्याख्याकर्ताओं ने विभिन्न शैलियों व शब्दों में बयान किया है परंतु वे सब एक वास्तविकता को पेश करती हैं और वह यह है कि महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने चमत्कारिक ढंग से पैग़म्बरे इस्लाम को बड़े खतरे से बचाया था। काफिरों व अनेकेश्वरवादियों ने जब देख लिया कि पैग़म्बरे इस्लाम अपने धर्म के प्रचार प्रसार से बाज़ नहीं आयेंगे तो उन्होंने एक गुप्त बैठक में पैग़म्बरे इस्लाम को रास्ते से हटा देने का निर्णय किया गया। इसी प्रकार इस बैठक में किसी ने पैग़म्बरे इस्लाम को कैद कर देने का सुझाव दिया ताकि उनकी मृत्यु उसी कैद की स्थिति में ही हो जाये। इस प्रस्ताव के जवाब में कहा गया कि इस बात की संभावना व खतरा मौजूद है कि पैग़म्बर के समर्थक आक्रमण करके उन्हें स्वतंत्र न करा लें। किसी दूसरे ने कहा कि पैग़म्बर को अपने यहां से निकाल दो इससे तो बेहतर है कि उन्हें कैद किया जाये। इसके बाद किसी अन्य ने कहा कि क्या बात करने की उनकी मीठी शैली को नहीं देख रहे हो एक दिन उनके समर्थकों व पक्षधरों की संख्या इतनी अधिक हो जायेगी कि वह तुम्हें तुम्हारे नगर से बाहर निकाल देगा। इस पर अबु जेहल ने कहा हर कबीले के एक बहादुर और तलवार चलाने वाले जवान का चयन करो और उन सबको तेज़ तलवार दे दो ताकि सब मिलकर पैग़म्बर पर हमला करें। तय यह पाया कि रात को जब पैग़म्बर अपने बिस्तर पर होंगे तभी उन पर हमला करके उनका काम समाप्त कर दिया जायेगा। उन लोगों ने सोचा कि अगर इस तरह से पैग़म्बरे इस्लाम की हत्या कर दी जायेगी तो उनकी हत्या की ज़िम्मेदारी हममें से हर कबीले पर होगी और बनी हाशिम कबीला न तो इतने सारे कबीलों से युद्ध कर सकता है और न ही बदला नहीं ले सकता। इस बीच महान ईश्वर के फरिश्ते हज़रत जीब्राईल ईश्वरीय संदेश लेकर उतरे और उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम से कहा कि वह रात को ही हेरा नामक गुफा की ओर चले जायें और हज़रत अली अपने बिस्तर के बजाये पैग़म्बर के बिस्तर पर सो जायें।

    जब शत्रुओं ने पैग़म्बरे इस्लाम के घर पर आक्रमण किया तो देखा कि पैग़म्बरे इस्लाम के बिस्तर पर अली हैं। उन लोगों ने हज़रत अली से पूछा कि मोहम्मद कहां हैं तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फरमाया” पता नहीं कहां हैं? इसके बाद काफिरों एवं अनेकेश्वरवादियों ने पैग़म्बरे इस्लाम के पावन पद चिन्हों को देखते हुए उनका पीछा किया यहां तक कि वे हेरा गुफा के पास पहुंच गये वहां पर उन्होंने देखा कि गुफा के प्रवेश द्वार पर मकड़ी ने जाला बुन रखा है और कबूतर ने अंडे दे दिये हैं। उन सबने सोचा अगर पैग़म्बर इस गुफा के भीतर गये होते तो यह मकड़ी का जाला न होता उस समय वे सब लौट आये। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम तीन दिनों तक उस गुफा में रहे और जब शत्रु उन्हें ढूंढ ढूंढ कर थक गये और निराश हो गये तो वे दोबारा मदीना लौट गये।
    इस बात के दृष्टिगत कि मक्का से मदीना पैग़म्बरे इस्लाम का पलायन इस्लाम बल्कि मानवता के इतिहास का आरंभिक बिन्दु था, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि महान ईश्वर ने मकड़ी के जाले के माध्यम से इतिहास को बदल दिया। महान ईश्वर ने इससे पहले के पैग़म्बरों की भी सहायता की थी और साधारण से साधारण संसाधन से उनके शत्रुओं की चालों को विफल बना दिया था। कभी हवाओं का चलना, कभी मच्छरों की अनगिनत संख्या और कभी अबाबील नामक छोटे से पक्षियों के दल से मुकाबले में मनुष्यों की कमज़ोरी को स्पष्ट कर दिया और बता दिया कि महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की असीम शक्ति के मुकाबले में मनुष्य कितना कमज़ोर है। पवित्र कुरआन के सूरे अनफाल की ५३वीं आयत में महत्वपूर्ण एवं शिक्षाप्रद बिन्दुओं को भी बयान किया गया है। महान ईश्वर सूरे अनफाल की ५३वीं आयत में कहता है” यह इस कारण है कि ईश्वर ने जो अनुकंपा किसी गुट को दी है वह उसे परिवर्तित नहीं करता मगर यह कि वह स्वयं उसे परिवर्तित करे और ईश्वर सुनने व जानने वाला है”

    अगर हम इतिहास के विभिन्न राष्ट्रों के विकास और पतन के कारकों का अध्ययन व समीक्षा करना चाहते हैं तो हमें पवित्र कुरआन का गहन अध्ययन करना चाहिये। पवित्र कुरआन के अनुसार समाज के हर परिवर्तन की जड़ को समझने के लिए उस समाज की सोच, व्यवहार और भावना का अध्ययन करना चाहिये। यह आयत इस बिन्दु पर ध्यान देती है कि एसा नहीं है कि मनुष्य का भाग्य व भविष्य पहले से निर्धारित होता है बल्कि उसकी सोच, कर्म और व्यवहार उसके भविष्य का निर्माण व निर्धारण करते हैं। दूसरे शब्दों में महान ईश्वर की कृपा असीमित और सर्वव्यापी है परंतु लोग अपनी क्षमता व योग्यता के अनुसार उससे लाभान्वित होते हैं। महान ईश्वर अपनी भौतिक एवं आध्यात्मिक अनुकंपाओं को सबको देता है। जो जाति व राष्ट्र महान ईश्वर की अनुकंपाओं का प्रयोग सही मार्ग में करते हैं और उसका प्रयोग अपनी परिपूर्णता के मार्ग में करते हैं तो महान ईश्वर उनमें वृद्धि करता और उन्हें टिकाऊ बना देता है पंरतु जब उसकी अनुकंपाओं का प्रयोग उदंडता और भ्रष्टाचार के लिए होता है तो वह अपनी अनुकंपाओं को ले लेता है या उन्हें विपत्तियों में परिवर्तित कर देता है।

    सूरे अनफाल की आयत नम्बर ६५ में एक बार फिर इस्लामी दृष्टिकोण के आधार पर जेहाद व धर्मयुद्ध के विषय की ओर संकेत किया गया है और वह इस बात की परिचायक है कि मुसलमानों को शत्रुओं की विदित शक्ति की तुलना की प्रतीक्षा में नहीं रहना चाहिये बल्कि जब भी उन्हें शत्रुओं के अतिक्रमण का सामना हो और शत्रुओं की संख्या उनसे दो बराबर या उससे भी अधिक क्यों न हो तब भी उन्हें चाहिये कि उनके मुकाबले के लिए उठ खड़े हों और अपनी संख्या के कम होने के बहाने मुकाबला करने से न भागें। जैसाकि यदि हम अधिक युद्धों में देखें तो शत्रुओं की संख्या मुसलमानों से कहीं अधिक थी और संभावना एवं संख्या की दृष्टि से भी मुसलमान कम थे।

    अलबत्ता विदित में शक्ति का अधिक होना सफलता का एक कारण है पंरतु संख्या और संसाधनों के कम होने के बावजूद जो चीज़ मुसलमानों की जीत का कारण बनी वह उनकी प्रतिरोध की भावना थी जो ईमान का फल था। यही भावना इस बात का कारण बनी कि मुसलमान, शत्रुओं के मुकाबले में अपनी संख्या और संसाधन की कमी के बावजूद युद्ध जीत गये। शत्रु की बौखलाहट और उसका उद्देश्यहीन होना और इसके विपरीत मुसलमानों का अपने उच्च उद्देश्यों की पूरी जानकारी स्वयं उनकी संख्या की कमी को पूरा कर देता है। इस स्थिति में महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ईमानदार और प्रतिरोध करने वाले मुजाहिदों की भौतिक व आध्यात्मिक सहायता अवश्य करता है। महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे अनफाल की ७४वीं आयत में कहता है” जो लोग ईमान लाये और उन्होंने पलायन किया और ईश्वर के मार्ग में जेहाद किया और जिन्होंने शरण दी और सहायता की, वे सच्चे व वास्तविक मोमिन हैं उनके लिए ईश्वर की दया और अच्छी आजीविका है”