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    ईश्वरीय वाणी – 23

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    और निसंदेह हमारे फ़रिश्ते शुभ सूचना लेकर इब्राहीम के पास आए और उन्होंने कहा कि तुम पर सलाम हो, इब्राहीम ने भी कहा कि तुम पर भी सलाम हो तो थोड़ा समय भी न बीता था कि वे (अतिथियों के लिए) एक भुना हुआ बछड़ा ले आए।

    जैसा कि हमने बताया था कि सूरए हूद में ईश्वर के संबंध में पहचान के विषय के अतिरिक्त ईश्वरीय दूतों के बारे में पाठ सीखने योग्य कहानियों का वर्णन है। हज़रत नूह और हज़रत हूद की कहानियों को बयान करने और लोगों के मार्गदर्शन के लिए उनके निरंतर प्रयासों का वर्णन करने के बाद आइये हज़रत इब्राहीम और हज़रत लूत की कहानी सुनते हैं।
    फ़रिश्ते ईश्वर की ओर से दो कामों को अंजाम देने के लिए ज़मीन पर उतरे। पहला हज़रत लूत की जाति को प्रकोप में ग्रस्त करने और दूसरा हज़रत इब्राहीम को इस बात की शुभ सूचना देना कि शीघ्र की उनकी पत्नी हज़रत सारा के यहां एक बच्च जन्म लेगा जिसका नाम इस्हाक़ होगा। जब यह ईश्वरीय दूत हज़रत इब्राहीम की सेवा में पहुंचे तो उन्होंने हज़रत इब्राहीम को सलाम किया। उन्होंने सलाम का जवाब दिया। थोड़ी देर ही गुज़री थी कि हज़रत इब्राहीम अपने अतिथियों के लिए भूना हुआ बछड़ा लाए।

    हज़रत इब्राहीम ने देखा कि आने वाले अतिथि खाने को हाथ नहीं लगा रहे हैं। इस काम से उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। इसीलिए वे उन्हें पराया समझने लगे और वे उनसे भयभीत होने लगे। उन्होंने सोचा कि संभव हो कि यह लोग कुछ ग़लत इरादे से आये हों। ईश्वरीय दूत इस बात को भांप गये और उन्होंने हज़रत इब्राहीम की चिंता को दूर कर दिया और उनसे कहा कि आप डरे नहीं, हम ईश्वर की ओर से हज़रत लूत की जाति की ओर भेजे हुए फ़रिश्ते हैं। हम हज़रत लूत की अत्याचारी जाति के लिए प्रकोप का संदेश लेकर आये हैं और फ़रिश्ते खाना नहीं खाते। उसके बाद फ़रिश्तों ने उन्हें शुभ सूचना दी कि बुढ़ापे और अधिक आयु गुज़र जाने के बावजूद उन्हें पुत्र सुख प्राप्त होगा और जो पुत्र जन्म लेगा उसका नाम इस्हाक़ होगा। हज़रत इस्हाक़ से हज़रत याक़ूब जन्म लेंगे और दोनों ही ईश्वरीय पैग़म्बर होंगे।

    हज़रत इब्राहीम की पत्नी अपनी और अपने पति हज़रत इब्राहीम की अधिक आयु के कारण निराशा में ग्रस्त थीं और उन्होंने एक सर्द आह खींची और कहा धिक्कार हो मुझ पर! क्या मुझसे बच्चा जन्म लेगा जबकि मैं बूढ़ी हो चुकी हूं और मेरे पति भी बूढ़े हो चुके हैं। यह विषय बहुत ही आश्चर्य जनक है।

    ईश्वर के फ़रिश्तों ने तुरंत उनके आश्चर्य को दूर कर दिया और उन्हें उनके परिवार पर ईश्वर की अनेक विभूतियों और समस्याओं से चमत्कारिक रूप से उनके मुक्ति पाने को याद दिलाया। उन्होंने उनसे कहा कि क्या आप ईश्वर के आदेश पर आश्चर्य कर रही हैं? जबकि आप पर आप के परिवार पर उसकी अनुकंपाओं की वर्षा ही रही है। यह वही ईश्वर है जिसने हज़रत इब्राहीम को नमरूद के चंगुल से स्वतंत्र किया और दहकती आग में उन्हें सुरक्षित रखा। यह वही ईश्वर ने जिसने एक अकेले इब्राहीम को शक्ति और सत्ता प्रदान की।
    जब हज़रत इब्राहीम से भय दूर हुआ और ईश्वर की ओर से शुभ सूचना सुनने के बाद, उनको हज़रत लूत की जाति की चिंता होने लगी कि ईश्वरीय दूत उनको विनष्ट करने आये हैं। उन्होंने हज़रत लूत की जाति के बारे में फ़रिश्तों से बहुत बहस की, इस आशा से कि उन पर प्रकोप के बादल छट जाएं। उन्होंने फ़रिश्तों से कहा कि उस जाति की मुक्ति की अभी भी आशा है इसलिए उन्होंने उनको दंडित करने को विलंब करने की मांग की क्योंकि वे बहुत ही विनम्र और क्षमाशील थे। (फ़रिश्तों ने कहा,) हे इब्राहीम! इस आग्रह को छोड़ दो कि निसंदेह तुम्हारे पालनहार का आदेश आ चुका है और एक अटल दंड उन्हें आ लेगा।

    सूरए हूद की आयत संख्या 77 में आया है कि और जब हमारे दूत लूत के पास आए तो उनके आने से अप्रसन्न और उनके विचार से दुखी हो गए और अपने आप से कहने लगे कि यह बहुत कड़ा दिन है।
    अंततः फ़रिश्ते हज़रत इब्राहीम के पास से हज़रत लूत की ओर रवाना हो गये। हज़रत लूत उस समय अपने खेत में काम कर रहे थे। अचानक उनकी नज़र कुछ सुन्दर युवाओं पर पड़ी जो उन्हें तलाश रहे थे, यह युवा उनके अतिथि बनना चाहते थे। एक ओर हज़रत लूत अतिथियों का अतिथ्य सत्कार करने से प्रसन्न थे किन्तु दूसरी ओर अपनी भ्रष्ट जाति के मध्य इन सुन्दर युवाओं की उपस्थिति को लेकर बहुत चिंतित थे। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें, उन्होंने स्वयं से धीरे से कहा आज का दिन बहुत कठिन और भयावह है।

    हज़रत लूत की जाति के लोग पथभ्रष्टता और समलैंगिकता के रोग में ग्रस्त थे। उन्हें महिला और लड़कियों में कोई रुचि नहीं थी । हज़रत लूत ने अपनी जाति के लोगों को इस बुरी कुरीति छोड़ने और ईश्वरीय भय रखने का बारम्बार निमंत्रण दिया। उन्होंने सदैव अपनी जाति के लोगों को सचेत किया और उनके अपराधों के कड़े दंड पर उन्हें सावधान किया किन्तु उनके उपदेशों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उनकी जाति के लोग अधिक उदंडी हो गये।
    हज़रत लूत को यह पता था कि उनकी जाति के लोग उनके अतिथियों का अनादर करेंगे और उन्हें नहीं छोड़ेगे। हज़रत लूत की पत्नी को जो पथभ्रष्ट थी, जब घर में सुन्दर युवाओं के आने की सूचना मिली तो वह मकान की छत पर गयी और ताली बजाकर तथा आग जलाकर, उन पथभ्रष्ट लोगों को अवगत करा दिया। पवित्र क़ुरआन इस संबंध में कहता है।
    और लूत की जाति वाले उनके पास दौड़ते हुए आए कि जो पहले से ही दुष्कर्म करते रहे थे। लूत ने कहा, हे मेरी जाति वालो! ये मेरी बेटियां हैं (तुम इनके साथ विवाह कर सकते हो) ये तुम्हारे लिए पवित्र हैं। ईश्वर से डरो और पाप मत करो और मुझे मेरे अतिथियों के समक्ष अपमानित न करो। क्या तुम्हारे भीतर कोई भला पुरुष नहीं है?

    हज़रत लूत ने इस अद्वितीय बलिदान से उनकी अंतर्रात्मा को झकझोरने का प्रयास किया, शायद वह सत्य के मार्ग पर लौट आएं किन्तु लोगों ने उनकी मांगों को रद्द कर दिया और कहा कि हमें लड़कियों से कोई रुचि नहीं है और हम तुम्हारे मेहमान को नहीं छोड़ेंगे। यह सुनते ही ईश्वरीय दूत हज़रत लूत की चिंता बढ़ गयी।
    सूरए हूद की 80वीं और 81वीं आयत में आया है कि (लूत ने) कहा, काश मेरे पास तुम से निपटने की शक्ति होती और मैं किसी दृढ़ सहारे का आश्रय ले सकता। इसी बीच फ़रिश्तों ने कहा, हे लूत हम तुम्हारे पालनहार के दूत हैं, (अतः हमारी चिंता न करो) वे कदापि तुम तक नहीं पहुंच सकेंगे, तो रात्रि के किसी भाग में अपनी पत्नी को छोड़कर अपने परिजनों को लेकर बाहर निकल जाओ और तुम में से कोई पीछे पलट कर न देखे। अलबत्ता जो कुछ इन पर बीतने वाला है वह तुम्हारी पत्नी पर भी बीतेगा। इन (के दंड) का निर्धारित समय भोर है तो क्या भोर निकट नहीं है?
    अंततः प्रकोप का समय आ गया, उनकी बस्तियां पूरी तरह नष्ट हो गयीं और उन पर आकाश से पत्थरों और मिट्टी की मूसलाधार वर्षा होने लगी और उस बस्ती को आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षाप्रद पाठ में परिवर्तित कर दिया ताकि आने वाली पीढ़ियां इन अवशेषों को देखकर इनसे पाठ लें।

    हज़रत लूत की कहानी मानवता के लिए बहुत बड़ी चेतावनी है कि समलैंगिकता एक कुरीति और बीमारी है। इस्लाम धर्म में समलैंगिकता को बड़े पापों में बताया गया है और इस्लामी कथनों में इसकी बड़ी निंदा की गयी है।

    सैद्धांतिक रूप से व्यभिचार या समलैंगिकता जैसी निरंकुश्ता, मानव अस्तित्व पर घातक प्रभाव डालती है और उसके संतुलन को बिगाड़ देती है क्योंकि मनुष्य स्वाभाविक रूप से स्वच्छ और अपोज़िट सेक्स में रुचि रखता है और रुचि उसकी आंतरिक इच्छाओं का भाग और उसकी पीढ़ी के बाक़ी रहने की गैरेंटी है किन्तु हर प्रकार की वह कार्यवाही, जो उसे प्राकृतिक मार्ग से विचलित कर दे, मनुष्य में एक प्रकार की मानसिक निरंकुश्ता और बीमारी पैदा कर देती है।
    समलैंगिकता एक ऐसा अभिशाप है जो खेद के साथ कुछ पश्चिमी देशों में प्रचलित है और उसे क़ानूनी रूप भी दे दिया गया है। निसंदेह इस प्रकार का अप्राकृतिक व्यवहार और कुरीती का फैलाव, उसकी बुराई को कम नहीं करता और शिष्टाचार, मानवता और स्वच्छ सामाजिक संबंधों को धराशायी कर देता है।

    प्रत्येक दशा में यह एक सार्वजनिक क़ानून है कि हर जाति व राष्ट्र, जो अत्याचार करता है और ईश्वरीय सीमाओं को लांघता है और ईश्वरीय दूतों की शिक्षाओं की अनदेखी करता है, ईश्वर उसे प्रकोप में ग्रस्त कर देता है। पवित्र क़ुरआन ने वास्तव में सचेत किया है कि विश्व की समस्त जातियां यह न समझ बैठें कि वे इस क़ानून से अलग हैं और यह आदेश केवल अतीत की जातियों के लिए ही था।

    हज़रत लूत की जाति की शिक्षाप्रद कहानी के समाप्त होने के बाद सूरए हूद में हज़रत शुएब और उनकी जाति की कहानी का वर्णन है। कुलमिलाकर सूरए हूद अतीत की कुछ जातियों और उनके काल के पैग़म्बरों का इतिहास बयान करता है। इन कहानियों में पूरे इतिहास में मनुष्य के जीवन के उतार चढ़ाव भरे कुछ आयामों का उल्लेख मिलता है और आज के मनुष्य के लिए शिक्षाप्रद बिन्दु मिलते हैं। अतीत की जातियों की कहानियों को बयान करने के बाद पवित्र क़ुरआन परिणाम स्वरूप कहता है कि (हे पैग़म्बर!) ये कुछ बस्तियों के वृत्तांत हैं जिनका हम आपसे उल्लेख करते हैं। उनमें से कुछ तो बाक़ी हैं और अन्य कुछ नष्ट हो चुकी हैं। हमने उन पर अत्याचार नहीं किया बल्कि उन्होंने स्वयं अपने अपने आप पर अत्याचार किया, और जब तुम्हारे पालनहार का आदेश आ गया तो उनके वे देवी देवता उनके कुछ काम न आए जिन्हें वे ईश्वर को छोड़कर पुकारा करते थे और उन्होंने उनके लिए विनाश के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु की वृद्धि नहीं की।

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