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    ईश्वरीय वाणी – 14

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    सूरए आराफ़ की आयत संख्या 31 और 32 में ईश्वर कहता है। हे आदम की संतानो! हर मस्जिद के निकट (उपासना के समय) अपनी शोभा को धारण कर लो और खाओ पियो परंतु अपव्यय न करो कि ईश्वर अपव्यय करने वालों को पसंद नहीं करता। (हे पैग़म्बर! ईमान वालों से) कह दीजिए कि किस ने उस शोभा को, जिसे ईश्वर ने अपने बंदों के लिए पैदा किया था और पवित्र रोज़ी को वर्जित कर दिया है? कह दीजिए कि ये अनुकंपाएं प्रलय में केवल उन लोगों के लिए हैं जो संसार के जीवन में ईमान लाए। हम इसी प्रकार, ज्ञान वालों के लिए अपनी आयतों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं।

    पवित्र क़ुरआन के प्रत्येक सूरे में विशेष संदेश पाए जाते हैं। उदाहरण स्वरूप आयत संख्या 31-32 में लोगों से मांग की गई है कि वे पवित्र कपड़े पहनें और पवित्र एवं स्वादिष्ट खाने खाएं। आयत में सुन्दरता की ओर संकेत, शारीरिक सुन्दरता या मानवीय सुन्दरता की ओर संकेत हो सकता है। जैसे साफ़-सुथरे कपड़े पहनना या इत्र आदि का प्रयोग करना आदि या फिर आध्यात्मिक विशेषताओं जैसे सद्भावना और दूसरी मानवीय विशेषताएं। हालांकि संभव है कि मनुष्य की अधिक चाहने की इच्छा, अच्छा खाने और पहनने की बात का दुरूपयोग करते हुए अपव्यय कने और फैशन की ओर उन्मुख हो, आयत के अगले भाग में कहा गया है कि तुम अपव्यय करो क्योंकि ईश्वर अपव्यय करने वालों को पसंद नहीं करता। अरबी शब्द इसराफ़ एसा व्यापक शब्द है जिसमें हर प्रकार का अपव्यय सम्मिलित है।

    पवित्र क़ुरआन की शैली यह रही है कि सृष्टि के आनंदों से लाभ उठाने और उसकी सुन्दरता से लाभान्वित होने के लिए उसने मानव से अपव्यय से बचने और मध्यमार्ग अपनाने की सिफ़ारिश की है। इस्लाम, मध्यमार्ग अपनाए जाने का समर्थक है।

    दूसरी दृष्टि से यदि हम मनुष्य की शारीरिक संरचना की ओर ध्यान दें तो हमें ज्ञात होगा कि इस्लामी शिक्षाएं मनुष्य के शरीर और उसकी आत्मा से समन्वित हैं। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मनुष्य की एक आंतरिक विशेषता सुन्दरता को पसंद करने की भावना है। उनके अनुसार साहित्य, कविता, कला और इस प्रकार की विशेषताएं, सुन्दरता से प्रेम के ही कारण हैं। इस्लाम भी मानता है क मनुष्य के भीतर सुन्दरता के प्रति लगाव या प्रेम की भावना पाई जाती है। यही कारण है कि उसने मानव की इस प्राकृतिक भावना की पूर्ति के लिए प्राकृतिक सुन्दरता, उचित एवं अच्छे कपड़े पहनना, इत्र का प्रयोग तथा इस प्रकार की बातों पर अमल करने को न केवल वैध बताया है बल्कि उनके प्रयोग की सिफ़ारिश भी की है। इमाम हसन अलैहिस्सलाम की जीवनी में मिलता है कि जब वे नमाज़ के लिए जाते थे तो अच्छे कपड़े पहनते थे। जब उनसे इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ईश्वर सुन्दर है और वह सुन्दरता को पसंद करता है। यही कारण है कि उसकी प्रार्थना के समय मैं अच्छे कपड़े पहनता हूं क्योंकि उसी ने आदेश दिया है कि अच्छे कपड़ों में मस्जिद जाओ। इस आयत में जो यह कहा गया है कि खाओ और पियो किंतु अपव्यय न करो तो देखने में यह एक छोटा सा वाक्य लगता है किंतु बहुत ही महत्वपूर्ण संदेश है। विद्वानों के शोध दर्शाते हैं कि बहुत सी बीमारियों की जड़ अधिक खाना है। अधिक भोजन करने से शरीर के भीतर अतिरिक्त पदार्थ बाक़ी रह जाते हैं। यह पदार्थ शरीर की बहुत सी बीमारियों का कारण बनते हैं। यही कारण है कि इस्लामी शिक्षाओं में संतुलित भोजन पर विशेष ध्यान दिया गया है। इस बारे में पैग़म्बरे इस्लाम का कहना है कि अमाशय समस्त बीमारियों का स्रोत और भूखा रहना सभी दवाओं में सर्वोपरि है। आयत संख्या 158 इस्लाम को विश्वव्यापी धर्म के रूप में प्रस्तुत करती है।

    कुछ यहूदी, पैग़म्बरे इस्लाम के पास आए और उन्होंने कहा कि हे मुहम्मद! तुम एसा न सोचो कि ईश्वर के दूत हो और तुम्हारे लिए भी मूसा की भांति ईश्वरीय संदेश भेजे जाते हैं। उनकी इस बात पर कुछ देर के लिए पैग़म्बरे इस्लाम शांत रहे फिर बोले कि मैं ही ईश्वर का अन्तिम दूत और ईश्वरीय भय रखने वालों का मार्गदर्शक हूं। यहूदियों ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उनसे पूछा कि तुमको किसकी ओर भेजा गया है? अरबों की ओर या हमारी ओर? इस बीच सूरए आराफ़ की आयत संख्या 158 उतरी। इस आयत में ईश्वर ने स्पष्ट शब्दों में पैग़म्बरे इस्लाम के पूरे जगत के दूत होने की घोषणा की है। ईश्वर कहता हैः (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि निसंदेह मैं तुम सबकी ओर ईश्वर का भेजा हुआ पैग़म्बर हूं कि जिसके पास आकाशों और धरती का स्वामित्व है। उसके अतिरिक्त कोई भी पूज्य नहीं है। वही जीवित करता है और मृत्यु देता है, तो ईश्वर पर और उसके पैग़म्बर पर ईमान लाओ और उसका अनुसरण करो कि जिसने किसी से भी शिक्षा प्राप्त नहीं की और जो ईश्वर तथा उसके कथनों पर ईमान रखता है। शायद तुम्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो जाए।सूरए आराफ़ः हे आदम की संतानो! हर मस्जिद के निकट (उपासना के समय) अपनी शोभा को धारण कर लो और खाओ पियो परंतु अपव्यय न को कि ईश्वर अपव्यय करने वालों को पसंद नहीं करता। इसी प्रकार से पवित्र क़ुरआन की अन्य आयतों में स्पष्ट ढंग से यह बताया गया है कि हज़रत मुहम्मद की पैग़म्बरी, वैश्विक है। इससे पता चलता है कि उनका निमंत्रण, किसी जाति, राष्ट्र या फिर गुट के लिए विशेष नहीं था। यह आयत समस्त विश्ववासियों से मांग या आग्रह करती है कि वे ईश्वर और उसके फ़रिश्तों पर ईमान लाएं।वे एसे दूत थे जो न केवल इन बातों पर विश्वास रखते थे, बल्कि इन बातों पर उनकी दृढ़ आस्था थी। इन बातों पर उनका अडिग संकल्प, उनके सच्चे होने को दर्शाती है। वह व्यक्ति जो यह चाहता है कि उसके हृदय पर मार्गदर्शन का प्रकाश प्रज्वलित हो और जो मोक्ष एवं कल्याण के कारण में आगे बढ़े उसे पैग़म्बरे इस्लाम का अनुसरण करना चाहिए।

    सूरए आराफ़ की आय संख्या 201 में ईश्वरीय भय रखने वालों की स्थिति के संदर्भ में रोचक बिंदु की ओर संकेत किया गया है और यह शुभ सूचना दी गई है कि ईश्वरीय भय रखने वालों पर ईश्वर की कृपा होती है, उन्हें दूरदर्शिता प्राप्त होती है और वे शैतान के बहकावे से सुरक्षित रहते हैं। इस आयत में कहा गया है कि निसंदेह जो लोग ईश्वर से डरते हैं जब उन्हें शैतान की ओर से कोई उकसावा छू जाता है तो वे सचेत हो जाते हैं और उन्हें सूझ आ जाती है। ताएफ़ का अर्थ होता है परिक्रमा करने वाला। यहां पर इस बात को समझाने का प्रयास किया गया है कि शैतानी बहकावे, परिक्रमा करने वाले की भांति मनुष्य की सोच और उसके विचारों को प्रभावित करने के प्रयास करते रहते हैं। ईश्वरीय भय रखने वालों को जब चारों ओर से शैतानी बहकावे घेर लेते हैं तो एसे में वे, उसकी अनंत विभूतियों को याद करते हैं और अपने कार्यों के बारे में सोच-विचार करते हैं। एसे में ईश्वर की कृपा से शैतानी बहकावे उनके हृदयों से दूर हो जाते हैं। इस स्थिति में वे अपनी आखों से सच्चाई के परिणाम को अपनी आंखों से देखते हैं। यह लोग दूरदर्शिता प्राप्त करते हैं। यह वाक्य से कि “ईश्वर के स्मरण से आखें खुलती हैं और सच्चाई दिखाई देती है” इस वास्तविकता की ओर संकेत किया गया है कि शैतानी बहकावे, मनुष्य की बुद्धि पर पर्दे डाल देते हैं, एसे में मनुष्य अच्छे और बुरे में पहचान करने में अक्षम हो जाता है। इसके विपरीत ईश्वर की याद, मनुष्य को जागरूकता और दूरदर्शिता प्रदान करती है। एसा मनुष्य सरलता से अच्छाई और बुराई में अंतर को समझ जाता है और शैतानी बहकावे से बच जाता है।

    धर्मगुरूओं का कहना है कि मनुष्य अपने जीवन के किसी भी चरण में शैतानी बहकावे का शिकार बन सकता है। कभी कभी मनुष्य इस बात का आभास करता है कि उसके भीतर एक शक्ति उसे बुरे कार्यों के लिए प्रेरित कर रही है। निःसन्देह, वर्तमान परिस्थितियों में कि जब समाजों में हर ओर नैतिक भ्रष्टाचार व्याप्त हो चुका है और बहुत से संचार माध्यम, अनैतिकता को प्रचलित करने में लगे हुए हैं, शैतानी बहकावों में अधिक वृद्धि देखी जा रही है। एसी स्थिति में बुराइयों और हर प्रकार के भ्रष्टाचार से बचने का एकमात्र मार्ग, ईश्वरीय भय रखना है। बुराइयों से बचने, आत्मनिरीक्षण, ईश्वर के बारे में चिंतन-मनन और बुरे लोगों के भविष्य के बारे में विचार करने से, शैतानी बहकावे के मुक़ाबले में मनुष्य के भीतर शक्ति में वृद्धि होती है। स्पष्ट है कि यदि मनुष्य में प्रतिरोध की भावना कमज़ोर हो जाए तो एक न एक दिन वह शैतान के बहकावे में आकर पाप करने लगेगा। यही कारण है कि मनोवैज्ञानिकों ने आंतरिक इच्छाओं और शैताबी बहकावों को बीमारी के रोगाणुओं की संज्ञा दी है। यह रोगाणु, कमज़ोर शरीर की तलाश में रहते हैं। वे लोग जिनके शरीर स्वस्थ्य होते हैं वे स्वयं से इनको दूर कर देते हैं जबकि कमज़ोर लोग इन कीटाणुओं का शिकार बनकर बीमार हो जाते हैं।

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