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    ईश्वरीय वाणी -15

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    इब्ने अब्बास के अनुसार, पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने बद्र युद्ध में मुसलमान लड़ाकों के प्रोत्साहन के लिए इनामों की घोषणा की। इस घोषणा के कारण युवा सैनिकों ने गौरवपूर्ण वीरता के साथ युद्ध किया, लेकिन बूढ़े लोग झंडों के नीचे खड़े रहे। जब युद्ध समाप्त हो गया तो युवा अपना इनाम लेने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पास आए। बूढ़ों ने कहा कि हमें भी इनाम मिलना चाहिए, इसलिए कि हम जवानों के लिए सहारा थे और हमने उन्हें साहस दिलाया। इस बीच, युद्ध में हाथ लगने वाली वस्तुओं के बारे में मदीने के निवासियों में से दो लोगों के बीच कुछ कहा-सुनि हो गई, इसी समय ईश्वर की ओर से सूरए अंफ़ाल की पहली आयत अवतरित हुई। इस आयत में ईश्वर ने मतभेद को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए युद्ध में प्राप्त किए जाने वाले धन-दौलत का अधिकार पैग़म्बरे इस्लाम (स) को सौंप दिया, पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने भी उसे मुसलमान सैनिकों के बीच बांट दिया।
    सूरए अंफ़ाल की पहली आयत:
    तुम से अंफ़ाल अर्थात युद्ध में प्राप्त होने वाली एवं हर उस संपत्ति के बारे में पूछते हैं जिसका कोई मालिक नहीं है, कह दो अंफ़ाल पर अल्लाह और पैग़म्बर का अधिकार है, अल्लाह से डरो और उन भाई बंधुओं के बीच जिनका आपस में झगड़ा है सुलह करा दो और अगर ईमानदार हो तो अल्लाह और उसके पैग़म्बर का पालन करो।
    यद्यपि यह आयत युद्ध में प्राप्त होने वाले माल के बारे में नाज़िल हुई है, लेकिन उसका अर्थ व्यापक है और यह एक मूल क़ानून है। इस क़ानून के तहत वह संपत्ति भी आती है जिसका कोई मालिक नहीं है। इस आयत के आधार पर इस माल एवं संपत्ति पर अल्लाह, पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके उत्तराधिकारियों का अधिकार है, दूसरे शब्दों में इस्लामी शासन का अधिकार है ताकि मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए ख़र्च किया जा सका। अतः अंफ़ाल इस्लामी शासन के कोष के लिए वित्तपोषण का काम करता है। युद्ध में प्राप्त होने वाले माल के पांच हिस्सों में से चार हिस्सों पर सैनिकों का अधिकार है। यह जेहाद करने वालों के प्रोत्साहन और उनकी कठिनाईयों की भरपाई के लिए है। बाक़ी एक हिस्सा ख़ुम्स के रूप में ख़र्च किया जाएगा जिसका उल्लेख इसी सूरे की 41वीं आयत में है।
    सूरए अंफ़ाल की दूसरी और चौथी आयतों में अल्लाह सुबाहनहु ताला मोमिनों की पांच विशेषताओं का उल्लेख कर रहा है। मोमिन केवल वे लोग हैं कि जब भी अल्लाह का नाम लिया जाता है उनके दिल भय उत्पन्न होता है, और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाती हैं तो उनके ईमान में वृद्धि होती है और वे केवल अपने पालनहार पर भरोसा करते हैं। वे नमाज़ अदा करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें प्रदान किया है उसे ख़र्च करते हैं, वास्तविक मोमिन वही हैं।
    विकास एवं संपूर्णता समस्त जानदारों की विशेषता है, वास्तविक मोमिन भी हमेशा संपूर्णता के रास्ते पर अग्रसर रहते हैं और कभी शांत नहीं बैठते। वे जीवित आस्था से परिपूर्ण हैं, उनके ईमान का पौदा हर दिन बढ़ता रहता है और उस पर ताज़ा फल फूल आते हैं। आयत में आगे कहा गया है कि, वे केवल अपने पालनहार पर भरोसा करते हैं।

    वास्तव में वे पानी को उसके सोते से प्राप्त करते हैं और केवल अल्लाह पर भरोसा करते हैं। वे नमाज़ अदा करते हैं जो अल्लाह से संपर्क का माध्यम है। और जो कुछ आजीविका हमने उन्हें प्रदान की है उसे ख़र्च करते हैं।
    सूरए अंफ़ाल की अधिकांश आयतों में बद्र युद्ध और उसकी विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। इतिहास में दर्ज है कि जब मक्का वासियों के एक मुखिया अबू सुफ़ियान के नेतृत्व में व्यापारिक क़ाफ़िला सीरिया से मक्के की ओर लौट रहा था तो पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपने अनुयाईयों को आदेश दिया कि इस व्यापारिक क़ाफ़िले को रोक लें और उसका माल ज़ब्त कर लें कि जो शत्रुओं का माल भी लेकर जा रहा है। इसका एक कारण यह था कि मुसलमानों को मक्के से मीदीने की ओर पलायन करने पर मजबूर करके मक्के के अनेकेश्वरवादियों ने उनकी संपत्तियों को ज़ब्त कर लिया था। इसके अलावा, यह बात तार्किक थी कि मुसलमान शत्रुओं का व्यापारिक माल ज़ब्त करके अपनी आर्थिक बुनियाद मज़बूत करें। अबू सुफ़ियान को अपने जासूसों द्वारा मुसलमानों की इस योजना की जानकारी प्राप्त हो गई और उसने तत्काल एक संदेशवाहक को मक्के की ओर भेजा ताकि मक्का वासियों को इस योजना से अवगत करा दे। संदेशवाहक बहुत ही ख़राब अवस्था बनाकर मक्के पहुंचा ताकि लोगों का ध्यान आकर्षित कर सके और उन्हें उकसा सके। उसके उकसाने पर मक्के के 950 लड़ाके 700 ऊंटों और 100 घोड़ों के साथ चल पड़े। अबू जहल अनेकेश्वरवादियों की सेना सरदार था।
    शत्रुओं की संख्या लगभग मुसलमानों की संख्या से तीन गुना अधिक थी और उनके पास सैन्य उपकरण भी मुसलमानों के सैन्य उपकरणों से कई गुना अधिक थे।
    पैग़म्बरे इस्लाम (स) 313 मुसलमान योद्धाओं के साथ बद्र के स्थान पर कि जो मक्के और मदीने के बीच में स्थित है पहुंचे और पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने स्वयं इस सैन्य टुकड़ी की कमांड अपने हाथ में रखी। क़ुरैश अर्थात मक्का वासी भी बद्र पहुंच गए।
    परिस्थिति तनावपूर्ण थी। क़ुरैश की सेना काफ़ी मात्रा में सैन्य उपकरणों एवं खाद्य पदार्थों के साथ युद्ध के मैदान में उतरी थी। शुरू में उनका यही विचार था कि उनका मुक़ाबला ऐसे दुश्मन से हैं जिसमें मुक़ाबले की शक्ति नहीं है।
    पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने जब इस बात का आभास किया कि संभवतः उनके साथी रात को आराम से सो नहीं सकेंगे और अगले दिन ताज़ा दम होकर दुश्मन से नहीं लड़ सकेंगे तो अल्लाह द्वारा दिए गए वचन के मुताबिक़ फ़रमाया, अगर तुम्हारी संख्या कम है तो घबराओ नहीं। बड़ी संख्या में फ़रिश्ते तुम्हारी सहायता करेंगे। पैग़म्बरे इस्लाम ने उनकी हिम्मत बंधाई और जीत का भरोसा दिलाया, इस प्रकार मुसलमान रात को बड़े ही आराम से सोए। दूसरी समस्या कि जिसके बारे में योद्धा चिंतित थे रण क्षेत्र की भूगोलिक स्थिति थी। बद्र की ज़मीन पत्थरीली थी और उन छोटे छोटे पत्थरों में पाव धंसते थे और योद्धाओं की गतिशीलता प्रभावित होती थी। लेकिन उस रात बारिश हुई। योद्धाओं ने बारिश के पानी से वोज़ु किया।
    दूसरे दिन सुबह को इस्लाम का छोटा सैन्य दल भरपूर आत्मविश्वास के साथ रण क्षेत्र में दुश्मन के मुक़ाबले में खड़ा हो गया। सबसे पहले पैग़म्बरे इस्लाम (स) शांति का प्रस्ताव दिया। क़ुरैश के कुछ प्रमुख नेता शांति के पक्ष में थे, लेकिन अबू जहल ने इसका विरोध किया। अंततः युद्ध भड़क उठा।
    युद्ध के आरंभ में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के चाचा हजरत हमज़ा हज़रत अली (अ) और कुछ दूसरे वीर योद्धाओं ने एक एक करके युद्ध किया जो उस समय की परम्परा थी। इस्लामी योद्धाओं ने दुश्मन को महत्वपूर्ण क्षति पहुंचाई और उनके कई लड़ाकों को ढेर कर दिया। उसके बाद, अबू जहल ने सार्वजनिक हमले का आदेश दिया। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने मुसलमानों से कहा था कि दुश्मन की अधिक संख्या पर नज़र न रखें, बल्कि केवल अपने प्रतिद्वंद्वी पर नज़र रखें और अल्लाह से सहायता की इच्छा करें। मुसलमानों की वीरता और स्थिरता ने क़ुरैश की सेना के क़दम उखाड़ दिए। परिणाम स्वरूप अबू जहल समेत दुश्मन के 70 लड़ाके मारे गए और इतनी ही संख्या में बंदी बना लिए गए। मुसलमानों की ओर से बहुत कम लोग शहीद हुए। इस प्रकार से पहले ही युद्ध में अल्लाह की सहायता से मुसलमानों ने अपने शक्तिशाली दुश्मन को मात दे दी।
    सूरए अंफ़ाल की 9वीं से 14वीं आयतों तक बद्र युद्ध की संवेदनशील परिस्थितियों और मुसलमानों पर अल्लाह की विभिन्न प्रकार की अनुकंपाओं का उल्लेख है। ताकि उन्हें अल्लाह का शुक्रिया अदा करने के लिए प्रेरणा मिले और भविष्य में भी वे सफलता उनके क़दम चूमे।
    पहली आयतों में फ़रिश्तों की सहायता की ओर संकेत किया गया है: उस समय को याद करो जब दुश्मनों की अधिक संख्या और उनके अधिक सैन्य बल से तम बहुत भयभीत थे और तुमने अल्लाह से सहायता मांगी। उस समय अल्लाह ने तुम्हारे दुआ स्वीकार की और फ़रमाया, मैंने एक हज़ार फ़रिश्तों द्वारा तुम्हारी सहायता की है जो एक दूसरे के पीछे नीचे आते हैं। उसके बाद कहता है, अल्लाह ने यह काम केवल तुम्हें शुभ संदेश देने और तुम्हारे हार्दिक संतोष के लिए अंजाम दिया है और विजय केवल अल्लाह की ओर से है। इसलिए कि ईश्वर इतना शक्तिशाली है कि कोई उसके निर्णय के मुक़ाबले में खड़ा नहीं हो सकता।
    उसके बाद अल्लाह अपनी दूसरी कृपा का उल्लेख करते कहता है, उस समय को याद करों जब तुम सुख से सोए जिससे तुम्हें शांति प्राप्त हुई। बद्र के रण क्षेत्र में अल्लाह की तीसरी अनुकंपा बारिश थी, बारिश द्वारा उसने तुम्हें पाक साफ़ किया और शैतानी गंदगियों को तुमसे दूर किया। अल्लाह इस प्रकार तुम्हारे दिलों को मज़बूत करना चाहता था। इसी प्रकार वह चाहता था कि बारिश द्वारा उस पत्थरीली ज़मीन को जिसमें तुम्हारे पैर धंस रहे थे और डगमगा रहे थे स्थिर कर दे।
    अल्लाह की ही सहायता थी कि जो उसने दुश्मनों के दिलों में बद्र के योद्धाओं का भय डाल दिया जिससे उनका आत्मविश्वास लड़खड़ा गया। परिणाम स्वरूप, क़रैश की शक्तिशाली सेना ने इस्लाम की छोटी सी सैन्य टुकड़ी के मुक़ाबले में अपना आत्मविश्वास खो दिया था। सूरए अंफ़ाल की आयतों में अल्लाह सुबाहनहु ताला ने मुसलमानों की कार्यशैली की समीक्षा की है और उनकी कमज़ोरियों और ताक़त के बिंदुओं का उल्लेख किया है। आयतों में इन संवेदनशील परिस्थितियों को बयान किया गया है ताकि मुसलमान उससे सीख लें। बद्र युद्ध की उपलब्धि यह थी कि इससे मुसलमानों को काफ़ी प्रगति प्राप्त हुई। इस उज्जवल जीत से समस्त अरब में मुसलमानों की शक्ति का डंका बज गया और सभी इससे आश्चर्य में पड़ गए।
    सूरए अंफ़ाल की 45वीं, 46वीं और 47वीं आयतों में युद्ध एवं जेहाद के अन्य क़ानूनों के बारे में संकेत किया गया है। अल्लाह योद्धाओं से चाहता है कि रण क्षेत्र में दुश्मनों के मुक़ाबले में डटे रहें, अल्लाह को अधिक याद करें, अल्लाह और उसके पैग़म्बर का पालन करें, आपस में झगड़ा नहीं करें और एकता बनाए रखें, डटे रहें और अंहकार एंव दिखावे के लिए रण क्षेत्र में नहीं जाएं और लोगों को अल्लाह के रास्ते पर चलने से नहीं रोकें।

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