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    ईश्वरीय वाणी – 28

    ईश्वरीय वाणी – 28
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    पवित्र क़ुरआन के चौदहवें सूरे का नाम इब्राहीम है जिसमें 52 आयतें हैं। इस सूरे की 28वीं और 29वीं आयतें को छोड़कर इसकी सभी आयतें मक्के में उतरी हैं। इसका कारण यह है कि इस सूरे में हज़रत इब्राहीम और उनकी दुआओं और लोगों के मार्गदर्शन की दिशा में इस महान ईश्वरीय दूत के प्रयासों का वर्णन किया गया है। इसीलिए इसका नाम इब्राहीम रखा गया है। इस सूरे की अन्य आयतों में उनसे पहले के ईश्वरीय दूतों और हज़रत नूह, मूसा, ईसा, आद और समूद की जाति की ओर संकेत किया गया है।

    इब्राहीम नामक सूरा भी पवित्र क़ुरआन के अन्य सूरों की भांति हूरूफ़े मुक़त्तेआत अर्थात विच्छेदित अक्षरों से आरंभ होता है। इससे पूर्व हमने आपको बताया था कि इन अक्षरों के रहस्यों में से एक बात यह है कि ईश्वर इसके माध्यम से यह स्पष्ट करना चाहता है कि पवित्र क़ुरआन अपनी अद्वितीय आयतों के माध्यम से लोगों के मार्गदर्शन और नेतृत्व की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लिए हुए है और इसीलिए साधरण वाक्यों से बना है और यह इस पुस्तक के चमत्कार का चिन्ह है।
    अलिफ़ लाम रा। (हे पैग़म्बर!) यह वह किताब है जिसे हमने आपके पास भेजा है ताकि आप लोगों के पालनहार की अनुमति से उन्हें अंधकारों से निकाल कर प्रकाश और सराहनीय व प्रतिष्ठित ईश्वर के मार्ग की ओर ले जाएं।

    सूरए इब्राहीम अपनी बातें लोगों को अनेकेश्वरवाद और अज्ञानता के अंधकार से निकालकर एकेश्वरवाद और ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने में पवित्र क़ुरआन की भूमिका से आरंभ करता है और कहता है कि यह वह पुस्तक है जिसे मैंने आप पर ऊतारा है ताकि लोगों को पथभ्रष्टता के अंधकार से प्रकाश की ओर लाएं। वास्तव में पवित्र क़ुरआन के मानवीय व प्रशिक्षण संबंधी समस्त लक्ष्य इसी बिन्दु अर्थात लोगों को अंधकार से प्रकाश की ओर निकालने में निहित है। ईश्वरीय दूतों के भेजे जाने की नीति और पवित्र क़ुरआन का मुख्य लक्ष्य, लोगों को अज्ञानता, अनेकेश्वरवाद और अत्याचार के अंधकार से निकालना और उसको न्याय, ईमान और ज्ञान के प्रकाश की ओर उसे लाना है।
    यह आयत, इस बात की सूचक है कि मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए जो भी वस्तु आवश्यक है वह क़ुरआन में वर्णित है। पवित्र क़ुरआन इस बात को भी याद दिलाता है कि यह किताब, केवल पढ़ने वाली आयतें नहीं है बल्कि जीवन के उच्चतम कार्यक्रम इसमें वर्णित हैं। इसीलिए लोगों के जीवन में इसका स्थान होना चाहिए। रोचक बिन्दु यह है कि पवित्र क़ुरआन में अंधकार शब्द बहुवचन प्रयोग हुआ है जबकि प्रकाश शब्द एकवचन प्रयोग हुआ है। यह सूक्ष्मता यह अर्थ देती है कि प्रकाश का एक ही स्रोत है और समस्त भलाइयां और पवित्रताएं एकेश्वरवाद के प्रकाश की छत्रछाया में एक और समान हैं। यही कारण है कि सत्य का मार्ग एक है और पूरे इतिहास में समस्त ईश्वरीय दूत एक ही लक्ष्य और मार्ग पर चले हैं। उनकी शिक्षा के सिद्धांत भी एक ही रहे हैं किन्तु अंधकार जो असत्य का प्रतीक है, बहुत अधिक है। असत्य पर चलने वालों के सिद्धांत बिखरे हुए होते हैं और यहां तक कि वे अपनी पथभ्रष्टता के मार्ग में भी बंटे हुए हैं और उनमें एकता नहीं पायी जाती।

    यह आयत यह भी संदेश देती है कि यद्यपि पवित्र क़ुरआन लोगों का मार्गदर्शन करने वाली पुस्तक है किन्तु ईश्वरीय दूत जैसे नेतृत्व की भी बहुत आवश्यकता है जो उसकी शिक्षाओं का क्रियान्वयन करे और इसके माध्यम से पथभ्रष्ट लोगों को अंधकार से प्रकाश की ओर लाए। अलबत्ता अंधकार से प्रकाश की ओर लोगों को निकालना, इस बात को दर्शाता है कि मानो ईमान न रखने वाला व्यक्ति बंद और अंधकारमयी वातावरण में जीवन व्यतीत कर रहा है और ईश्वरीय दूत खुले वातावरण की ओर उसका मार्गदर्शन करते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि पवित्र क़ुरआन लोगों को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, यह मार्गदर्शन किस ओर है? आयत उत्तर देती है कि सराहनीय व प्रतिष्ठित ईश्वर के मार्ग की ओर।

    सूरए इब्राहीम की सातवीं आयत में मानव जीवन में आभार के प्रभाव और उसकी भूमिका की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि और (हे पैग़म्बर!) याद कीजिए उस समय को जब आपके पालनहार ने घोषणा कर दी कि यदि तुम कृतज्ञ रहे तो मैं तुम्हें और अधिक अनुकंपाएं प्रदान करूंगा और यदि तुम अकृतज्ञ रहे तो मेरा दण्ड अत्यंत कड़ा है।
    यह आयत अनुकंपाओं पर कृतज्ञ रहने और अकृतज्ञ रहने के संबंध में पवित्र क़ुरआन की सबसे स्पष्ट आयत है और मानवता के लिए बहुत अच्छा व सार्थक संदेश लिए हुए है। निसंदेह ईश्वर ने जो हमें बे पनाह अनुकंपाएं दी हैं उसके मुक़ाबले में उसे हमारे कृतज्ञ रहने की कोई आवश्यकता नही है और यदि वह कृतज्ञ रहा तो उसे अधिक अनुकंपाएं दी जाएंगी। आभार, स्वयं में एक अच्छी चीज़ है। आइये आभार के बारे में आपको कुछ बिन्दु बताते हैं ताकि अनुकंपाओं की वृद्धि और इसके मध्य संबंध स्पष्ट हो सके। आभार केवल ज़बान से आभार व्यक्त करना नहीं है बल्कि इसके लिए तीन चरण होते हैं। पहला यह है कि हमें यह देखना होगा कि यह अनुकंपा हमें किसने प्रदान की है। इस प्रकार ध्यान दिया जाना और चेतना आभार का पहला चरण है। उसके बाद ज़बान का चरण आता है जो उसके ऊपर का चरण है। व्यवहारिक आभार उसे कहते हैं कि हम देखें कि कोई भी अनुकंपा हमें क्यों दी गयी है? हमें उसी स्थान पर उसका प्रयोग करना चाहिए। यदि हमने ऐसा नहीं किया तो मानो हमने अनुकंपा को बर्बाद कर दिया।

    वास्तव में हमें यह सोचना चाहिए कि ईश्वर ने हमें आंख, कान, मुंह, नाक, इंद्रियां क्यों प्रदान की है? यह इसलिए है ताकि हम विश्व में उसके वैभव को समझें, जीवन के मार्ग को पहचाने और इन साधनों से परिपूर्णता के मार्ग पर क़दम बढ़ाएं। यदि हमें प्रदान की गयी बड़ी अनुकंपाओं का प्रयोग हमने सही मार्ग पर किया तो हमने व्यवहारिक आभार व्यक्त किया किन्तु यदि यह अनुकंपाएं, आत्ममुग्धता, निश्चेतना और ईश्वर से दूरी के लिए हो तो यह अकृतज्ञता है। हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि सबसे कम कृतज्ञता यह है कि हम अनुकंपा को ईश्वर की ओर से जानें न कि अपनी चतुराई, बुद्धि और प्रयास का परिणाम समझें, इसी प्रकार उसकी अनुकंपाओं से राज़ी होना और यह कि ईश्वरीय अनुकंपा को उसकी अकृतज्ञता का माध्यम क़रार न दें।

    शक्ति, ज्ञान, विचार शक्ति, सामाजिक प्रभाव, धन संपत्ति और स्वास्थ्य जैसी हर प्रकार की अनुकंपाओं के लिए आभार का मार्ग मौजूद है। जब भी मनुष्य ईश्वर की ओर से प्रदान की गयीं अनुकंपाओं को उसके सही मार्ग पर ख़र्च करता है तो उसने व्यवहारिक रूप से अपनी योग्यता को सिद्ध किया है। यह क्षमता और योग्यता, अनुकंपाओं की वृद्धि का कारण बनती हैं।
    एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार, आभार व्यक्त करना उसे कहा है कि एक प्राणी अपने पास मौजूद अनुकंपाओं से विकास और प्रगति के लिए लाभ उठाए। उदाहरण स्वरूप बाग़बान अपने बाग़ के उस भाग को देखकर खिल उठता है जहां पर अच्छे और फलदार वृक्ष उगते हैं। इसीलिए वह बाग़ के उस भाग पर विशेष रूप से ध्यान देता है किन्तु बाग़ के अन्य भाग जिसमें फलदार वृक्ष कम होते हैं उसे देखकर उसका हौसला पस्त हो जाता है, इसीलिए वह उस भाग पर ध्यान कम देता है और यदि यह ऐसी जारी रहती है तो उनका काम तमाम करने की सोचने लगता है क्योंकि इसमें श्रम लगाने का कोई लाभ ही नहीं होता। ठीक यही स्थिति हमारे ऊपर भी लागू होती है, केवल इस बात में अंतर है कि वृक्ष को कोई अधिकार नहीं है और वे प्रकृति के क़ानून के समक्ष नतमस्तक होते हैं किन्तु मनुष्य अपने शक्ति, इरादे, अधिकार, शिक्षा और प्रशिक्षण से लाभ उठाकर अनुकंपाओं को सही मार्ग पर ख़र्च करके सही मार्ग पर क़दम बढ़ा सकता है।

    यदि किसी ने अनुकंपाओं का दुरुपयोग किया, उदाहरण स्वरूप शक्ति को दूसरों पर अत्याचार और दूसरों के अधिकारों पर अतिक्रमण के लिए प्रयोग किया तो वास्तव में वह इस अनुकंपा के योग्य ही नहीं है किन्तु वह लोग जो इस शक्ति को सत्य और न्याय के क्रियान्वयन के मार्ग में प्रयोग करते हैं तो वह अनुकंपाओं के सही प्रयोग के बारे में अपनी क्षमता को सिद्ध करते हैं और वह अपने दिल की ज़बान से कहते हैं कि ईश्वर मैं इस योग्य हूं, अपनी अनुकंपाओं की मुझ पर वृद्धि कर।
    हज़रत अली अलैहिस्सलाम आभार व्यक्त करने के महत्त्व के बारे में कहते हैं कि जब ईश्वरीय अनुकंपाओं की भूमिका तुम तक पहुंचे तो आप प्रयास करें कि उसका आभार व्यक्त करके अन्य अनुकंपाओं को अपनी ओर आकर्षित करें न कि कम आभार करके उसे स्वयं से दूर कर दें।
    निसंदेह हमें हर समय ईश्वर की अनुकंपाओं का आभार व्यक्त करना चाहिए, आभार व्यक्त करने की यह क्षमता, स्वयं ईश्वर की देन है और इस प्रकार से हर आभार व्यक्त करने से हम ईश्वर की नई अनुकंपाओं के ऋणि हो जाते हैं। इसीलिए हम इस बात पर तनिक भी सक्षम नहीं हैं कि ईश्वर की अनुकंपाओं का जितना उसका अधिकार है, अदा करें।

    यहां पर यह बात पर उल्लेख करना आवश्यक है कि अनुकंपाओं के मुक़ाबले में केवल आभार व्यक्त करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसका भी आभार व्यक्त करना चाहिए जिसके माध्यम से हमें यह अनुकंपाएं प्राप्त हुईं, हमें उसके कष्टों का आभार व्यक्त करना चाहिए। यह चीज़ इस बात का कारण बनती है कि वे अधिक से अधिक सेवा के लिए प्रेरित हों। समाज में आभार व्यक्त करने की भावना को उत्पन्न करना और उन लोगों की प्रशंसा करना जिन्होंने अपने ज्ञान व बलिदान के माध्यम से सामाजिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने का काम किया, समाज की सुदृढ़ता और निखार का मुख्य कारण है। ऐसे समाज में जिसमें प्रशंसा और आभार व्यक्त करने की भावना फीकी पड़ गयी है, लोगों में सेवा के लिए कम रुचि पैदा होती है। इसके विपरीत ऐसे समाज में जिसमें लोग अपने बलिदानों और कष्टों से प्रशंसा के पात्र बनते हैं, प्रयास की भावना, अधिक क्षमा करने की भावना और विकास की भूमिका प्रशस्त होती है।
    सूरए इब्राहीम की आयत संख्या 18 में आया है कि काफ़िरों के कर्मों की उपमा, उस राख से दी जा सकती है जिस पर एक तूफ़ानी दिन में तेज़ हवा चले। जो कुछ उन्होंने प्राप्त किया है उसमें से एक कण को भी सुरक्षित रखने में वे सक्षम नहीं हैं और यही खुली हुई पथभ्रष्ठता है।

    राख तेज़ हवा में उड़ जाती है जिसको एकत्रित करने की क्षमता किसी में भी नहीं है, इसी प्रकार सत्य का इन्कार करने वाले अपने कर्मों से कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाते। उनके सारे कर्म हवा में उड़ जाते हैं और उनका हाथ ख़ाली हो जाता है। संभव है कि उनके कर्म विदित रूप से अधिक हों किन्तु यह केवल एक दिखावा है और इसका कोई लाभ नहीं है और लाभहीन है। एक मिट्टी के छोटे से बर्तन में संभव है कि सुन्दर फूल खिले किन्तु राख के ढेर में एक पत्ती भी न उगे। इस प्रकार से अनेकेश्वरवादियों के कर्म ख़ाली, परिणामहीन और केवल ढकोसला हैं।