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    ईश्वरीय वाणी – 29

    ईश्वरीय वाणी – 29
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    सूरेए इब्राहीम की २१वीं आयत में महान ईश्वर कहता है प्रलय में सभी ईश्वर के समक्ष लाए जाएंगे तो कमज़ोर लोग बलवानों से कहेंगे, हम संसार में तुम्हारे अधीन थे, तो क्या आज तुम ईश्वरीय दण्ड के कुछ भाग को हमसे रोक सकते हो? वे कहेंगे, यदि ईश्वर हमारा मार्गदर्शन करता तो हम भी तुम्हारा मार्गदर्शन कर देते। आज चाहे हम उतावलेपन से काम लें या धैर्य से, कोई अंतर नहीं है और हमारी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है।

    यह आयत कहती है कि वे लोग जो संसार में दूसरों का अंधा अनुसरण करते हैं तथा शासकों की अवैध इच्छाओं का पालन करते हैं, प्रलय में वे उन्हीं लोगों के साथ रहेंगे तथा उन्हीं की भांति उनके पास भी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं रहेगा। अत्याचारी संसार में पैग़म्बरों व धर्म के प्रचारकों से कहते थे कि तुम चाहे हमें नसीहत करो या न करो हमें कोई अंतर नहीं पड़ता। प्रलय में भी वे अपने ऊपर आपत्ति करने वालों के उत्तर में कहेंगे कि चाहे हम रोएं-चिल्लाएं या धैर्य से काम लें, हमारी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है।
    प्रलय के दिन अत्याचारी, काफिर और नास्तिक सबके सब महान ईश्वर के न्यायालय में पेश होंगे। उस समय उनके जो अज्ञानी व अबोध अनुयाई होंगे वे उन अहंकारियों से कहेंगे कि हम तुम्हारा अनुसरण करने के कारण इस विपत्ति में फंस गये हैं तुम भी हमारे प्रकोप के एक भाग को ले लो ताकि हमारी पीड़ा कुछ कम हो जाये। उस वक्त वे कहेंगे कि अगर ईश्वर ने दंड से मुक्ति की ओर हमारा मार्ग दर्शन किया होती तो हम भी तुम्हारा मार्गदर्शन करते। इसी तरह वे अहंकारी अपने अज्ञानी अनुसरण कर्ताओं से कहेंगे कि बेकार में चीखे चिल्लाओ नहीं अब मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है।

    इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि पवित्र कुरआन की आयतों के अनुसार काफिरों और अत्याचारियों को अपने अनुसरणकर्ताओं के पापों का भी मज़ा चखना होगा क्योंकि उन्होंने ही अपने अनुसरणकर्ताओं की गुमराही की बुनियाद रखी थी। इसके अतिरिक्त उन्हें अपने पापों की भी सज़ा मिलेगी और उसमें किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होगी।
    पवित्र कुरआन की इस आयत से भलिभांति समझा जा सकता है कि जो लोग आंख बंद करके इनके- उनके पीछे भागते हैं और अपनी लगाम दूसरों के हाथ में दे देते हैं और पथभ्रष्ट हो जाते हैं उन्हें यह ज्ञात होना चाहिये कि वे जिन लोगों का अनुसरण करते हैं उनका भी वही परिणाम होने वाला है जो उनका होगा।

    पवित्र कुरआन के सूरेए इब्राहीम की २२वीं आयत के बाद की आयत में इंसानों को चेतावनी दी गयी है कि वे शैतान की चालों और उसके बहकावे से होशियार रहें। जब अच्छे और बुरे बंदों का हिसाब किताब समाप्त हो जायेगा और उनमें से हर एक का अंत ज्ञात हो जायेगा तो शैतान अपने अनुयाइयों से कहेगा ईश्वर ने तुम्हें सत्य का वचन दिया था और मैंने तुम्हें झूठा वचन दिया था उसके बाद मैं अपने वादे से मुकर गया। इस प्रकार शैतान अपनी आपत्ति का वाण अपने अनुयाइयों की ही ओर छोड़ेगा और कहेगा कि तूम्हारा नियंत्रण तो मेरे हाथ में था ही नहीं मैंने तो तुम्हें केवल पापों की ओर बुलाया व उकसाया था और तुमने मेरे निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। इस आधार पर तुम मेरी भर्त्सना करने के बजाये स्वयं अपनी भर्त्सना करो। सूरेए इब्राहीम की इस आयत में इंसानों को बहकाने हेतु शैतान की चालों और उसके प्रयासों की ओर संकेत किया गया है। शैतान, इंसानों को गुमराह करने और अपने जाल में फंसाने के लिए दिल में जो उकसावा करता है उससे इंसान की स्वाधीनता एवं आज़ादी समाप्त नहीं होती है। दूसरे शब्दों में शैतान अपनी चालों से इंसान को मजबूर नहीं करता बल्कि वह मात्र उकसाता है। ये इंसान है जो अपनी इच्छा से उसके निमंत्रण को स्वीकार करता है। अलबत्ता यह संभव है कि इंसानों में गलत कार्य करने की आदत उन्हें इस चरण पर पहुंचा दे कि वे बड़े आराम से शैतान की जाल में फंस जायें। इसके बाद पवित्र कुरआन के सूरे इब्राहीम की २३वीं आयत में उन लोगों की ओर संकेत किया गया है जिन्होंने महान ईश्वर पर ईमान की छत्रछाया में भले कार्य अंजाम दिये और उन्हें मुक्ति व कल्याण प्राप्त हो गया। वे एसे बाग़ में प्रविष्ट हो गये हैं जिनके नीचे दूध और शहद की नदियां बह रही हैं और अपने पालनहार की असीम कृपा से सदा वे सदा के लिए वे उसमें रहेंगे। उसमें उन्हें कभी भी मौत नहीं आयेगी। उसके बाद सूरेए इब्राहीम की २४वीं व व २५वीं आयत में पवित्र कुरआन ने सत्य, असत्य, ईमान, पवित्र और अपवित्र का बहुत ही अच्छा व आकर्षण चित्रण किया है। इस सूरे की २४वीं-२५वीं आयत में पवित्र शब्द की उपमा वृक्ष से दी गयी है। महान ईश्वर कहता है” क्या तुमने नहीं देखा कि ईश्वर ने किस प्रकार उदाहरण दिया? पवित्र शब्द एक पावन वृक्ष की भांति है जिसकी जड़ जमीन में स्थिर और उसकी शाखायें आसमान में हैं। वह अपने फल हर समय अपने पालनहार की अनुमति से देते हैं और ईश्वर लोगों के लिए उदाहरण बयान करता है कि शायद वे याद करें और सीख लें।

    महान ईश्वर ने पवित्र शब्द की उपमा पवित्र वृक्ष से दी है क्योंकि वह बढ़ता है। यह वृक्ष हर पहलु से पवित्र है। फल,फूल यहां तक कि जो हवायें भी उससे होकर गुजरती हैं वे भी पवित्र हैं। इस वृक्ष की जड़ और शाखाए हैं। उसकी जड़ स्थिर है इस प्रकार से कि तूफान और तेज़ हवायें भी उसे नहीं उखाड़ सकतीं। इस वृक्ष की शाखायें आसमान में हैं। अगर हम सही तरह से सोचें तो इन विशेषताओं एवं उनकी विभूतियों को एकेश्वरवाद और ईश्वर को एक मानने वाले व्यक्ति में पाया जा सकता है। इन सबकी जड़ें बहुत मज़बूत और उनकी शाखाएं आसमान में होती हैं। जो भी व्यक्ति स्वयं को ईश्वरीय शिक्षाओं व सदगुणों से सुसज्जित कर ले उसके जीवन में ईश्वरीय विभूतियां प्रकट होंगी। क्योंकि एकेश्वरवाद के वृक्ष में नाना प्रकार के फल होते हैं। इस प्रकार के व्यक्तियों के मुकाबले में अपवित्र व्यक्ति होते हैं। सूरेए इब्राहीम की २६वीं आयत में महान ईश्वर कहता है कि अपवित्र शब्द की उपमा अपवित्र वृक्ष की भांति है जिसे ज़मीन से उखाड़ दिया गया गया है और उसकी कोई जड़ नहीं है।

    अपवित्र शब्द में ग़लत आस्था, अपवित्र व्यक्ति, गुमराह करने वाले कार्यक्रम और हर अपवित्र चीज़ शामिल है। स्पष्ट है कि जिस वृक्ष को जड़ से उखाड़ दिया गया हो उसकी न तो जड़ है और न फल है , न फूल न छाया है न सुन्दरता और स्थिरता। वह मात्र लकड़ी का एक टुकड़ा है जो सूखा व लाभहीन है और मात्र दूसरों के मार्ग की रुकावट है।
    महान ईश्वर सूरे इब्राहीम की ३५वीं आयत में कहता है” हे पैग़म्बर उस समय को याद कीजिए जब इब्राहीम ने कहा कि हे पालनहार इस नगर को सुरक्षित शहर करार दे और मुझे तथा मेरे बेटे को मूर्तिपूजा से दूर रख”
    हज़रत इब्राहीम महान ईश्वरीय पैग़म्बर थे। उन्होंने जीवन भर मूर्तिपूजा से संघर्ष किया। उन्होंने अज्ञानता के घनघोर अंधेरे में डूबे दिलों को एकेश्वरवाद के प्रकाश से प्रकाशित कर दिया और लोगों के एक गुट को पथभ्रष्टता से मुक्ति प्रदान कर दी।

    अलबत्ता हज़रत इब्राहीम ने सत्य को स्पष्ट करने के लिए बहुत सारी कठिनाइयां सहन कीं। उनमें से एक उनकी पहली पत्नी की उनकी दूसरी पत्नी हज़रत हाजेरा के संबंध में ईर्ष्या थी। हज़रत इब्राहीम की एक दासी हज़रत हाजेरा थीं और उनसे एक बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम हज़रत इब्राहीम ने इस्माईल रखा। यह समस्या इस बात का कारण बनी कि महान ईश्वर का आदेश हुआ कि हज़रत इब्राहीम फिलिस्तीन से अपनी पत्नी और बच्चे को मक्के के निर्जल मरूस्थल में छोड़ कर लौट आयें। हज़रत इब्राहीम ने महान ईश्वर के आदेश के अनुसार अमल किया और उन्हें मक्के के पहाड़ों के मध्य छोड़ दिया। कुछ ही देर गुजरी थी कि मक्के की कड़ी धूप और गर्मी के कारण माता एवं नवजात शिशु दोनों प्यासे हो गये। हज़रत हाजर ने अपने बच्चे की प्यास बुझाने के लिए बहुत प्रयास किया परंतु उनके प्रयासों का कोई परिणाम नहीं निकला किन्तु कुछ ही समय बाद बच्चे के पैर के नीचे से पानी का सोता जारी हो गया। वे क़बीले और लोग, जो उनके निकट से गुज़र रहे थे फिर इस प्रकरण से अवगत हो गये और उन्होंने वहां पर अपना डेरा डाल दिया। धीरे धीरे और कबीलों के लोग वहां आ गये जो उस स्थान के आबाद होने का कारण बना। उसके कुछ समय बाद हज़रत इब्राहीम को महान ईश्वर ने आदेश दिया कि वह काबे की दीवारों को ऊंचा करें और लोगों को वहां पर उपासना के लिए आमंत्रित करें। हज़रत इब्राहीम ने अपने बेटे हज़रत इस्माईल की सहायता से काबे की दीवारें ऊंची की। जब दीवार को ऊंचा उठाने का काम पूरा हो गया तो हज़रत इब्राहीम ने महान ईश्वर से जो प्रार्थना की है पवित्र कुरआन उसे बयान करता है ताकि वह दूसरों के लिए सीख रहे। पवित्र कुरआन की इस आयत में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम दुआ मांगने का तरीक़ा सिखाते हैं। सबसे पहले वे महान ईश्वर से मक्का नगर की सुरक्षा की दुआ करते हैं क्योंकि हर स्थान पर जीवन व्यतीत करने की पहली शर्त सुरक्षा है।

    हर आबादी और विकास के लिए सुरक्षा आवश्यक है। हज़रत इब्राहीम की महान ईश्वर से दूसरी दुआ यह है कि वह उन्हें और उनकी संतान को मूर्तिपूजा से दूर रखे। यह वह दुआ है जो दूसरे धार्मिक कार्यक्रमों का आधार है। हज़रत इब्राहीम की ईश्वर से तीसरी दुआ यह है कि ईश्वर की उपासना करने वालों का ध्यान उनकी संतान और धर्म के उनके दूसरे अनुयाइयों पर रहे जबकि उनकी चौथी दुआ यह है कि उन्हें विभिन्न प्रकार के फल प्राप्त हों। महान ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम की पांचवी दुआ यह है कि महान ईश्वर उन्हें नमाज़ पढ़ने और उसे कायेम रखने का सामर्थ्य प्रदान करे क्योंकि नमाज़ ईश्वर और इंसान के मध्य संपर्क का सबसे बड़ा व मज़बूत साधन है। यह वह दुआ है जिसे वे न केवल अपने लिए बल्कि अपनी संतान के लिए भी मांगते हैं। हज़रत इब्राहीम की छठी दुआ यह है कि ईश्वर उनकी दुआ को स्वीकार कर ले। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि महान उस दुआ को स्वीकार करता है जो पवित्र हृदय व आत्मा से निकली हो। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर से हज़रत इब्राहिम की सातवीं दुआ यह है कि अगर उनसे कोई ग़लती हो जाये तो ईश्वर अपनी महाकृपा से उसे क्षमा कर दे और इसी प्रकार प्रलय के दिन उनके माता पिता और समस्त मोमिनों पर कृपा करे। पवित्र कुरआन में जब हज़रत इब्राहीम के दुआ के शब्दों का बयान समाप्त हो जाता है तो पवित्र कुरआन की आयतें पैगम्बरे इस्लाम और मोमिनों को संबोधित करके कहती हैं कि अगर तुम यह देखते हो कि अत्याचारी बड़े आराम से हैं और उन पर कोई मुसीबत नहीं पड़ रही है तो इसका यह मतलब नहीं है कि ईश्वर को उनके कार्यों की खबर नहीं है। ईश्वर अपनी तत्वदर्शी दृष्टि से समस्त इंसानों को मोहलत व अवसर देता है ताकि अगर उनके अंदर योग्यता हो तो वे अपने बुरे कर्मों से प्रायश्चित कर लें अन्यथा वे अपने कर्मों का परिणाम स्वयं प्रलय के दिन देखेंगे।

    महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे इब्राहीम की ४२वीं आयत में कहता है”। ये अत्याचारी जो कुछ कर रहे हैं उससे ईश्वर को बेखबर मत समझो वह उनके दंड को उस दिन के लिए टाल रहा है जिस दिन आंखें की फटी रह जायेंगी”

    अलबत्ता उस समय कोई बहाना स्वीकार नहीं किया जायेगा। उस दिन अत्याचारी कहेंगे कि पालनहार हमें थोड़ा सा समय दे दे ताकि हम तेरे निमंत्रण को स्वीकार करें और तेरे पैग़म्बर का अनुपालन करें। उस समय ईश्वर उनसे कहेगा क्या तुम नहीं थे जो इससे पूर्व कसम खाया करते थे कि हमारा तो पतन ही नहीं होगा”

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