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    ईश्वरीय वाणी – 5-6

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    पवित्र क़ुरआन के एक सूरे का नाम निसा है जिसका अर्थ होता है महिलाएं। इस सूरे के इस नामंकन का एक कारण यह है कि इसमें महिलाओं के अधिकारों और उनसे संबंधित मामलों का उल्लेख किया गया है। यह मदीने का सूरा है और इसमें 176 आयत है। मदीना में नई सरकार का गठन हुआ था। पैग़म्बरे इस्लाम की पूरी कोशिश थी कि अज्ञानता के काल की बची हुयी गंदगी को लोगों के मन व विचार से दूर कर दें और ऐसा कार्यक्रम व सिद्धांत पेश करें जो समाज के सुधार व पुनर्निर्माण के लिए ज़रूरी है। इसलिए बहुत से क़ानून और आदेश समाज में सुधार के लिए ज़रूरी हैं। जैसा कि सूरए निसा में एक स्थान पर आया है, “बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम/या अय्युहन नासुत्तक़ू रब्बकुमुल लज़ी ख़लक़कुम मिन नफ़्सिन वाहेदतिन व ख़लक़ा मिन्हा ज़ौजहा व बस्सा मिनहुमा रेजालन कसीरन व नेसाआ,” अर्थात ईश्वर के नाम से जो बहुत कृपालु व दयावान है। हे लोगो! अपने ईश्वर से डरो कि जिसने तुम सबको एक मनुष्य से पैदा किया और उसी जाति का उसके लिए जोड़ा पैदा किया और उन दोनों से बहुत से पुरुष और स्त्रियां फैला दीं।

    सूरए निसा की पहली आयत सभी मनुष्य पर ईश्वर से डरने पर और सामाजिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत के रूप में बल देती है। इस सिद्धांत के आधार पर मानव समाज के सभी व्यक्ति एक जीव और एक जोड़े से पैदा किए गए हैं। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य चाहे वह पुरुष या महिला हो, सबकी जड़ एक है और सब आपस में समान हैं। इसलिए किसी व्यक्ति को दूसरे पर कोई वरीयता नहीं है। पवित्र क़ुरआन इस सुंदर अर्थ से सामाजिक संबंधों और पुरुष व महिला के बीच हर प्रकार के वर्चस्व जमाने की इच्छा को नकारता है।

    समाज और परिवार में महिला की भूमिका ऐसा विषय है जिस पर पूरे इतिहास में बुद्धिजीवियों द्वारा ध्यान दिया गया है। इस्लाम के उदय से पूर्व समाज में नारी को मानवीय दृष्टि से नहीं देखा जाता था। उसे महत्वहीन समझा जाता था और उसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। पवित्र क़ुरआन ने अज्ञानता के काल की इस घटिया संस्कृति का न केवल यह कि मुक़ाबला किया बल्कि महिला के उच्च स्थान को स्पष्ट करने के साथ ही उसे अधिकार दिलाने के लिए क़ानून बनाए और इस प्रकार नारी को उसका अधिकार दिलाया।
    यही कारण है कि पवित्र क़ुरआन की कुछ आयतों महिलाओं के अधिकारों, उसके कर्तव्यों व दायित्वों का वर्णन किया गया है। इस्लाम में महिला के अधिकार की समीक्षा से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि क़ुरआन में महिला और परिवार के अधिकारों की व्यवस्था का कितना व्यापक उल्लेख है।

    पवित्र क़ुरआन के सूरे निसा में 20 बार से अधिक नेसा शब्द का उल्लेख मिलता है। इस सूरे में महिलाओं के साथ व्यवहार की शैली, पारिवारिक मामलों के प्रबंधन, विवाह, तलाक़, मेहर, मीरास, सहित परिवार से संबंधित अन्य विषयों का उल्लेख किया गया है। कुल मिलाकर इस संदर्भ में क़ुरआन का उद्देश्य ग़लत रीति-रिवाजों को सुधारना है।
    सूरे निसा की आयत क्रमांक चार में महिलाओं को मेहर देने का विषय उनके मूल अधिकार के रूप में वर्णित है और इस आयत में बल दिया गया है कि महिला को एक ईश्वरीय उपहार के रूप में मेहर दिया जाए। चूंकि अरब में अज्ञानता के काल में महिलाओं का कोई स्थान नहीं था और मेहर बजाए उसे देने के उसके अभिभावक को दी जाती थी। इस्लाम ने इस अत्याचारपूर्ण रवाज को चुनौती दी और मेहर को महिला का मूल अधिकार बताया।

    अक्षम लोगों और अनाथ बच्चों की सहायता और मृतक के परिजनों के बीच स्वाभाविक व न्यायपूर्ण ढंग मीरास के बटवारे का विषय भी सूरे निसा में मौजूद है। अज्ञानता के काल के अरब प्रचलित अत्याचारपूर्ण रीति-रिवाज के आधार पर केवल पुरुषों को मृतक का वारिस समझते थे और महिलाओं व छोटे बच्चों को मीरास नहीं देते थे। इस प्रकार यदि किसी व्यक्ति के परिवार का पुरुष मर जाता था तो महिलाएं और बच्चे मीरास से वंचित हो जाते और मृतक के पुरुष परिजन उसकी धन संपत्ति को मीरास में पाते थे। इस्लाम ने इस अन्यायपूर्ण रस्म का विरोध किया। पैग़म्बरे इस्लाम के मदीना के एक अनुयायी औस बिन साबित का देहान्त हुआ तो उनके चचेरे भाइयों ने उनकी संपत्ति अपने बीच बांट ली और उनकी पत्नी व छोटे बच्चों को कुछ न दिया। औस बिन साबित की पत्नी ने इस बात की शिकायत पैग़म्बरे इस्लाम से की। उस समय आयत उतरी। पैग़म्बरे इस्लाम ने तुरंत औस बिन साबित के संबंधियों को बुलाया और आदेश दिया कि उनकी मीरास में हाथ न लगाएं और उसे उनके प्रथम श्रेणी के परिजनों के हवाले करें।

    वास्तव में यह आदेश महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में इस्लाम द्वारा उठाया गया दूसरा क़दम था। इस संदर्भ में सूरे निसा की आयत क्रमांक 7 में ईश्वर कहता है, पुरुषों के लिए उस संपत्ति में हिस्सा है जो मां-बाप और संबंधियों ने छोड़ा है और महिलाओं के लिए भी उस संपत्ति में हिस्सा है जिसे मां-बाप और संबंधियों ने छोड़ा है, चाहे थोड़ा हो या ज़्यादा यह हिस्सा निर्धारित है।

    सूरे निसा में पति-पत्नी के बीच संबंधों का भी उल्लेख किया गया है कि यह संबंध परिवार को मज़बूत बनाने में निर्णायक होते हैं। क़ुरआन की दृष्टि में पति-पत्नी दांपत्य जीवन के आधारों को मज़बूत करने के लिए एक दूसरे के साथ अच्छा व्यवहार करें। सूरे निसा की आयत संख्या में 19 में अनुशंसा की गयी है कि उनके साथ अच्छा व्यवहार करो। “व आशेरूहुन्ना बिल मअरूफ़े फ़इन करेहतुमूहुन्ना फ़असा अन तकरहू शैअन व यजअलल लाहु फ़ीहे ख़ैरन कसीरा” अर्थात उनके साथ अच्छा व्यवहार करो, यदि उन्हें पसन्द न करते हो तो कभी किसी चीज़ को तुम पसंद न करो किन्तु ईश्वर ने उसमें तुम्हारे लिए बहुत भलाई रख दी हो।

    पवित्र क़ुरआन में चरित्रवान और ईमान रखने वाली महिलाओं से विवाह को एक स्थिर व स्वस्थ परिवार का आरंभिक बिन्दु कहा गया है और अज्ञानता के काल विपरीत महारिम अर्थात सगे संबंधियों के बीच विवाह को वर्जित किया है। पारिवारिक संबंध को पवित्र तथा हर प्रकार की भ्रष्टता से सुरक्षित होना चाहिए। सगे-संबंधियों से विवाह इस प्रकार की भ्रष्टता का एक उदाहरण है।
    भिन्नता सृष्टि की व्यवस्था का आधार है। मनुष्यों के बीच अंतर भी बुद्धिमत्तापूर्ण लगता है और यह मानव समाज की पारस्परिक ज़रूरतों को दूर करने के लिए है। ईश्वर ने पुरुष और महिला को अलग अलग विशेषताओं के साथ पैदा किया ताकि एक दूसरे के पूरक हों और पारस्परिक ज़रूरतों को पूरा करें।

    इस्लामी इतिहास में मिलता है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम की एक धर्मपत्नी हज़रत उम्मे सलमा ने उनसे पूछा, क्यों पुरुषों को जेहाद की अनुमति है महिलाओं को नहीं? काश हम पुरुष होते और जेहाद करते और हमारी भी उनकी भांति सामाजिक स्थिति होती। इस प्रश्न के उत्तर में सूरे निसा की आयत क्रमांक 32 उतरी जिसमें बल दिया गया है कि पुरुष और महिला में हर एक को उसकी कोशिशों का फल मिलेगा। “वला ततमन्नव मा फ़ज़्ज़लल लाहु बेहि बअज़कुम अला बअज़,लिर्रेजाले नसीबुम मिम्मक तसबू वलिन निसाए नसीबुम मिम्मक तसबना, वसअलुल लाहा मिन फ़ज़लेहि इन्नल लाहा काना बिकुल्ले शैइन अलीमा” अर्थात जो कुछ ईश्वर ने तुममें से कुछ को दूसरे पर वरीयता दी है उसकी कामना न करो। जो कुछ पुरुषों ने कमाया उसके अनुसार उनका हिस्सा है और जो कुछ महिलाओं ने कमाया उसके अनुसार उनका हिस्सा है। ईश्वर से भलाई की प्रार्थना करो कि वह हर चीज़ का ज्ञान रखता है।

    विवाह से पति-पत्नी के बीच रिश्ते मज़बूत होते हैं। साथ ही यह भी संभव है कि उनके बीच किसी विषय पर मतभेद भी हो। कभी यह मतभेद इतने गहरे हो जाते हैं कि पारिवारिक जीवन ख़तरे में पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में पवित्र क़ुरआन पति-पत्नी के बीच मतभेद को पारिवारिक अदालत में हल करने का सुझाव देता है। पवित्र क़ुरआन दोनों पक्षों के परिजनों से मतभेद को ख़त्म करने के लिए कोशिश करने का अनुरोध करता है ताकि दांपत्य जीवन टूटने न पाए। इस प्रकार पति के परिवार से एक व्यक्ति और पत्नी के परिवार से एक व्यक्ति जज के रूप में पति पत्नी के बीच संबंधों में सुधार के लिए आपस में विचार विमर्श करें और एक निर्णय लेकर समस्या को हल करें।
    इस बिन्दु को सूरे निसा की आयत क्रमांक 35 में ईश्वर कह रहा है,

    “वइन ख़िफ़्तुम शेक़ाक़ा बयनहुमा फ़बअसू हकमन मिन अहलेहि व हकमन मिन अहलिहा, इन युरीदा इस्लाहन युवफ़्फ़िक़िल लाहु बयनहुमा, इन्नल लाहा काना अलीमन ख़बीरा” अर्थात यदि उनके बीच अलगाव का डर हो तो जज के रूप में एक व्यक्ति को पति के घर से और एक व्यक्ति पत्नी के घर से नियुक्त करो यदि वे मेल-जोल का इरादा रखते हों। ईश्वर दोनों के बीच सहमति पैदा कर देगा क्योंकि ईश्वर सर्वज्ञानी व जानकार है।

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