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    ईश्वर और उसके दूत :1

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    वास्तव में ईश्वरीय दूत ही मनुष्य द्वारा ईश्वर की पहचान में मुख्य सहायक होते हैं इस लिए ईश्वरीय दूतों की पहचान वास्तव में ईश्वर की पहचान का एक भाग है।

    इस से पहले इस श्रंखला के आरंभ में हम विस्तार से इस बात पर चर्चा कर चुके हैं कि बुद्धि रखने वाले मनुष्य के सामने अपने लोक- परलोक सृष्टि और इसी प्रकार के ढ़ेर

    सारे विषयों के बारे में बहुत से प्रश्न आते हैं किंतु उनमें से कुछ प्रश्नों का उत्तर पाना हर बुद्धिमान मनुष्य के लिए आवश्यक होता है

    और यदि कोई स्वस्थ बुद्धि रखता होगा तो उसके मन में कुछ प्रश्न अवश्य उठेंगे और जब तक उसे उन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलेगा तब तक उसके मन को शांति भी नहीं प्राप्त होगी।

    इस प्रकार के प्रश्नों में से कुछ प्रश्न यह हो सकते हैं

    संसार और मनुष्य के अस्तित्व का मूल स्रोत किया है? और उनका संचालन व निर्देशन किस के हाथ में है?

    यदि वास्तविक सफलता व कल्याण तक पहुंचने के लिए जीवन के सही मार्ग की पहचान आवश्यक है तो सही मार्ग की पहचान कैसे होगी? क्या इसके लिए कोई विश्वस्त साधन है?

    उस मार्ग तक पंहुचाने वाला कोई भरोसेमंद सहारा है? यदि है तो किस के पास है? इन प्रश्नों का उत्तर धर्म के तीन मूल सिद्धान्तों में निहित है

    और वह तीन मूल सिद्धान्त एकेश्वरवाद, प्रलय और ईश्वरीय दूतों के आगमन पर विश्वास है।

    इस श्रंखला के आरंभ में यदि आप को याद हो तो हमने ईश्वर की पहचान पर चर्चा की और चर्चा के दौरान हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि

    हर वस्तु का मूल स्रोत इस संसार का रचयिता और पालनहार है और सब कुछ उसके नियंत्रण व तत्वज्ञान के अंतर्गत चल रहा है

    और इस सृष्टि की कोई भी वस्तु किसी भी स्थान में किसी भी स्थिति में किसी भी तरह से ईश्वर से आवश्यकतामुक्त नहीं हो सकती।

    हमने अब तक की चर्चा में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि इस संसार का कोई रचयिता है इसके साथ ही

    उस रचयिता की कुछ विशेषताओं का भी वर्णन किया और इसके लिए केवल बौद्धिक तर्कों का ही सहारा लिया गया किंतु जब बौद्धिक तर्कों से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध हो गया है

    अर्थात यदि हमने मान लिया है कि इस संसार का स्वामी एक अनन्त शक्ति स्रोत व आवश्यकता मुक्त अस्तित्व है और उसका अस्तित्व ऐसा है

    जिसके आयामों को पूरी तरह से समझना असंभव है किंतु उसके चिन्हों और लक्षणों से उसकी विशेषताओं के कुछ भागों को समझा जा सकता है

    तो अब इस चरण की वार्ता में हम कुछ बातें उसके हवाले से कर सकते हैं अर्थात बौद्धिक तर्कों के साथ ही साथ ईश्वर के कुछ आदेशों का भी हवाला दे सकते हैं।