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    ईश्वर की शक्ति व इरादा : 2

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    शक्ति की जो परिभाषा है उसमें अधिकार व इच्छा भी शामिल। अर्थात सही अर्थ में शक्तिशाली वही होता है जिसकी शक्ति इच्छा व अधिकार के नियत्रंण में होती है।

    ईश्वर के संदर्भ में हम यह कहते हैं कि जिस प्रकार ईश्वर में परम शक्ति होती है उसी प्रकार उसमें परम अधिकार भी होता है और कोई भी कारक उसे किसी काम पर विवश नहीं कर सकता अर्थात उसकी शक्ति पूर्ण रूप से उसके नियंत्रण में होती है।

    किसी भी प्रकार से न तो उस पर दबाव डाला जा सकता है और न ही उसे विवश किया जा सकता है क्योंकि सृष्टि में शक्ति जहां जहां भी है सब उसी की प्रदान की हुई है इस लिए वह अपनी ही प्रदान की हुई वस्तु से विवश नहीं हो सकता ।

    ईश्वर की शक्ति के बारे में हमारा यह मानना है कि वह सर्व शक्तिमान है। उसकी शक्ति की, स्वयं उसकी भांति सीमा नहीं है और वह जो चाहे कर सकता है उसकी शक्ति उसके इरादे के नियत्रंण में है। वह जो भी करता है अपनी इच्छा और इरादे से करता है।

    यद्यपि उसकी इच्छा और इरादा हमारी इच्छा और इरादे से बहुत भिन्न होता है क्योंकि हमारी इच्छा, इरादे और फ़ैसलों या कुछ करने के निर्णयों पर बहुत से भीतरी व बाहरी तत्व प्रभाव डालते हैं। किंतु ईश्वर के बारे में ऐसा नहीं है। इस चर्चा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-

    • ईश्वर सर्व शक्तिमान है और वह हर काम कर सकता है।

    • हर काम कर सकने का यह अर्थ नहीं है कि वह हर काम करता भी है बल्कि उसकी शक्ति उसके इरादे के अधीने है अर्थात ईश्वर जो चाहता है करता है और जो नहीं चाहता नहीं करता।

    • ईश्वर हर काम कर सकता है इसमें वह काम नहीं आते जो स्वयं ही बौद्धिक रूप से असंभव हों। जैसे दो को चार में बदलना बिना कोई संख्या बढ़ाए। • मनुष्य जब कोई काम करने का फैसला करता है तो इस फैसले में बहुत से भीतरी और बाहरी तत्व प्रभावशाली होते हैं किंतु ईश्वर के बारे में ऐसा नहीं है।