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    उधार की ज़िन्दगी

    उधार की ज़िन्दगी
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    पाठको! आज की कड़ी में एक ऐसे व्यक्ति की जीवन पर आधारित कहानी प्रस्तुत है जो बहुत निकम्मा था और अपना जीवन लोगों के उधार के पैसों पर बिताता था।

    प्राचीन काल में एक नगर में एक बहुत ही निर्धन व्यक्ति रहता था उसके पास दुनिया की कोई चीज़ नहीं थी। वह कभी भी काम की खोज में नहीं जाता और सदैव इनसे उनसे ऋण लेता था दुकान से चीज़ें उधार में ख़रीदारी करता था। अंततः एक दिन ऋण देने वाले लोग थक गये और उन्होंने नगर के न्यायधीश के पास जाकर उस निकम्मे निर्धन व्यक्ति की शिकायत की। न्यायधीश ने निर्धन व्यक्ति को गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया। निर्धन व्यक्ति बहुत पेटू था। वह जेल में भी बहुत खाना खाता था परंतु उसका पेट नहीं भरता था। परिणाम स्वरुप उसने जेल में दूसरे बंदियों का खाना चुरा कर या छीन कर खाना आरंभ कर दिया। कुछ समय गुज़रा था कि जेल के बंदी भी उससे तंग आ गये और उन्होंने नगर के न्यायधीश से उसकी शिकायत की और कहा कि यह व्यक्ति दूसरे बंदियों की समस्या का कारण बन गया है और कोई बंदी भी इससे प्रसन्न नहीं है इसने सबकी नींद हराम कर रखी है। न्यायधीश ने निर्धन व्यक्ति को बुलाया और उससे बात की। उसके पश्चात उसने दूसरे बंदियों से वार्ता की और समीक्षा के बाद समझ गया कि बंदी जो बात कह रहे हैं वह सही है। इसके बाद उसके सामने निर्धन व्यक्ति को जेल से स्वतंत्र करने के लिए अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं था। निर्धन व्यक्ति ने न्यायधीश से कहा मेरे पास कुछ नहीं है और मैं केवल आपके उपकार से जीवित हूं। न्यायधीश सोच में पड़ गया। उसने सोचा कि यदि निर्धन व्यक्ति को स्वतंत्र कर देता हूं तो दोबारा वही समस्या पेश आयेगी। ऋण देने वाले लोग दोबारा उसकी शिकायत करेंगे और वह निर्धन व्यक्ति को दोबारा जेल में डालने के लिए बाध्य होगा फिर जेल के बंदी भी उसकी शिकायत करेंगे। इसके बाद उसने सोचा कि बेहतर यही है कि दूसरे विकल्प के बारे में सोचें। नगर के न्यायधीश ने आदेश दिया कि निर्धन व्यक्ति को एक ऊंट पर बिठाकर पूरे नगर की गली और बाज़ार में घुमाया जाये और उसे नगर के समस्त लोगों को पहचनवाया जाये तथा लोगों से यह बता दिया जाये कि यह व्यक्ति निर्धन है और इसके पास कुछ नहीं है। इस आधार पर किसी को भी इस बात का अधिकार नहीं है कि वह इसे ऋण दे या कोई चीज़ उधार दे और यदि किसी ने इस बारे में शिकायत की तो उसकी शिकायत सुनी नहीं जायेगी। इसके बाद निर्धन व्यक्ति को जेल से बाहर ले जाया गया ताकि उसके बारे में न्यायधीश का निर्णय लागू किया जाये। संयोग से एक व्यक्ति, जो ईंधन बेचता था, अपने ऊंट के साथ वहां से गुज़रा। न्यायधीश के कर्मचारियों ने उसे बुलाया और निर्धन व्यक्ति को ऊंट पर सवार कर दिया और उसके मालिक से कहा कि ऊंट की नकेल पकड़ कर आगे-आगे चले और निर्धन व्यक्ति को गली एवं बाज़ार में फिराये। जिस व्यक्ति का ऊंट था वह बहुत चीखा-चिल्लाया कि मुझे मेरे ऊंट की आवश्यकता है परंतु किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। सारांश यह कि सुबह से शाम तक निर्धन व्यक्ति को ऊंट पर बिठाकर नगर की गली एवं बाज़ार में फिराता रहा है और लकड़हारा अपने ऊंट के लिए बहुत चीखा-चिल्लाया कि उसे अपने ऊंट की आवश्यकता है परंतु उसके प्रयास का कोई लाभ नहीं हुआ और कर्मचारियों ने निर्धन व्यक्ति को ऊंट की पीठ पर बिठाकर नगर की गली और बाज़ार में फिराया और वे हर गली व बाज़ार में तथा दुकान के समक्ष चिल्लाये कि हे लोगों जान लो कि यह व्यक्ति बहुत निर्धन है इसके पास फूटी कौड़ी भी नहीं है। ख़बरदार उसे ऋण मत देना या कोई चीज़ उधार पर मत बेचना क्योंकि उसके पास वापस करने की क्षमता नहीं है। जान लो कि यदि इसके बाद किसी ने उसकी शिकायत की तो उसकी शिकायत नहीं सुनी जायेगी और हम इस व्यक्ति को जेल में भी नहीं डालेंगे। ख़ूब अच्छी तरह इस व्यक्ति को देख लो इसके साथ कोई सौदा नहीं करना और इसकी बातों व इसके वादे के धोखे में नहीं आना। जब रात हो गयी तो कर्मचारियों ने निर्धन व्यक्ति को ऊंट से नीचे उतरने और उसे अपने घर जाने का आदेश दिया और उससे कहा कि अब लोगों की समस्या का कारण न बने। कर्मचारियों ने इसके बाद उससे यह भी कहा कि अब तुम्हें काम पर जाना होगा और अपनी आजीविका तुम्हें स्वयं कमानी होगी। निर्धन व्यक्ति जब ऊंट से नीचे उतरा तो ऊंट के मालिक ने उसका कालर पकड़ करके उससे कहा तुम सुबह से शाम तक मेरे ऊंट पर बैठे रहे और मुझे काम पर नहीं जाने दिया मेरा पूरा दिन बेकार गया अब तुम्हें शराफत से मेरे ऊंट का किराया देना होगा क्योंकि मेरे पास बीवी-बच्चे हैं और मैं ग़रीब भी हूं। निर्धन व्यक्ति ने जब ऊंट के मालिक की ये बातें सुनी तो वह बहुत हंसा, इतना हंसा की, हंसी से उसका पेट फटा जा रहा था। ऊंट के मालिक ने उससे आश्चर्य से पूछा क्यों हंस रहे हो? क्या मैंने कोई ऐसी बात कह दी है जिससे हंसी आये? निर्धन व्यक्ति ने, जो हंसे जा रहा था, ऊंट के मालिक से कहा अभी तक हम क्या कर रहे थे? तुम्हारा ध्यान व दिमाग कहां है? क्या तूने सुबह से शाम तक नहीं सुना कि न्यायधीश के कर्मचारियों ने क्या कहा? क्या तूने नहीं सुना कि वे कह रहे थे कि यह व्यक्ति निर्धन है और इसके पास कुछ नहीं है परंतु लगता है कि तुम बहुत लालची हो और तुमने उनकी चेतावनियों को नहीं सुना और उस पर ध्यान नहीं दिया।