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    एकता सप्ताह

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    एकता सप्ताह , 12 – 17 रबीउल अव्वल

    उस दिन कि जब काबे के आकाश से पैग़म्बरी अर्थात ईश्वरीय दूत का सूर्य उदय हुआ तो कोई भी नहीं सोच रहा था कि अज्ञानता में डूबी हुई मानवता के लिए उसके पास बहुत से उपदेश एवं कहने के लिए अनेक बातें हैं। विश्वसनीय और सत्यवादी मोहम्मद (स) ने निष्ठा, पवित्रता और महानता के साथ मानवता का मार्गदर्शन किया तथा एकेश्वरवाद का नारा लगा कर सच्चाई एवं वास्तविकता के प्यासे हृदयों में आध्यात्मिकता की रूह अर्थात आत्मा फूंक दी। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने दूरदर्शिता एवं सूझबूझ के साथ इस्लामी समुदाय के नेतृत्व का पतवार अपने हाथ में लिया तथा धर्म में निष्ठा रखने वालों के बीच एकजुटता उत्पन्न करके विभाजित और बिखरे हुए मुसलमानों के बीच एकता और भाईचारा स्थापित किया। मुहाजिर, अर्थात मक्के से मदीने की ओर पलायन करने वाले एवं अंसार, अर्थात मदीना वासी आपस में भाई बन गए और अज्ञानता काल के द्वेष को हृदयों से निकाल फेंका। भाईचारे की रक्षा एवं स्थिरता हेतु दयालु ईश्वरीय दूत ने ईश्वर का यह संदेश सबके कानों तक पहुंचाया कि “आप सब ईश्वरीय रस्सी को मज़बूती से थाम लें तथा तितर बितर न हों” (आले इमरानः103)

    आज हम महानता और नेकियों के उसी प्रतीक पैग़म्बरे इस्लाम (स) के शुभ जन्म दिवस के बारे में शियाओं और सुन्नियों के बीच मतभेद को सुखद एकजुटता में परिवर्तित कर रहे हैं। अधिकांश सुन्नियों के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम (स) का जन्म 12 रबीउल अव्वल को हुआ और अधिकांश शियों के अनुसार 17 रबीउल अव्वल को।

    इस्लामी क्रांति के नेता आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई के अनुसार, “पैग़म्बरे इस्लाम (स) का पवित्र अस्तित्व इस्लाम के समस्त चरणों में मुसलमानों को एक सूत्र में पिरोने का मुख्य कारण रहा है और आज भी हो सकता है, क्योंकि आपके पवित्र अस्तित्व पर प्रत्येक मुसलमान का विश्वास प्रेम और निष्ठा से भरा हुआ है, अतः वह महान पुरुष समस्त मुसलमानों के विश्वास और प्रेम का केंद्र एवं ध्रुव है, और यही केन्द्र व धुरी होना मुसलमानों के बीच एकजुटता एवं इस्लामी संप्रदायों में निकटता का कारण है।”

    अब जहां विश्वासों में निकटता हो और आकांक्षाएं एक ही क्षितिज की ओर देखती हों तो मुसलमानों की विशाल जनसंख्या के हृद्यों पर भाईचारे की भावना का वास हो जाता है। भाईचारे एवं एकजुटता का संदेश देकर पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने मुसलमानों के विश्वासों एवं विचारों के आधार में सुधार किया। ऐतिहासिक प्रमाणों में उल्लेख है कि पैग़म्बरे इस्लाम अपने 740 साथियों के साथ नख़लिया क्षेत्र में थे कि जिबरईल आपकी सेवा में उपस्थित हुए और कहाः ईश्वर ने फ़रिश्तों के बीच भाईचारे की स्थापना की है। इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम ने भी अपने साथियों के बीच भाईचारे का अनुबंध कराया। बिहारुल अनवार-खण्ड,38 में लिखा हुआ है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अबूबक्र और उमर के बीच, उस्मान और अब्दुर्रहमान के बीच, सलमान और अबुज़र के बीच, तलहा और ज़ुबैर के बीच, मुसअब और अबू अय्यूब अंसारी के बीच, मिक़दाद और अम्मार के बीच, आयशा और हफ़्सा के बीच, उम्मे सलमा और सफ़िया के बीच भाईचारे का अनुबंध कराया और स्वयं भी हज़रत अली (अ) के साथ भाईचारे का अनुबंधन किया। यह बंधन इतना मज़बूत एवं सुद्रढ़ था कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने आदेश दिया कि ओहद युद्ध के दो शहीदों अब्दुल्लाह बिन उमर और उमर बिन जमूह को कि जिनके बीच भाईचारे का अनुबंध था एक क़ब्र में दफ़नाया जाए।

    .ध्यान योग्य बात यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) के कांधों पर वैश्विक ज़िम्मेदारी थी। उन्होंने अज्ञानता दूर करने और अधिकारों के उल्लंघन को समाप्त करने हेतु इस विश्व में क़दम रखा। आज भी धोखा देने वाले भौतिक आकर्षणों की छाया में आधुनिक अज्ञानता का भार मनुष्य के कांधों पर लादा जा रहा है। अतः आज भी मानवता को आध्यात्मिकता, निष्ठा, नैतिकता, तथा सत्य को उजागर करने वाली और उसकी ओर मार्गदर्शित करने वाली शिक्षाओं की आवश्यकता है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) के शुभ जन्म दिवस की वर्षगांठ के अवसर पर सबसे बड़ा पुण्य, मानव समाज को एकेश्वरवाद, शिष्टाचार और न्याय अर्पित करना है। आज विश्व को ऐसे प्रकाश की आवश्यकता है कि जो अलौकिक ईश्वरीय संदेश की शिक्षा के बग़ैर संभव नहीं है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) भाईचारे, स्वतंत्रता और सुरक्षा के अग्रदूत हैं। उनके अनुयाईयों को चाहिए कि स्वयं को आतंरिक बुराईयों एवं नींच भावनाओं से कि जो दुनिया को भ्रष्ट करती हैं बचाएं तथा सही समझबूझ एवं बौद्धिक जीवन प्राप्त करें। अगर मुसलमान अपने अमल, सामाजिक एवं व्यक्तिगत व्यवहार और प्रशासनिक आदर्शों को इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप ढाल लें तो वे महान पैग़म्बरे इस्लाम (स) के संदेश को विश्व भर के लोगों तक पहुंचा सकते हैं और ख़ुद भी मान सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। आज मुसलमानों में इस्लामी उत्साह और आकर्षण बढ़ रहा है तथा इस्लामी देशों में लाखों लोग सक्रिय हैं। यदि यह शक्तिशाली लोग एकजुट हो जाएं और स्वयं को ईश्वरीय एवं मानवीय सदगुणों से सुसज्जित करलें तो न केवल ख़ुद को और इस्लामी जगत को बल्कि मानवता को एक आशा देने वाले एवं निष्पक्ष विश्व का वचन दे सकते हैं।

    अंतिम ईश्दूत हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) ने हर प्रकार के जातीय भेदभाव और ऊंचनींच को मिटाकर तथा मनुष्यों के बीच धार्मिक संबंध स्थापित करके धर्म के उत्कृष्टतम एवं अंतिम रूप को विश्व के सामने प्रस्तुत किया। ईश्वर और उसके दूत ने इस विस्तृत एवं पूर्ण धर्म को इस्लाम का नाम दिया और इस अंतिम ईश्वरीय दूत के अनुयाई मुसलमान के रूप में पहचाने गए। एकेश्वरवाद, नबूवत एवं मृतोत्थान इस्लाम के मूल सिद्धांत हैं और जो इन पर ईमान रखता हो वह मुसलमान है। पैग़म्बरे इस्लाम की दृष्टि में एक मुसलमान में कुछ आचार व्यवहार होते हैं कि जिनसे सुसज्जित होना उनके अनुयाईयों के लिए ज़रूरी है।

    . पैग़म्बरे इस्लाम (स) के अनुसार, मुसलमान वह है कि जिसकी ज़बान और हाथ से दूसरे सुरक्षित रहें। अत्याचार महा पाप एवं क्षमा करने योग्य नहीं है। दूसरों के अधिकारों और मर्यादाओं का उल्लंघन, मनुष्य के मानसिक स्वास्थय और स्थिरता के लिए हानिकारक है तथा आपसी मतभेदों एवं झगड़ों का महत्वपूर्ण कारण है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने भाईचारे की आत्मा के पुनर्निर्माण और भांति भांति के अत्याचारों विशेषकर नैतिक अत्याचार से छुटकारे पर बल दिया और कहा “मुसलमान, मुसलमान का भाई है, वह उसपर अत्याचार नहीं करता है और उसे बुरा भला नहीं कहता है तथा ज़बान से अपशब्द नहीं निकालता है” स्पष्ट है कि भाईचारे का अनुबंध स्थापित करने से अधिक महत्वपूर्ण इस बंधन की सुरक्षा अहम है। इस्लामी शिक्षाओं में ऐसे लोगों की कड़ी आलोचना की गई है कि जो अपने धार्मिक भाईयों को छोड़ देते हैं बल्कि बल दिया गया है कि यदि तुम्हारा कोई भाई तुमसे दूरी बना ले तो तुम उससे मेल जोल रखो और अगर वह तुम से नाता तोड़ ले तो तुम उससे बंधन स्थापित करो।

    . विश्वासघात, झूठ और एक दूसरे की सहायता करने से बचना एकता और मित्रता तथा इस्लामी समाज के विकास के रास्ते में रुकावट है। पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा है कि मुसलमान मुसलमान का भाई है वह उसके साथ विश्वासघात नहीं करता है और उससे झूठ नहीं बोलता है तथा उसकी सहायता से दामन नहीं बचाता है। स्पष्ट है कि विश्वासघात और झूठ विश्वास को नष्ट कर देता है और परिणामस्वरूप जो मुसलमान एक दूसरे पर भरोसा नहीं करते हों तो वह एक दूसरे की सहयाता भी नहीं करेंगे। इस्लामी समाज के सदस्यों के अपमान एवं तिरस्कार का लाभ उठाकर शत्रु उनपर आसानी से वर्चस्व जमा लेता है तथा उनके विशाल स्रोतों का विनाश कर देता है।

    . पैग़म्बरे इस्लाम के अनुसार, मुसलमान को मुसलमान का आईना होना चाहिए। एक ओर से उसकी अच्छाईयों और गुणों को देखे और प्रतिबिंबित करे और दूसरी ओर से उसकी बुराईयों और कमियों के संबंध में उसे चेतावनी दे। मुसलमानों को चाहिए स्वच्छ आर्थिक जीवन यापन और समाजिक आधारभूत ढांचे के निर्माण में एक दूसरे की सहायता करें तथा आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति एवं विकास और प्रगति के लिए भूमि प्रशस्त करें। यह वही वास्तविकता है कि जिसकी इस्लामी जगत को बहुत आवश्यकता है। पैग़म्बरे इस्लाम ने इस संबंध में कहा है कि मुसलमान मुसलमान का भाई है तथा जल एवं वृक्ष सब के लिए हैं, और आर्थिक विकास के लिए मुसलमान एक दूसरे की सहायता और एक दूसरे के साथ सहकारिता करते हैं।

    . यह वाक्य बहुत सुना है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) का कहना है कि जो कोई भी सुबह उठे और मुसलमानों से संबंधित मामलों में विचार न करे वह मुसलमान नहीं है। धार्मिक विशेषज्ञों का कहना है कि यहां मुसलमानों के मामले से तात्पर्य व्यापक है। मुसलमानों के मामले में, मुसलमानों की सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक आवश्यकताएं एवं समस्याएं शामिल हैं। मुसलमानों के इन मामलों की कभी भी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

    क़ुराने मजीद में आया है कि सम्मान व अभिमान ईश्वर और उसके दूत एवं धर्म में निष्ठा रखने वालों के लिए है। सुरए बक़रा की 156वीं आयत में उल्लेख है कि सर्व शक्ति ईश्वर से शेष है। कितना अच्छा होगा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) के प्रकाश की छत्रछाया में मुसलमान इस्लाम की विशिष्टता और स्वयं के सम्मान एवं मोक्ष के लिए प्रयास करें। क़ुराने मजीद के सूरए फ़तह की 29वीं आयत में पैग़म्बरे इस्लाम और मुसलमानों की सुन्दर तस्वीर प्रस्तुत की गई हैः मोहम्मद (स) ईश्वर के दूत हैं और जो उनके साथ हैं वे नास्तिकों के मुक़ाबले में मज़बूत एवं सुद्रढ़ तथा आपस में दयालू व कृपालु हैं, सदैव उनको सजदे एवं रुकू अर्थात नमाज़ में ईश्वर के समक्ष झुकने की अवस्था में पाओगे ऐसी स्थिति में कि जब सदैव ईश्वर के अनुग्रह और संतुष्टि के इच्छुक होते हैं। उनकी पहचान उनके मुख पर सजदे का निशान है।

    इस आयत और अन्य दसियों आयतों एवं रिवायतों में यह संदेश है कि शत्रुओं के मुक़ाबले में मुसलमानों की सफलता, सम्मान एवं अभिमान का रहस्य एकता, समन्वय और आपसी सहानुभूति में है।

    इस्लाम के प्रकाशमय सूर्य के शुभ जन्म दिवस की वर्षगांठ और और एकता सप्ताह के अवसर पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

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