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    एक विषय जिस को हमें भूलना नहीं चाहिए

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    बड़े ध्यान और गंभीर फ़िक्र के साथ इमाम (अ) की गुरुत्व व महा गुफ़्तगु वर्णना हुआ है. क्या पैग़म्बरे अकरम (स.) के लिए यह मुमकिन है कि जान्शीन और समस्त प्रकार मुस्लिम उम्मत की रह्बरी को फरामोश करे?

    कभी संभव नहीं है क्योंकि इमाम-मासूम (अ) का सम्पर्क अल्लाह से है. और वह अल्लाह इस स्थान को कभी अत्याचारी व्यक्ति को प्रदान नहीं करता।

    अपर तरफ़ पैग़म्बरे अकरम स0 आपने जीवन में बहूत कष्ट और दुख़ उठाएं, इस के बाद आप से संभव हो सका कि मक्तबे इस्लाम को बुनयाद रखे। आया हिकमत और वसूल व अक़्ल यही कह रही है कि अपनी प्यारी उम्मत को बगैर जान्शीन और रह्बर के परित्याग़ करके चले जाएं? आया अक़्ल भी यही कहती है कि पैग़म्बरे अकरम (स.) इस गुरुत्व व महतपूर्न विषय के सम्पर्क में खामोश रहें?! आया यह क़ाबिले क़बूल के उपयुक्त है. कि पैग़म्बरे अकरम (स.) कई दीन के लिए मदीना के बाहर जाए और लोगों के लिए महा इस्लामी राष्ट्र में अपनी स्थान पर किसी एक को ना बैठाएं। और लोगों को अपनी अबस्था पर छोढ़ दे?! आया क़बूल के उपयुक्त है. कि इस्लाम एक अइन व विधान है जिस के लिए ज़मान और मकान निर्दष्ट नहीं,पैग़म्बरे अकरम (स.) ने इस इस्लाम और उम्मत के सम्पर्क में कुछ चिन्ता नहीं की और महा रह्बरी को आपने अबस्था में छोड़ के भूल कर चले गये ?!

    थोड़ा ध्यान व गंभीर फ़िक्र करे तो मालूम हो जाए गा, कि अक़्ल की दृष्ट में इमाम (अ) का निर्वाचन करना बहूत ज़रुरी और लाज़िम है। समस्त प्रकार इस्लामी ग्रन्थें पर्यालोचन से प्रकाश हो जाए गा कि पैग़म्बरे अकरम (स.) ने आप स्पष्ट शब्दों के साथ बयान फरमायाः ( जो व्यक्ति आपने यूग के इमाम (अ) को मारेफ़त के बगैर मृत कर जाए उस की मौत अज्ञानों की मौत है)) इस हदीस में सख़्त के साथ इमाम मासूम (अ) की रह्बरी को पहचानने के लिए बड़ी ताकीद किया है। अगर कोई इमाम मासूम के मारेत रखे बगैर मर जाएं उसकी मौत कूफ़्र और जाहिलीयत की मौत क़रार दी गई है। इन समस्त प्रकार शर्तों के साथ पैग़म्बरे अकरम (स.)कैसे राज़ी होगें कि अपनी प्यारी उम्मत को जाहिलीयत में छोड़ कर चले जाएं?!

    हाँ, पैग़म्बरे अकरम (स.) प्रथम रिसालत की मजलिस में जब अल्लाह के निर्देश से आपने निकट रिश्तेदारों को चचा अबुतालिब के घर बुलाया उस समय आपने इर्शाद किया ((– अल्लाह ने मुझ को निर्देश दिया है कि मैं तुम सबों को उस के विधानों की तरफ़ अंमत्रन करुँ, तुम में से कोई है जो हमारे जान्शीन और वसी बने?)) हज़रत अली (अ) व्यतीत कोई व्यक्ति प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, उस के बाद रसूल (स.) अपनी स्थान पर हज़रत अली (अ) को अपना ख़लीफा और जान्शीन क़रार दिया।