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    एक से ज़्यादा शादियाँ – 3

    एक से ज़्यादा शादियाँ – 3
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    इस मसले की दूसरा रुख यह भी है कि मर्दो और औरतों की आबादी के इस तनासुब से इंकार कर दिया जाये और दोनो की संख्या को बराबर मान लिया जाये लेकिन एक मुश्किल बहरहाल पैदा होगी कि फ़सादात और आफ़ात में आम तौर पर मर्दों ही की आबादी में कमी पैदा होती है और इस तरह यह तनासुब हर समय ख़तरे में रहता है और फिर कुछ मर्दों में इतनी ताक़त नही होती कि वह औरत की ज़िन्दगी को बोझ उठा सकें। यह और बात है कि ख़्वाहिश उनके दिल में भी पैदा होती है इसलिये कि जज़्बात माली हालात की पैदावार नही होते हैं उनकी बुनियाद दूसरे हालात से बिल्कुल अलग हैं और उनकी दुनिया का क़यास इस दुनिया पर नही किया जा सकता है। ऐसी सूरत में इस मसले का एक ही हल रह जाता है कि जो पैसे वाले लोग हैं उन्हे कई शादियों के लिये तैयार किया जाये और जो ग़रीब और फ़कीर लोगो हैं और मुस्तक़िल ख़र्च बरदाश्त नही कर सकते हैं उनके लिये ग़ैर मुस्तक़िल इंतेज़ाम किया जाये और यह सब कुछ क़ानून के दायरे में हो। पच्छिमी दुनिया की तरह ला क़ानूनियत का शिकार न हो कि दुनिया की हर ज़बान में क़ानूनी रिश्ते को शादी के नाम दिया जाता है और ग़ैर क़ानूनी रिश्ते को अय्याशी कहा जाता है। इस्लाम हर मसले को इंसानियत, शराफ़त और क़ानून की रौशनी में हल करना चाहता है और पच्छिमी दुनिया क़ानून और ला क़ानूनियत में किसी तरह का फ़र्क़ नही मानती। हैरत की बात है जो लोग सारी दुनिया में अपनी क़ानून परस्ती का ढिढोंरा पीटते हैं वह जिन्सी मसले में इस क़दर बेहिस हो जाते हैं कि यहाँ किसी क़ानून का अहसास नही रह जाता है और मुख़्तलिफ़ तरह के ज़लील तरीन तरीक़े भी बर्दाश्त कर लेते हैं जो इस बात की अलामत है कि पच्छिम एक जिन्स ज़दा माहौल है जिसने इंसानियत ऐहतेराम छोड़ दिया है और वह अपनी ज़िन्सीयत ही इंसानियत के ऐहतेराम और आदर की नाम दे कर अपने बुराईयों को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। बहरहाल क़ुरआने मजीद ने इस मसले पर इस तरह रौशनी डाली है: و ان خفتم الا تقسطوا فی الیتامی فانکحوا ما طاب لکم من النساء مثنی و ثلاث و ربع فان خفتم الا تعدلوا فواحدہ او ما ملکت ایمانکم ذلک ادنی الا تعدلوا (سورہ نساء ۳) और अगर तुम्हे यह डर है कि यतीमों के बारे में न्याय न कर सकोगे तो जो औरतें तुम्हे अच्छी लगें उनसे निकाह करो दो तीन चार से और अगर डर हो कि उनमें भी इँसाफ़ न कर सकोगे तो फिर एक या जो तुम्हारी कनीज़ें हैं। आयते शरीफ़ा से साफ़ ज़ाहिर होता है कि समाज के ज़हन में एक तसव्वुर था कि यतीमों के साथ निकाह करने में इस सुलूक की रक्षा करना मुश्किल हो जाता है जिसका अध्धयन उनके बारे में किया गया है तो क़ुरआने ने साफ़ वाज़ेह कर दिया है कि अगर यतीमों के बारे में इंसाफ़ मुश्किल है और उसके ख़त्म हो जाने का ख़तरा और डर हो तो ग़ैर यतीमों से शादी करो और इस मसले में तुम्हे चार तक आज़ादी दे दी गई है कि अगर इंसाफ़ कर सको तो चार शादी तक कर सकते हो। हाँ अगर यहाँ भी इंसाफ़ न कर पाने का डर हो तो फिर एक ही पर इक्तेफ़ा करो और बाक़ी कनीज़ों से फ़ायदा उठाओ।