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    एक से ज़्यादा शादियाँ – 4

    एक से ज़्यादा शादियाँ – 4
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    इसमे कोई शक नही है कि कई शादियों में इँसाफ़ करने की शर्त हवस के ख़ात्मे और क़ानून की बरतरी की बेहतरीन अलामत है और इस तरह औरत के आदर और सम्मान की पूर्ण रुप से सुरक्षा हो सकती है लेकिन इस सिलसिले में यह बात नज़र अंदाज़ नही होनी चाहिये कि इंसाफ़ वह तसव्वुर बिल्कुल बे बुनियाद है जो हमारे समाज में रायज हो गया है और जिसके पेशे नज़र कई शादी करने को एक ना क़ाबिले अमल फ़ारमूला क़रार दे दिया गया है। कहा जाता है कि इंसाफ़ मुकम्मल मसावात है और मुकम्मल मसावात बहरहाल मुमकिन नही है। इसलिये कि नई औरत की बात और होती है और पुरानी औरत की बात और। लिहाज़ा दोनो के साथ एक जैसा सुलूकमुम्किन नही है हाँलाकि यह तसव्वुर भी जाहेलाना है। इंसाफ़ के मायना सिर्फ़ यह है कि हर हक़दार को उसका हक़ दिया जाये जिसे शरीयत की ज़बान में वाजेबात की पाबंदी और हराम से परहेज़ से ताबीर किया जाता है इससे ज़्यादा इंसाफ़ का कोई मफ़हूम नही है लिहाज़ा अगर इस्लाम ने चार औरतों में हर औरत की एक रात क़रार दी है तो उससे ज़्यादा का मुतालेबा करना नाइंसाफ़ी है। घर में रात न गु़ज़ारना नाइँसाफ़ी नही है। इसी तरह अगर इस्लाम ने फ़ितरत के ख़िलाफ़ और नई और पुरानी बीवी को एक जैसा क़रार दिया है तो उनके दरमियान में फ़र्क़ करना इंसाफ़ के ख़िलाफ़ है लेकिन अगर उसी ने फ़ितरत के पेशे नज़र शादी के शुरुवाती सात दिन नई बीवी के लिये नियुक्त कर दिये हैं तो इस सिलसिले में पुरानी बीवी का मुदाख़ेलत करना ना इंसाफ़ी है। शौहर का इम्तेयाज़ी बर्ताव करना ना इंसाफ़ी नही है और हक़ीक़त यह है कि समाज ने शौहर के सारे इख़्तियारात छीन लिये हैं  लिहाज़ा उसका हर काम लोगों को ज़ुल्म नज़र आता है वर्ना ऐसे शौहर भी होते हैं जो क़ौमी या सियासी ज़रुरतों की बुनियाद पर मुद्दतों घर के अंदर दाख़िल नही होते हैं और बीवी इस बात पर ख़ुश रहती है कि मैं बहुत बड़े आदमी या मिनिस्टर की बीवी हूँ और उस समय उसे इस बात का ख़्याल तक नही आता है कि मेरा कोई हक़ पामाल हो रहा है लेकिन उसी बीवी को अगर यह बात मालूम हो जाये कि वह दूसरी बीवी के घर रात गुज़ारता है तो एक मिनट के लिये बर्दाश्त करने को तैयार न होगी जो सिर्फ़ एक जज़्बाती फ़ैसला है और उसका इंसानी ज़िन्दगी के ज़रुरियात से कोई ताअल्लुक़ नही है। ज़रुरत का ख़्याल रखा जाये तो अक्सर हालात में इंसानों के लिये कई शादियाँ करना ज़रुरत में शामिल है जिससे कोई मर्द या औरत इंकार नही कर सकती है। यह और बात है कि समाज से दोनो मजबूर है और कभी घुटन की गुज़ार कर लेते हैं और कभी बे राह रवी के रास्ते पर चल पड़ते हैं जिसे हर समाज बर्दाश्त कर लेता है और उसे माज़ूर क़रार देता है। जबकि क़ानून की पाबंदी और रिआयत में माज़ूर क़रार नही देता है।