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    एक से ज़्यादा शादियाँ – 5

    एक से ज़्यादा शादियाँ – 5
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    इस सिलसिले में यह बात भी क़ाबिल तवज्जो है कि इस्लाम ने कई शादियों में इंसाफ़ को शर्त क़रार दिया है लेकिन इंसाफ़ और अदालत को इख़्तियारी नही रखा है बल्कि उसे ज़रुरी क़रार दिया है और हर मुसलमान से मुतालेबा किया है कि अपनी ज़िन्दगी में अदालत से काम ले और कोई काम ख़िलाफ़े अदालत न करे। अदालत के मायना वाजिबात की पाबंदी और हराम से परहेज़ के हैं और इस मसले में कोई इंसान आज़ाद नही है। हर इंसान के लिये वाजिबात की पाबंदी भी ज़रूरी है और हराम से परहेज़ भी। लिहाज़ा अदालत कोई इज़ाफ़ी शर्त नही है। इस्लामी मिज़ाज का तक़ाज़ा है कि हर मुसलमान को आदिल होना चाहिये और किसी मुसलमान को अदालत से बाहर नही होना चाहिये। जिसका लाज़िमी असर यह होगा कि कई शा़दियों के क़ानून पर हर सच्चे मुसलमान के लिये क़ाबिले अमल बल्कि बड़ी हद तक वाजिबुल अमल है क्योकि इस्लाम ने बुनियादी मुतालेबा दो या तीन या चार का किया है और एक शादी को इस्तिस्नाई सूरत दी है जो कि सिर्फ़ अदालत के होने की सूरत में मुमकिन है और अगर मुसलमान वाक़ेई मुसलमान है यानी आदिल है तो उसके लिये क़ानून दो तीन या चार का ही है उसका क़ानून एक का नही है जिसकी मिसालें दीन के बुज़ुर्गों की ज़िन्दगी में हज़ारों की तादाद में मिल जायेगीं और आज भी दीन के रहबरों की अकसरियत इस क़ानून पर अमल कर रही है और उसे किसी तरह से अख़लाक़ व तहज़ीब और क़ानून और शरीयत के ख़िलाफ़ नही समझते हैं और न कोई उनके किरदार पर ऐतेराज़ करने की हिम्मत नही करता है ज़ेरे लब मुस्कुराते ज़रुर हैं कि  यह अपने समाज के जाहिलाना निज़ाम की देन है और जिहालत का कम से कम मुज़ाहेरा इसी अंदाज़ से होता है।

    इस्लाम ने कई शादियों के ना मुम्किन होने की सूरत में भी कनीज़ों की इजाज़त दी है क्योकि उसे मालूम है कि फ़ितरी तक़ाज़े सही तौर पर एक औरत से पूरे होने मुश्किल हैं लिहाज़ा अगर नाइंसाफ़ी का ख़तरा है और दामने आदालत के हाथ से छूट जाने का ख़तरा है तो इंसान बीवी के साथ संबंध बना सकता है। अगर किसी समाज में कनीज़ों का वुजूद हो और उनसे संबंध मुम्किन हो तो इस मसले में एक सवाल ख़ुद बख़ुद पैदा होता है कि इस्लाम ने इस अहसास का सुबूत देते हुए कि एक औरत से पुर सुकून ज़िन्दगी गुज़ारना इंतेहाई मुश्किल काम है। पहले कई शादियों का इजाज़त दी और फिर उसके नामुम्किन होने की सूरत में दूसरी बीवी की कमी कनीज़ से पूरी की तो अगर किसी समाज में कनीज़ों का वुजूद ने हो या इस क़दर कम हो कि हर इंसान की ज़रुरत का इंतेज़ाम न हो सके तो उस कनीज़ का बदल का क्या होगा और इस ज़रुरत का इलाज किस तरह होगा। जिस की तरफ़ कुरआने मजीद ने एक बीवी के साथ कनीज़ के इज़ाफ़े से इशारा किया है।

    यही वह जगह है जहाँ से मुतआ के मसले की शुरुवात होती है और इंसान यह सोचने पर मजबूर होता है कि अगर इस्लाम ने मुकम्मल जिन्सी हयात की तसकीन का सामान किया है और कनीज़ों का सिलसिला बंद कर दिया है और कई शादियों के क़ानून में न्याय और इंसाफ़ की शर्त लगा दी है तो उसे दूसरा रास्ता बहरहाल खोलना पड़ेगा ताकि इंसान अय्याशी और बदकारी से बचा रहे। यह और बात है कि ज़हनी तौर पर अय्याशी और बदकारी के दिलदादा लोग मुतआ को भी अय्याशी का नाम   दे देते हैं और यह मुतआ की मुख़ालेफ़त की बेना पर नही है बल्कि अय्याशी के जायज़ होने की बेना पर है कि जब इस्लाम में मुतआ जायज़ है और वह भी एक तरह की अय्याशी है तो मुतआ की क्या ज़रुरत है सीधे सीधे अय्याशी ही क्यो न की जाएँ और यह दर हक़ीक़त मुतआ की मुश्किलों का ऐतेराफ़ है और इस बात का इक़रार है कि मुतआ अय्याशी नही है इसमें क़ानून, क़ायदे की रिआयत ज़रुरी है और अय्याशी उन तमाम क़ानूनों से आज़ाद और बे परवाह होती है।

    पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपने शासन काल में और ख़िलाफ़तों के शुरुवाती दौर में मुतआ का रिवाज क़ुरआने मजीद के इसी क़ानून की अमली तशरीह था जबकि उस दौर में कनीज़ों का वुजूद था और उनसे फ़ायदा उठाया जाना मुम्किन था तो यह इस्लामी फ़ोकहा को सोचना चाहिये कि जब उस दौर में सरकारे दो आलम ने अल्लाह के हुक्म की पैरवी में मुतआ को हलाल और रायज कर दिया था तो कनीज़ों के ख़ात्में के बाद इस क़ानून को किस तरह हराम किया जा सकता है। यह तो अय्याशी का खुला हुआ रास्ता होगा कि मुसलमान उसके अलावा किसी और रास्ते पर न जायेगा और लगातार हराम काम करता रहेगा। जैसा कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) ने फ़रमाया था कि अगर मुतआ हराम न कर दिया गया होता तो बद बख़्त और शक़ी इंसान के अलावा कोई ज़ेना न करता। गोया आप इस बात की तरफ़ इशारा कर रहे थे कि मुतआ पर पाबंदी लगाने वाले ने मुतआ का रास्ता बंद नही किया है बल्कि अय्याशी और बदकारी का रास्ता खोला है और उसका उसे क़यामत के दिन जवाब देना पड़ेगा।

    इस्लाम अपने क़वानीन में इंतेहाई हकीमाना तरीक़ा इख़्तियार करता है और उससे   मुँह मोड़ने वाले को शक़ी और बद बख़्त जैसे शब्दों से याद करता है।