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    एनीमीशन फ़िल्में

    एनीमीशन फ़िल्में
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    दुनिया के हर कोने में बच्चों व किशोरों पर बनने वाली फ़िल्मों के बहुत दर्शक होते हैं और परिवार गुट बनाकर सिनेमाघरों में इस प्रकार की फ़िल्में देखने जाते हैं। भारी बिज़नेस करने वाली बाल फ़िल्में यह दर्शाती हैं कि एनीमीशन और कठपुतली वाली फ़िल्में इस सूची में सबसे ऊपर हैं और इस प्रकार की फ़िल्में बच्चे बहुत चाव से देखते हैं। बाल जगत में कल्पनाओं से लाभ उठाना और इसी प्रकार बच्चों की फ़िल्मों में लोककथाओं का प्रयोग, वह तथ्य हैं जिससे इस प्रकार की फ़िल्मों के दर्शकों की संख्या में वृद्धि होती है।

    ईरान में सिनेमा जगत के बहुत अधिक समर्थक हैं जिसमें बच्चे और बड़े दोनों ही शामिल हैं। आप के लिए यह जानना उचित होगा कि ईरान के सिनेमा इतिहास में सबसे अच्छी और सबसे अधिक कमाई करने वाली फ़िल्म कठपुतली फ़िल्म है जिसने बच्चों से विशेष टीवी धारावाहिक अर्थात छोटे पर्दे से अपना काम आरंभ किया और फिर बड़े पर्दे पर आई और अब सिनेमा जगत की सबसे प्रसिद्ध हस्तियों में गिनी जाती है।

    कुलाहे क़िरमिज़ अर्थात रेड कैप एक कठपुतली का नाम है जिसकी जीवनी, हस्ती, घटनाओं और मित्रों पर कई धारावाहिक बनाए गये और चार बड़ी फ़िल्में भी इसी भूमिका पर तैयार करके प्रिमयर के लिए भेज दी गयीं। वर्ष 1372 हिजरी शम्सी अर्थात वर्ष 1993 में इस कठपुतली की कहानी पोस्ट बाक्स नामक धारावाहिक से आरंभ हुई। इस साप्ताहिक कार्यक्रम में बच्चों के पत्र और उनके द्वारा भेजी गयीं पेंटिंग्स को दिखाया जाता था और एक प्रसन्नचित व गोल मटोल कठपुतली कार्यक्रम में मुख्य भूमिका निभाती है। कठपुतली बहुत ही साधारण व मनमोहक थी और अपनी अदाओं, चमकीली आंखों व लाल टोपी के कारण बहुत शीघ्र बच्चों में लोकप्रिय हो गयी।

    इस धारावाहिक की अपार सफलताओं के कारण इसके निर्देशकों ने एक भूमिका की लोकप्रियता पर केन्द्रित एक फ़िल्म का निर्माण किया। इस फ़िल्म में लाल टोपी नामक कठपुतली की यह कामना होती है कि वह टीवी की एंकर बने और बच्चों के कार्यक्रम स्वयं करे और निरंतर प्रयासों से उसकी कामना पूरी होती है। ईरान के सिनेमा जगत के इतिहास में यह फ़िल्म सबसे अधिक बिज़नेस करने वाली रही है। अट्ठारह वर्ष पूर्व फ़िल्म कुलाहे क़िरमिज़ व पेसर ख़ाले को केवल तेहरान में बीस लाख से अधिक लोगों ने देखा अभी तक इस रिकार्ड तक कोई फ़िल्म नहीं पहुंच सकी है।

     

    उसके बाद के वर्षों में कुलाहे क़िरमिज़ के नाम से तीन धारावाहिक व और तीन फ़िल्में तैयार की गयीं जिसका लगभग दर्शकों की ओर से भारी स्वागत किया गया और आज भी यह किरदार ईरानी जनता के निकट बहुत लोकप्रिय है। अलबत्ता इन वर्षों के दौरान अन्य किरदार मंच पर आए जिन्होंने दर्शकों के मध्य अपना स्थान बनाया। इन किरदारों में पेसर ख़ाले, पेसर अम्मे, फ़ामिले दूर और श्रीमान हमसादे का नाम लिया जा सकता है जो श्रीमान एंकर के साथ मंच पर आते हैं। वह वास्तव में सभी बड़े लोगों का एक प्रतीक है जो बच्चों को इस कठपुतली और उसकी दुनिया से परिचित कराता है।

    अब प्रश्न यह उठता है कि इन वर्षों के दौरान ईरानी बच्चों और दर्शकों के मन में  इस कठपुतली की लोकप्रियता और उसकी यादों के बाक़ी रहने का क्या कारण है?

    बच्चों के भीतरी संसार व कल्पनाओं से लाभ उठाना, लाल टोपी की सफलता का पहला रहस्य है। लाल टोपी धारावाहिक व फ़िल्म में पेश विभिन्न दृष्टिकोण वास्तव में वह विषय हैं जिससे आज के बच्चे जूझ रहे हैं। उदाहरण स्वरूप आत्म विश्वास, साहस, साधारण व बिना लगी लिपटी की मित्रता, शिष्ट व ग़लतियों से पाठ सीखना। कुलाहे क़िरमिज़ अधिकांश अवसरों पर हम सबको बच्चों के तर्क से दो राहे पर सही फ़ैसला करने और अच्छाई और बुराई में अच्छाई का चयन करना सिखाती है। दूसरे लोगों के साथ उसकी मित्रता और घुल मिल जाना ही लोगों के मध्य भारी लोकप्रियता का मुख्य कारण हो सकता है और जो लोग बचपने से यह कार्यक्रम देखने में रुचि रखते थे वर्षों बीतने के बाद भी उसी चाव से यह कार्यक्रम देखते हैं।

    बच्चे कुलाहे क़िरमिज़ में अपनी बेताबी की प्रतिक्रिया, अपनी दुष्टता, अपरिहार्य इच्छाएं देखते हैं और श्रीमान एंकर को सदैव एक कृपालु और बुद्धिमान बड़ा समझते हैं जो अंत में माता पिता भी भांति बड़ी बड़ी ग़लतियों और दुष्टता को क्षमा कर देता है। इस प्रकार से कुलाहे क़िरमिज़ और उसके विचित्र साथी एक ऐसे घर में रहते हैं कि उसमें प्रेम और स्नेह इतना अधिक है कि यदि एक भेड़ या एक गधा भी उनके मध्य आ जाए तो वह भी अपनी मीठी मीठी बातों से उस मंच पर अपनी यादें छोड़ सकता है।

     

    इस कार्यक्रम की सफलता का एक अन्य कारण यह है कि इसमें कठपुतली के खेल जैसी ईरान की पारंपरिक प्रदर्शनी से लाभ उठाया गया है जिसमें कठपुतली के किरदार की भूमिका शामिल की गयी है। उदहारण स्वरूप कुलाहे क़िरमिज़ की मीठी मीठी बातें और बयान जो कभी कभी बिना अर्थ की बातें और ग़लत होते हैं, प्राचीन काल से ईरान की पारंपरिक प्रदर्शनी में प्राचीन काल से ही मिलता है और पारंपरिक कटाक्ष प्रदर्शनी में प्रयोग किया जाता है।

    इस धारावाहिक का सबसे प्रसिद्ध व अच्छा भाग पेसर ख़ाले नामक एक अन्य कठपुतली के अस्तित्व का ऋणी है जो विदित रूप से कुलाहे क़िरमिज़ की जाति से ही है, वह कुलाहे क़िरमिज़ की भूमिका के मुक़ाबले में लड़का है और उसका आग्रह या एक बात को रटना बहुत बढ़ जाता है और समस्या जनक बन जाता है और यही विशेषता इस किरदार को लाने का मुख्य कारण है। उसमें क्षमा की आश्चर्यजनक भावना पायी जाती है और कभी अपने दुखी अंदाज़ से दर्शकों को प्रभावित करता है। अलबत्ता पेसर ख़ाले कभी ज़ोरज़बरदस्ती से प्रभावित नहीं होता और सामान्य रूप से बड़प्पन से दूसरों की ग़लतियों को अपने ज़िम्मे ले लेता है।

    अब प्रश्न यह उठता है कि इस सफल कार्यक्रम के निर्माता और निर्देशक कौन हैं? ईरज तहमास्ब और हमीद जिबेली दो ईरानी कलाकार हैं जिन्होंने लगभग बीस वर्षों से स्क्रिप्ट लिखने, निर्देशन, भूमिका निभाने, कठपुतली की आवाज़ निकालने और इस धारावाहिक के निर्माण में एक दूसरे की सहायता की है।

    एंकर की भूमिका निभाने वाले ईरज तहमास्ब का वर्ष 1959 में तेहरान में जन्मे और वह टीवी के एंकर, एक्टर, निर्देशक और स्क्रिप्ट लिखने वाले हैं। उन्होंने नाटक के विषय में तेहरान विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और पांच फ़िल्मों का निर्देशन किया। उन्होंने कुलाहे क़िरमिज़ धारावाहिक में निर्देशक, लेखक और कलाकार के रूप में भाग लिया।

     

    इस धारावाहिक के निर्माण में हमदी जिबेली ने उनका साथ दिया जो नाट्य मंच, टीवी और सिनेमा जगत में एक सफल कलाकार हैं और आरंभ में उन्होंने कुलाहे क़िरमिज़ व पेसर ख़ाले की भूमिका निभाई। वर्ष 1958 ईसवी में तेहरान में उनका जन्म हुआ और चौदह वर्ष की आयु में उन्होंने ईरान के युवा और बाल वैचारिक केन्द्र में अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने दसियों फ़िल्मों में एक्टर का रोल अदा किया और दो फ़िल्मों का निर्देशन किया और संयुक्त रूप से कुलाहे क़िरमिज़ का स्क्रिप्ट लिखा। इसके अतिरिक्त इस कलाकार ने विभिन्न धारावाहियों में एक्टिंग की और उसके स्क्रिप्ट लिखे और बच्चों के कार्यक्रमों में कई कठपुतलियों की भूमिका निभाई।

    इन दोनों कलाकारों का नाम ईरानी सिनेमा के कठपुतली धारावाहिक से वर्षों से जुड़ा हुआ है और अब लोग इन्हें इस रूप में पहचानते हैं कि यह दोनों ईरानी सिनेमा के इतिहास की सबसे श्रेष्ठ व अच्छी फ़िल्म का निर्माण कर सकते हैं और बच्चों के लिए एक और आनंदमयी क्षण को पेश कर सकते हैं।

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