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    ऐतेराज़ात और जवाबात

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    ऐतेराज़ात
    रिवायत में वारिद हुआ है कि हज़रत के जम़ाने में भेड़िये और बकरी एक मक़ाम पर चरेगें, हाँलाकि कि बकरी की तबीयत में भेड़िये से ख़ौफ़ खाना है। और भेड़िये की तबीयत में बकरी को फाड़ खाना है, चुनाँचे न तो भेड़िया ही बकरी के साथ रह सकता है और न ही बकरी ही भेड़िये के साथ रह सकती है। क़ाबिले गौर अम्र यह है कि हज़रत महदी(अ) के ज़माने में

    रिवायत में वारिद हुआ है कि हज़रत के जम़ाने में भेड़िये और बकरी एक मक़ाम पर चरेगें, हाँलाकि कि बकरी की तबीयत में
    भेड़िये से ख़ौफ़ खाना है। और भेड़िये की तबीयत में बकरी को फाड़ खाना है, चुनाँचे न तो भेड़िया ही बकरी के साथ रह सकता है और न ही बकरी ही भेड़िये के साथ रह सकती है। क़ाबिले गौर अम्र यह है कि हज़रत महदी(अ) के ज़माने में भेड़िया और बकरी किस तरह से साथ रह सकते हैं?
    इसके दो जवाब हैं:
    पहलाजवाब
    भेड़िये का फाड़ खाना उसकी असली फ़ितरत नही है बल्कि आरेज़ी है, जो भूक के सबब या भूक की तवील मुद्दत हो जाने से उस पर आरिज़ होता है और जब उसकी हिर्स व तमअ में इज़ाफ़ा होता है वह फाड़ खाने पर आमादा हो जाता है।
    और भेड़िये के मुक़ाबले में बकरी का ख़ौफ़ भी उसके ग़रीज़ा ए असली के सबब नही है बल्कि वह उसकी साबेक़ा मारेफ़त और तजरिबे के सबब उससे ख़ौफ़ करती है।
    चुँकि इमाम महदी(अ) के ज़माने में आसमान और ज़मीन की बरकतें बख़ूबी मयस्सर होगीं इस लिये न तो भेड़िया भूका होगा और न बकरी।
    दूसराजवाब
    यह अम्र ख़ुदा वंदे आलम के मोजेज़ात से होगा, जिस तरह वह मोजेज़ात अंबीया व अवलिया के बारे में होते रहते हैं।
    और यह भी मुमकिन है कि महदी की पाकीज़ा सीरत और आपके ज़माने के लोगों का पाकीज़ा किरदार इस हद तक मोवस्सिर हो कि हैवानात और दरिन्दे भी एक दूसरे पर ज़ुल्म करने से बाज़ आ जायें जैसा कि जदीद ऊलूम ने इस अम्र का इंकेशाफ़ किया है। इसके अलावा दीगर एहतेमालात का भी इमकान है।
    मज़कूरा वुजुहात की रौशनी में रिवायत में वारिद दूसरा जुमला यह कि
    महदी(अ) के ज़माना ए इमामत में बच्चे साँप और बिच्छुओ से खेलेगें। बख़ूबी समझा जा सकता है।
    यानी एक मुद बोया जायेगा और सात सौ मुद उगेगा। रिवायत में वारिद शुदा जुमला दर हक़ीक़त क़ुरआने करीम की इस आयत की जानिब इशारा है:
    तर्जमा: जो लोग अपने मालों को ख़ुदा की राह में सर्फ़ करते हैं, उनके सर्फ़ किये हुए मालों की मिसाल उस दाने की सी है जिसने सात बालीयाँ उगाई हों(और) हर बाली में से सौ(सौ) दाने हों और अल्लाह जिसे चाहता है(इसी तरह की ज़्यादती अता फ़रमाता है।)
    सूरः ए बक़रः
    महदी(अ) के ज़माने में इस क़दर पैदावार होने का सबब बिल्कुल ज़ाहिर है वह यह कि आसमान से मुसलसल बारिश होगी और ज़मीन अपनी तमामतर बरकतों तो ज़ाहिर कर देगी उस वक़्त हर एक किलो ज़राअत करने पर उसकी नतीजा सात सौ किलो पैदावार होना यक़ीनी है।
    सवाल: इस तरह की पैदावार क्यो कर मुमकिन है?
    जवाब: आज तक किसी वक़्त और किसी भी मक़ाम पर यह अम्र साबित नही हुआ है कि हर दाने से सात बालीयाँ निकली हों। और हर बाली में सौ दाने हों।
    पस यह खबर क़ुरआने हकीम ने किस ज़माने से मुतअल्लिक़ दी है?
    क्या क़ुरआने मजीद ने किसी ऐसे अम्र की ख़बर दी है जो कभी वुजूद में न आयेगा?
    क्या क़ुरआने मजीद कोई ऐसी मिसाल भी पेश करता है जिसकी कोई वाक़ेईयत और हक़ीक़त न हो। हरगिज़ हरगिज़ नही।
    पस साबेक़ा मिसाल कब सादिक़ आयेगी?
    क़ुरआने हकीम की साबेक़ा मिसाल महदी (अ) के ज़माना ए इमामत में पूरी होगी।
    तूलुलआमार
    महदी (अ) के ज़माने में लोगों की उमरें तवील होगीं।
    सवाल:
    उमरें किस लिये तूलानी होगीं?
    जवाब:
    इसलिये कि कोताह उम्र के असबाब:
    1- हिफ़ज़ाने सेहत का फ़िक़दान
    2- रंज व ग़म, नफ़सीयाती बीमारीयाँ वग़ैरह हैं।
    और जदीद इल्मे तिब ने इस अम्र की वज़ाहतकर दी है कि इंसानी मशीनरी के लिये अगर ऐसे हालात पेश न आयें जो उसको सुस्ती और काहिली की तरफ़ मायल करते हैं तो इंसान के एक तवील मुद्दत तक ज़िन्दा रहने में कोई अम्र मानेअ नही है।
    पस जब इमाम महदी के ज़माने में दुनिया और ईमान की नेमतें आम होगीं, उसूले हिफ़ज़ाने सेहत पर अमल होगा और लोगों की ज़िन्दगी सुकून व इतमीनान से गुज़रेगी तो लोग कोताही ए उम्र के अमराज़ में मुब्तला न होगें।
    अमानतोंकीअदाएगी
    हज़रत के ज़माने अमानतों की अदाएगी होगी:
    हदीस में वारिद हुआ है कि लोग अपने बादशाह के दीन पर होगें।
    पस जब उम्मत का इमाम, महदी अलक़ायम (अ) मुजस्समा ए ईमान हो, फ़लाह व बहबूदी की बुनियाद हो, ऐसे इमाम के ज़माने में लोगों को नेक और सालेह होना ही चाहिये। चुनाँचे ऐसे लोग अमानत में ख़यानत हरगिज़ न करेगें। और अमानतदारी और उसकी अदाएगी लोगों के दरमियान आम होगी।
    शरीरहलाकहोंगे
    शरीर लोग हलाक हो जायेगें
    शरीर लोगों की दो क़िस्में हैं:
    1- वह लोग हैं जिनको किसी तरह की ख़ैर व ख़ूबी और नसीहत से फ़ायदा न होगा। चुँकि यह लोग फ़साद और शक़ावत के मर्कज़ होगें। लिहाज़ा ऐसे लोगों को इमाम क़त्ल फ़रमा देगें।
    2- दुसरे वह लोग हैं जिन पर नेक माहौल और ईमानी फ़ज़ा का असर होगा। चुनाँचे महदी (अ) के ज़माना ए इमामत में सालेह और मोमिन बंदे हो जायेगें।
    इमामकेपरचमकेनीचेकोईभीदुशddमनबाक़ीनहीरहेगा।
    (इमाम(अ) के परचम तले अहले बैत(अ) का कोई भी दुश्मन बाक़ी न रहेगा।)
    दुश्मनाने अहले बैत की दो क़िस्में हैं:
    1- यह वह लोग हैं जो अहले बैत के हक़ और आपके फ़ज़्ल से जाहिल हैं। ऐसे लोग महदी(अ) के ज़माना ए इमामत में अहले बैत के फ़ज़्ल और हक़ से बख़ूबी वाक़िफ़ हो जायेगें। और आपकी विलायत से दोस्ती और मुहब्बत करेगें।
    2- यह लोग ऐसे दुश्मनाने अहले बैत हैं जिनके लिये अमीरुल मोमीनीन हज़रत अली (अ) ने इस तरह से फ़रमाया:
    तर्जुमा: यक़ीनन कुछ हमारे दुश्मन ऐसे भी हैं जिनको हम पाक व पाकीज़ा शहद भी खिलाएगें फिर भी उनकी दुश्मनी में इज़ाफ़ा होता रहेगा।
    यही वह लोग हैं जिनके वुजूद से ज़मीन को पाक करने के लिये इमाम महदी (अ) उनको क़त्ल करेगें। चुनाँचे इस तरह के दुश्मनाने अहले बैत के वुजूद से दुनिया ख़ाली हो जायेगी।
    मज़कूरा नुकात के तहत बहल बहुत तूलानी है और उससे मुतअल्लिक़ बहुत सी मिसालें मौजूद हैं। लेकिन हम इख़्तसार के पेशे नज़र कलाम को तूल देना नही चाहते।