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    औक़ाते नमाज़

    औक़ाते नमाज़
    औक़ाते नमाज़
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    सवाल 345: मज़हबे शिया पंजगाना नमाज़ों के वक़्त के बारे में किस दलील पर ऐतमाद करता है? जैसा कि आप जानते हैं कि अहले सुन्नत वक़्ते इशा के दाख़िल होने को नमाज़े़ मग़रिब के क़ज़ा होने की दलील क़रार देते हैं, ज़ोहर व अस्र की नमाज़ के बारे में भी उनका यही नज़रिया है इसी लिये वो इस बात को मानते हैं कि जब वक़्ते इशा दाख़िल हो जाता है और पेश नमाज़, नमाज़े इशा पढ़ने के लिये खड़ा हो जाये तो मामूम इसके साथ मग़रिब की नमाज़ नहीं पढ़ सकता, कि इस तरह वह मग़रिब और इशा को एक ही वक़्त में पढ़ ले?

    जवाब: शिया की दलील आयाते कुरआन और सुन्नते नबविया की बिना पर है। इसके अलावा वे बहुत सी रिवायात मौजूद हैं जो ख़ास तौर से दो नमाज़ों को मिलाकर पढ़ने के जवाज़ पर दलालत करती हैं और अहले सुन्नत के यहां भी ऐसी हदीस मौजूद है जो दो नमाज़ों को किसी एक नमाज़ के वक़्त में जमा करके अदा करने पर दलालत करती है।
    सवाल 346:  इस बात को पेशे नज़र रखते हुए कि नमाज़े अस्र का आख़री वक़्त मग़रिब है और नमाज़े़ ज़ोहर का आख़री वक़्त मग़रिब से इतना पहले तक है कि जितनी देर में सिर्फ़ नमाज़े अस्र पढ़ी जा सके, यहां में ये सवाल करना चाहता हूं कि मग़रिब से क्या मुराद है? क्या ग़ुरूबे आफ़ताब (क्या सूरज का डूबना) मुराद है? या उस शहर के सूरज निकले के मक़ाम के ऐतबार से अज़ाने मग़रिब का शुरू होना है?
    जवाब: नामज़े अस्र का वक़्त सूरज डूबने तक है।
    सवाल 347: गुरूबे आफ़ताब (सूरज का डूबना) और अज़ाने मग़रिब में कितने मिन्ट का फ़ासला होता है?
    जवाब: ज़ाहिरी तौर से ये फ़ासला मौसमों के इख़तेलाफ़ के साथ साथ घटता बढ़ता रहता है।
    सवाल 348: में तक़रीबन 11 बजे रात डयूटी से घर वापस आता हूं और काम की ख़ातिर मुलाक़ात करने वालों की तादाद की वजह से डयूटी के दौरान नमाज़े मग़रिबैन नहीं पढ़ सकता तो क्या 11 बजे रात के बाद नमाज़े मग़रिबैन का पढ़ना सही है?
    जवाब: कोई हर्ज नहीं है इस शर्त के साथ कि आधी रात न गुज़रने पाये लेकिन कोशिश कीजिये 11 बजे रात से ज़्यादा ताख़ीर न हो बल्कि जहां तक मुमकिन हो नमाज़ को अव्वले वक़्त में पढि़ये।
    सवाल 349: नमाज़ की कितनी रकअत अगर अदा के वक़्त में बजा लाई जायें तो नियते अदा सही है? और अगर शक हो कि इतनी रकअत वक़्त में पढ़ी गई हैं या नहीं तो इसका क्या हुक्म है?
    जवाब: नमाज़ की एक रकअत का आख़िरी वक़्त के अन्दर अंजाम पाना नमाज़ के अदा शुमार होने के लिये काफ़ी है और अगर शक हो कि कम अज़ कम एक रकअत के लिये वक़्त काफ़ी है या नहीं तो फिर अदा की नियत से नमाज़ पढे और अदा या क़ज़ा की नियत करे।
    सवाल 350: अलग मुल्कों में इस्लामी जमहूरिया ईरान के सेफ़ारतख़ानों (ऐमबेसियों) और कौन्सिलख़ानों की तरफ़ से बड़े शहरों और मराकिज़ के लिये नमाज़ के शरई औक़ात के नक़्शे शाया होते हैं,  सवाल ये है कि इन नक़्शों पर किस हद तक ऐतबार किया जा सकता है?
    जवाब: मेयार ये है कि इंसान को इतमितान हासिल हो जाये और अगर उसे इन नक़्शों की हक़ीक़त के मुताबिक़ होने का इतमिनान हो तो उस पर वाजिब है कि ऐहतेयात करे और उस वक़्त तक इन्तेज़ार करे जब तक उसे वक़्ते शरई के दाख़िल होने का यक़ीन हासिल न हो जाये।
    सवाल 351:  सुबहे सादिक़ (जब अंधेरा होता है और पूरी तरह से सफ़ैदी आसमान पर नहीं छाती) और सुबहे काजि़ब (जब सफ़ैदी पूरी तरह आसमान पर छा जाती है) के मसअले में आपकी क्या राये है, और इस सिलसिले में नमाज़ी की शरई ज़िम्मेदारी क्या है?
    जवाब: नमाज़ और रोज़े के वक़्त का शरई मेयार सुबह सादिक़ है और इसकी पहचान ख़ुद मुकल्लफ़ (वोह शख़्स जिस को यह मसअला पैश आया है) की ज़िम्मेदारी है।
    सवाल 352: एक स्कूल जिस में पूरे दिन क्लास होती है उसके ज़िम्मेदार हज़रात ज़ोहरैन की जमाअत को दो बजे ज़ोहर के बाद और अस्र की क्लास शुरू होने से कुछ देर पहले पढ़ते हैं, ताख़ीर की वजह ये है कि सुबह की क्लासों के दुरूस अज़ाने ज़ोहर से तक़रीबन पौन घन्टा पहले ख़त्म हो जाते हैं और ज़ोहरे शरई तक तलाबा (स्टुडेन्टस) को ठहराना मुशकिल है, लेहाज़ा अव्वले वक़्त में नमाज़ अदा करने की अहमियत को मद्दे नज़र रखते हुए आपका क्या हुक्म है?
    जवाब: अगर नमाज़ के अव्वले वक़्त में तुल्लाब हाज़िर नहीं हैं तो नमाज़ गुज़ारों की ख़ातिर नमाज़े जमाअत की ताख़ीर में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 353: क्या अज़ाने ज़ोहर के बाद नमाज़े ज़ोहर पढ़ना और वक़्ते नमाज़े अस्र के शुरू होने के बाद अस्र का पढ़ना वाजिब है और इसी तरह क्या नमाज़े मग़रिब व इशा को भी अपने अपने वक़्त में पढ़ना वाजिब है?
    जवाब: दो नमाज़ों के वक़्त के दाख़िल होने के बाद नमाज़ी को इख़तियार है कि वह दोनों नमाज़ों को मिला कर पढ़े या हर एक को उसकी फ़ज़ीलत के वक़्त में पढ़े ।
    सवाल 354:  क्या चाँदनी रातों में नमाज़े सुबह के लिये 15 मिनट से 20 मिनट तक का इन्तज़ार करना वाजिब है जबकि आजकल घड़ियों की फ़रावानी की वजह से तुलू-ए-फ़ज्र का यक़ीन हासिल करना मुमकिन है?
    जवाब: तुलू-ए-फज्र जो नमाज़े सुबह और रोज़ा शुरू होने का वक़्त है के सिलसिले में चाँदनी रातों या अंधेरी रातों में कोई फ़र्क़ नहीं है अगर्चे इस सिलसिले में ऐहतियात बेहतर है।
    सवाल 355: सूबों के दर्मियान उफ़ुक़ के इख़तेलाफ़ की वजह से औक़ाते शरीया की मिक़दार में जो इख़तेलाफ़ पैदा हो जाता है क्या वह यौमिया वाजिब नमाज़ों के तीन औक़ात में एक जैसा है, मिसाल के तौर पर अगर दो सूबों में ज़ोहर के वक़्त में 25 मिनट का इख़तेलाफ़ हो तो क्या दूसरे औक़ात में भी इतना ही और इसी मेक़दार में इख़तेलाफ़ होगा या सुबह और इशा में ये अलग होगा?
    जवाब: फ़क़त तुलू-ए-फ़ज्र ज़वाले आफ़ताब या गुरूबे आफ़ताब (सूरज का डूबना) के वक़्त के फ़र्क़ की मेक़दार के एक जैसा होने का लाज़मी नतीजा ये नहीं है कि बाक़ी औक़ात में भी इतना ही फ़र्क़ और फ़ासला हो बल्कि अलग शहरों में तक़रीबन तीनों औक़ात का इख़तेलाफ़ अलग अलग होता है।
    सवाल 356: अहले सुन्नत नमाज़े मग़रिब को मग़रिबे शरई से पहले पढ़ते हैं क्या हमारे लिये अय्यामे हज वग़ैरा में उनकी इक़तेदा में नमाज़ पढ़ना और उसी नमाज़ पर इत्तेफ़ाक़ कर लेना जाएज़ है?
    जवाब: ये मालूम नहीं है कि उनकी नमाज़ वक़्त से पहले होती है और उनकी जमाअत में शिर्कत करने और उनकी इक़तेदा करने में कोई हर्ज नहीं है और वो नमाज़ काफ़ी है लेकिन वक़्ते नमाज़ का समझना ज़रूरी है मगर ये कि वक़्त भी तक़य्ये के मौक़े में से हो।
    सवाल 357: डनमार्क और नार्वे में सुबह के सात बजे सूरज निकलता है और आसमान पर अस्र तक तक़रीबन 12 घंटे तक चमकता रहता है जबकि दूसरे मुल्कों में उस वक़्त रात होती है ऐसी सूरत में मेरी नमाज़ और रोज़े का क्या हुक्म है?
    जवाब: नमाज़े पंजगाना और रोज़े के औक़ात के लिहाज़ से इंसान के लिये उसी जगह के उफ़ुक़ का ख़याल रखना वाजिब है जहां वोह रेह रहा है और अगर दिन के लम्बे होने की वजह से रोज़ा रखना ग़ैर मक़दूर या शाक़ हो तो उस वक़्त अदाये रोज़ा साकि़त है और बाद में उसकी क़जा वाजिब है।
    सवाल 358:  सूरज की शोआएं तक़रीबन सात मिनट में ज़मीन तक पहुंचती हैं तो क्या नमाज़े सुबह के वक़्त के ख़त्म होने का मेयार तुलू-ए-आफ़ताब है या इसकी शुआओं का ज़मीन तक पहुंचना?
    जवाब: मेयार तुलू-ए-आफ़ताब और उसका नमाज़ गुज़ार के उफ़ुक़ में देखा जाना है।
    सवाल 359:  ज़राये इब्लाग़ हर रोज़ आने वाले दिन के शरई औक़ात का ऐलान करते हैं, क्या इन पर ऐतमाद करना जाएज़ है और रेडियो और टी0वी0 के ज़रिये नश्र होने वाली अज़ान को वक़्त के दाख़िल हो जाने का मेयार बनाया जा सकता है?
    जवाब:  अगर इससे मुकल्लफ़ (वोह शख़्स जिस को यह मसअला पैश आया है) को वक़्त के दाख़िल हो जाने का इतमिनान हासिल हो जाये तो ऐतमाद कर सकता है।
    सवाल 360: क्या अज़ान के शुरू होते ही नमाज़ का वक़्त शुरू हो जाता है या अज़ान के ख़त्म होने का इन्तेज़ार करना वाजिब है और इसके बाद नमाज़ को शुरू करना चाहिये और इसी तरह क्या अज़ान के शुरू होते ही रोज़ेदार के लिये अफ़तार करना जाएज़ है या ये कि इस पर अज़ान के ख़त्म होने तक इन्तेज़ार करना वाजिब है?
    जवाब: अगर इस बात का यक़ीन हो कि वक़्त दाख़िल होने के बाद अज़ान शुरू हुई है तो आख़री अज़ान तक इन्तेज़ार करना वाजिब है।
    सवाल 361: क्या उस शख़्स की नमाज़ सही है जिसने दूसरी नमाज़ को पहली नमाज़ पर मुक़द्दम कर दिया हो जैसे इशा को मग़रिब पर मुक़द्दम किया हो?
    जवाब: अगर ग़लती या गफ़लत की वजह से नमाज़ को मुक़द्दम किया हो और पूरी नमाज़ पढ़ चुका हो तो इसके सही होने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन अगर इसने जान बूझ कर ऐसा किया हो तो वो नमाज़ बातिल है।
    सवाल 362: नमाज़े अस्र का वक़्त अज़ाने मग़रिब तक है या गुरूबे आफ़ताब (सूरज का डूबना) तक, नीज़ नमाज़े इशा और मेना में रात बसर करने के लिये शरई तौर पर आधी रात कौन सा वक़्त है?
    जवाब: नमाज़े अस्र का आख़री वक़्त गुरूबे आफ़ताब (सूरज का डूबना) तक है और ऐहतियात ये है कि नमाज़े मग़रिब व इशा वग़ैरा के लिये अव्वल गुरूब से (यानी जैसे ही सूरज डूबे) अज़ाने सुबह तक रात शुमार करें लेहाज़ा ज़ोहरे शरई के तक़रीबन सवा ग्यारह घन्टे नमाज़े मग़रिब व इशा के बाद का आख़री वक़्त है लेकिन मेना में रात गुज़ारने के लिये गुरूब से तुलू-ए-आफ़ताब तक रात शुमार करें।
    सवाल 363: जो शख़्स नमाज़े अस्र के दर्मियान मुतवज्जेह हो कि उसने नमाज़े ज़ोहर नहीं पढ़ी तो उसकी शरई ज़िम्मेदारी क्या है?
    जवाब: अगर इस ख़याल से अस्र में मशग़ूल हो कि वो नमाज़े ज़ोहर पढ़ चुका है और फिर नमाज़ के दौरान मुतवज्जेह हो कि उसने नमाज़े़ ज़ोहर नहीं पढ़ी और वो भी ज़ोहर व असर के वक़्त में है तो फ़ौरन अपनी नियत को नमाज़े़ ज़ोहर की तरफ़ पलटा ले और नमाज़ को मोकम्मल करे और इसके बाद नमाज़े अस्र पढ़े लेकिन अगर ये नमाज़े ज़ोहर के मख़सूस वक़्त में हो तो ऐहतियाते वाजिब ये है कि अपनी नियत को नमाज़े ज़ोहर की तरफ़ पलटा ले और नमाज़ को मुकम्मल करे और इसके बाद ज़ोहर व अस्र की दोनों नमाज़ों को तर्तीब के साथ अंजाम दे और नमाज़े मग़रिब व इशा के बारे में भी ऐसा ही हुक्म है।