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    औरत इस्लाम की नज़र में (2)

    औरत इस्लाम की नज़र में (2)
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    इस्लाम इन्सान को मानवता, इन्सानियत, उसकी असलियत और आध्यात्मिकता की चोटी तक पहुँचाता है इसलिये इस्लाम की नज़र में मर्द और औरत में कोई अन्तर नहीं है। इस्लाम में मर्द होने या औरत होने की कोई हैसियत नहीं है बल्कि अस्ल हैसियत इन्सानियत की है। इस्लाम कभी मर्दों को सराहता है और कभी औरतों की सराहना करता है, कहीं मर्दों की ज़िम्मेदारियां बयान करता है और कहीं औरतों की क्योंकि यह दोनों इन्सानी समाज के लिये लिये ज़रूरी हैं और यह दोनों मिल कर ही इन्सानी समाज को आगे बढ़ाते हैं, न मर्द अकेला समाज को आगे ले जा सकता है और न औरत अकेली कुछ कर सकती है इसीलिये इस्लाम नें जहाँ मर्दों को इल्म, इबादत, मेहनत, काम और दूसरी चीज़ों में आगे बढ़ने को कहा है वहीं औरत को भी उन चीज़ों का हुक्म दिया है।

    यह बात हमेशा याद रखनी चाहिये कि इस्लाम नें कुछ ज़िम्मेदारियों और कामों को मर्दों और औरतों में बाँटा है यानी कुछ ऐसे काम हैं जो मर्द के हैं औरत के नहीं हैं और कुछ ऐसे काम हैं जो औरत के हैं मर्द के नहीं हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि इस्लाम मर्द को एक नज़र से देखता है और औरतों को दूसरी नज़र से। कामों और ज़िम्मेदारियों को बाँटने की अस्ल वजह उनकी सृष्टि और बनावट है इसी लिये उनके कुछ अधिकारों में भी अन्तर नज़र आता है।

    इस्लाम नें औरत को उसकी असलियत बताई है, उसे उसकी पहचान करवाई है और उसे सही मान सम्मान दिया है। जब लड़की पैदा होती है तो इस्लाम कहता है कि उसके पैदा होने पर नाक भौं न चढ़ाना, ग़ुस्सा न होना, उदास न होना, उसे अपने लिये कलंक या बोझ न समझना, उसे ख़ुदा नें रहमत बनाकर भेजा है। परेशान न होना कि उसके पालन पोषण का बंदोबस्त कैसे होगा क्योंकि जिसनें पैदा किया है रोज़ी रोटी भी उसी के हाथ में है। जब यह लड़की जवान होती है और किसी की बीवी बनकर दूसरे घर में जाती है तो वह मर्द की नौकर बनकर नहीं जाती बल्कि उसकी साथी और पार्टनर बनकर जाती है। कुछ लोग यह सोचते हैं कि औरत को हर चीज़ में अपने पति की आज्ञा का पालन करना है, ऐसा नहीं है, यह ग़लत सोच है, इस्लाम में इस तरह का कोई क़ानून नहीं है, क़ुरआने मजीद नें जो

    ’’الرِّجَالُ قَوَّامُونَ عَلَى النِّسَاء‘‘

    कहा है उसका मतलब यह नहीं है कि मर्द औरत का मालिक है और उसे हर चीज़ में मर्द की बात माननी है। और दूसरी तरफ़ यूरोपियन या उनके रास्ते पर चलने वालों का यह कहना कि औरत आज़ाद है, मर्द का उसकी ज़िन्दगी में कोई रोल नहीं होना चाहिये या मर्द की तरफ़ से उसे रोक टोक नहीं होनी चाहिये, यह भी ग़लत है। पति पत्नी दो लाइफ़ पार्टनर हैं उन दोनों के एक दूसरे पर अधिकार हैं और दोनों की अपनी अपनी ज़िम्मेदारियां हैं इसलिये दोनों को अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए और एक दूसरे का आदर करते हुए, एक दूसरे के राइट्स का ख़्याल रखते हुए आगे बढ़ना है ताकि एक दूसरे पर ज़ुल्म न करें और सही मानों में एक अच्छी ज़िन्दगी जिएं।

    इसके बाद जब यही औरत माँ बनती है तो इस्लाम उसके लिये क्या कहता है? शायद इस्लाम नें जिस तरह माँ की श्रेष्ठता और सम्मान बयान किया है उस तरह दूसरे किसी भी धर्म में नहीं है। हदीस में आया है कि, “माँ के पैरों के नीचे जन्नत है।” इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि माँ को ख़ुश रखे बिना इन्सान जन्नत में भी नहीं जा सकता। इस्लाम नें माँ को इतना ज़्यादा महत्व दिया है कि इस्लाम कहता है कि अगर एक काम माँ कहे और एक काम बाप कहे तो पहले माँ की बात मानो, बच्चा दोनों का है लेकिन बात पहले माँ की मानना है, बच्चों पर माँ का ज़्यादा अधिकार है बच्चों के कंधों पर माँ के लिये ज़्यादा ज़िम्मेदारियां हैं। अलबत्ता यह बात भी ध्यान रखनी चाहिये कि माँ बाप की बात उसी समय मानी जा सकती है जब उनकी बात ख़ुदा के हुक्म के विरोध में न हो, अगर वह ऐसी बात या ऐसा काम कहते हैं जो अल्लाह के विरुद्ध है तो वहां उनकी बात नहीं मानना है।

    इस्लाम मर्दों को औरतों पर ज़ुल्म करने से रोकता है और ऐसे मर्दों को सज़ा के क़ाबिल समझता है जो औरत को कमज़ोर समझ कर उस पर अत्याचार करते हैं। इस्लाम की नज़र में औरत एक नाज़ुक फूल की तरह है जिसकी अच्छी तरह देख भाल की जानी चाहिये।

    इस्लाम की नज़र में औरत अपने माल की और अपने पैसों की मालिक बन सकती है और उसे ख़र्च करने के लिये वह आज़ाद है, उसे किसी की आज्ञा की ज़रूरत नहीं है, वह जिस तरह चाहे अपना माल ख़र्च कर सकती है चाहे उसका पति राज़ी हो या न हो, उसका बाप और भाई राज़ी हो या न हो।

    इस्लाम की नज़र में औरत अपना पति और लाइफ़ पार्टनर चुनने में भी आज़ाद है यानी इस मामले में कोई उसके साथ ज़बरदस्ती नहीं कर सकता। लड़के का बाप, उसके भाई या दूसरे रिश्तेदार लड़की के साथ ज़बरदस्ती नहीं कर सकते कि तुम्हे उसी लड़के के साथ शादी करनी है जिसे हमनें तुम्हारे लिये चुना है। उनमें से किसी को इस तरह का अधिकार नहीं है बल्कि उसमें औरत की मर्ज़ी ज़रूरी है।

    इस्लाम इस नज़र से औरत को देखता है इस लिये औरतों के बारे में हमारी सोच सही होनी चाहिये ताकि हम उसे उसका सही अधिकार दें सकें और उस पर अत्याचार न करें। (http://www.taqrib.info/hindi)