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    कंजूस व धोखेबाज़ व्यक्ति

    कंजूस व धोखेबाज़ व्यक्ति
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    पुराने समय की बात है एक व्यक्ति बहुत ही कंजूस था जिसने कभी किसी के साथ कोई सदकर्म नहीं किया था। वह सदैव धन इकट्ठा करने में लगा रहता, कम खाता और दूसरों की सहायता भी नहीं करता था। कंजूस व्यक्ति में बहुत सी बुराइयों के बावजूद एक अच्छी आदत भी थी किन्तु उस आदत का भी वह दुरुपयोग करता था। उस कंजूस व्यक्ति में अच्छी आदत यह थी कि वह बहुत ही मीठी वाणी में बात करता था। वह कंजूस आदमी उन लोगों के वर्ग से था जो अपनी मीठी बात से सांप को उसकी बिल से बाहर निकाल सकते हैं। इतनी मीठी व अच्छी बात करता था कि हर आदमी को अपनी बात से धोखा देता था। उसने लोगों को इतने छोटे बड़े धोखे दिए थे कि सब उसे समझ गए थे और किसी के सामने उसकी दाल नहीं गलती थी। एक दिन कंजूस आदमी सोच रहा था कि इस बार किसे धोखा देकर पैसे ऐंठे। अंततः उसके मन में एक व्यक्ति का ख़्याल आया जो उसी नगर में रहता था। वह व्यक्ति दान-दक्षिणा में प्रसिद्ध था और दिन रात लोगों की सेवा करता था। कंजूस व्यक्ति ने उस भले व्यक्ति को धोखा देने के बारे में सोचा। मीठी ज़बान वाले कंजूस व्यक्ति ने जब उस भले व्यक्ति को देखा तो अपनी मीठी ज़बान का जादू दिखाना शुरु किया। उसने भले व्यक्ति से कहाः हे महान व्यक्ति एक नीच व्यक्ति के दस दिरहम का में ऋणी हूं किन्तु उस घटिया व्यक्ति ने मेरा जीना दूभर कर दिया है हर दिन मेरे घर आता है चिल्लाता है और पैसे मांगता है। दानी व्यक्ति ने जब कंजूस व्यक्ति की बात सुनी तो थोड़ी देर सोचने के बाद कहाः ठीक है मैं तुम्हारी मदद करुंगा। कंजूस व्यक्ति, दानी व्यक्ति से सोने का सिक्का लेने के बाद उसके घर से निकल गया। वह इतना प्रसन्न था कि उसका चेहरा ख़ुशी के मारे सोने की भांति दमक रहा था। दानी व्यक्ति के एक पड़ोसी ने उस कंजूस व्यक्ति को देखते ही पहचान लिया। जब पड़ोसी को मामले का पता चला तो वह दानी व्यक्ति के पास गया। पड़ोसी ने दानी व्यक्ति से कहाः क्या आप उसे नहीं पहचानते थे कि उसकी मदद कर दी? आपने उसे कैसे नहीं पहचाना? वह अपने समय का सबसे घटिया व्यक्ति है कि इस नगर में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसे उससे हानि न पहुंची हो। आपने उसकी बात को सही कैसे मान लिया? वह झूठा है, झूठ बोलना ही उसका काम है। दानी व्यक्ति पड़ोसी की बात से अप्रसन्न हो गया और उसने पड़ोसी से थोड़ा कठोर व्यवहार किया। पड़ोसी ने दानी व्यक्ति से आश्चर्य से पूछाः क्या कह रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं उसकी बात पर आपको विश्वास हो गया है? दानी व्यक्ति अपनी आदत के मुताबिक़ एक क्षण सोच में पड़ गया और फिर उसने कहाः यदि जो मैने सोचा है वह सही है और वह ऋणी है तो वास्तव में मैने उसकी मर्यादा बचा ली। पड़ोसी व्यक्ति ने अप्रसन्न होकर कहाः हे भाई! मैं कह रहा हूं कि वह झूठा है, सब उसे पहचानते हैं उसके बाद भी आप यह कह रहे हैं कि यदि उसकी बात सही हुयी तो आपने उसे सबके सामने अपमानित होने से बचा लिया? वह क्या जाने मर्यादा क्या होती है? दानी व्यक्ति ने कहाः हो सकता तुम सही कह रहे हो किन्तु मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि उसने झूठ कहा है। यदि उसने सच कहा है तो मैंने उसकी मर्यादा बचा ली और अगर झूठ कहा है और उसका मतलब कुछ और है तब भी मैं नाराज़ नहीं हूं क्योंकि मैंने अपनी इज़्ज़त बचा ली। पड़ोसी सोच में पड़ गया और दानी व्यक्ति से और कुछ न कह सका। दानी व्यक्ति ने फिर कहाः प्रिय पड़ोसी यदि उसने झूठ कहा है तो मैंने एक मक्कार व्यक्ति से अपनी मर्यादा बचा ली है।